अमेरिका का ईरान के साथ दुष्मनी का सिलसिला पिछली अर्धशताब्धि से अधिक समय से सिर्फ तेल के संसाधनों पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए जारी है. जिसको वर्तमान समय की ईरान की धार्मिक सरकार नही मान रही है. इसलिए डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला के जैसे ही अपनी सामरिक ताकत के बल पर कब्ज़ा करना चाहता है. जिसे वह रेजिम चेंज बोलते हूऐ ऑपरेशन OPERATION EPIC FURY के नाम से चला रहा है. जिसके जवाब मे ईरान ने भी OPERATION TRUE PROMISE IV जैसा नाम दिया है. 28 फरवरी 2026 को सुबह लगभग सुबह 7 बजे ईरानी समय के अनुसार, (अमेरिका के समय 1:15 AM ET) से बडे पैमाने पर हवाई हमले करते हूऐ, अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की है.

ईरान में पहला तेल का भंडार फारस की खाड़ी में खुजेस्तान प्रांत में 26 मई 1908 मे मस्जिद – ए – सुलेमान मे पाया गया. जो मिडल ईस्ट का पहला प्रमुख तेल क्षेत्र की खोज अंग्रेज इंजिनियर जॉर्ज रेनॉल्ड़स ने की थी. जिसकी वजह से 1909 मे एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी की स्थापना की थी.जिसे तत्कालीन फारस के शासक काजर वंश के मुजफ्फर ओद – दीन शाह ने अंग्रेज धनी विलियम नॉक्स डी आर्सि को तेल अन्वेषण करने के अधिकार बेच दिऐ थे. इससे ब्रिटिश शासन के कान खड़े हो गए. क्योंकि पांच साल में ही प्रथम विश्व युद्ध के लिए तेल सबसे महत्वपूर्ण इंधन के तौर पर काफी काम आने वाला था. इस खोज ने भू-राजनीतिक निहितार्थ की लड़ाई में ईरान के तेल का भंडार पर कब्जा करने का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. जिसका संघटित विरोध ईरान मे 1951 मे सोशलिस्ट रुझान के सबसे लोकप्रिय नेता मोहम्मद मोसादेघ प्रधानमंत्री के पदपर थे. उस दौरान शुरू हुआ था. उन्होंने एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी का (BP) का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. यह कदम ब्रिटिश और पश्चिमी देशों के नियंत्रण को खत्म करने के लिए किया गया था. जिससे तेल उद्दोगपर ईरान का पूर्ण नियंत्रण हो सके. क्योंकि ब्रिटिशों ने तेल की खोज अपने उन्नत औद्योगिक तकनीक के सहारे की थी. लेकिन ईरान को सिर्फ 10 % हिस्से का टुकड़ा फेककर 90 % तेल का दोहन किऐ जा रहे थे. इसलिए मोहम्मद मोसादेघ के खिलाफ अमेरिका के सीआइए और ब्रिटेन की एम आई 6 दोनों एजेंसियों की मिलिभगत से 1953 मे मोहम्मद मोसादेघ का तख्तापलट करने की साजिश. (Operation Ajax) का नाम देकर कि गई थी . यही से ईरान के तख्तापलट का सिलसिला अमेरिका ब्रिटेन तथा पश्चिमी देशों की कोशिश तेल के संसाधनों के उपर कब्जा करने के लिए जिसकी शुरुआत 1953 मे जनतंत्र से चुनकर आई हुई लोकप्रियता के चरम शिखर पर की मोसादेघ की सरकार को आजसे 73 साल पहले हटाने के बाद, अपने इशारोपर काम करने वाले शाह मोहम्मद रजा पहलवी को गद्दीपर बैठाकर 1979 तक खनिज तेल का दोहन करते रहे. इसिलिये इराण मे इस्लामिक क्रांति आयातोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ( AYATOLLAH RUHOLLAH KHOMEINI ) के नेतृत्व में हुई थी. उस क्रांति मे सबसे प्रमुख लक्ष्य अमेरिका तथा उसके पिछलग्गू पश्चिमी देशों के खिलाफ जबरदस्त नफरत पैदा हो गई है. इस वजह से तेहरान स्थित अमेरिकन दूतावास को 4 नवंबर 1979 को बंद कर दिया गया था. यह घटना तब हुईं, जब ईरानी छात्रों ने दूतावास पर कब्जा कर लिया. और 52 अमेरिकि राजनयिकको 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखने के बाद. ईरान के साथ अमेरिका ने राजनयिक संबध 1980 मे खत्म कर दए है. और आज इस घटना को 46 वर्ष हो गए हैं. लेकिन अब तक ईरान के साथ अमेरिका के राजनयिक संबंध नहीं है.तेहरान की अमेरिकन एंबेसी को जासूसी अड्डे (Spai Den) के नाम से मुजियम के रूप में संरक्षित करके रखा हुआ है. जिसे मैं खुद 2010 के दिसंबर के मध्य में गाजा के उपर इस्राइल के चल रहे सिज से मुक्त करने के लिए निकाले गऐ पहले एशियन कारवाँ के दौरान भेट देने का मौका मिला है.

ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस,जर्मनी,डच,पोर्तूगिज, अमेरिका ,और 20 वी शताब्दी से सोवियत संघ और अब नए दादा देश अमेरिका और चीन साम्राज्यवादी गुंडों की भुमिका निभा रहे है. उन्होंने अपने अगल- बगल के सभी देशों में जबसे तथाकथित क्रांतियाँ हुई है. तबसे लगातार कई देशों को अपने कब्जे में करने का सिलसिला जारी है. सबसे ताजा उदाहरण वेनेजुएला तथा 78 सालों पहले तिब्बत पर चीनी कब्जा तथा सत्तर के दशक में विएतनाम पर अमेरिका का तथा लैटिन अमेरिका के देशों में भी उसकी मिसाल है. और नेपाल और अब मॅनमार, बंगला देश, पाकिस्तान. ईरान में भी अपने एजेंट के तौर पर जो अमेरिकन हितों के लिए काम करेंगी ऐसी सरकार के लिए ही, अमेरिका इस युद्ध में इस्राइल का साथ दे रहा है. पूरे इस्लामिक जगत को लेकर अमेरिका का साम्राज्यवादी कब्जा साफ दिखाई दे रहा है. और इसलिये उसने दुनिया के काफी देशों में अपने सैनिक अड्डे कायम कर के उन देशों को अपनी धाक मे रखते हुए ईरान के खिलाफ न्यूक्लियर प्रोग्राम की आड़ में ईरान पर हमला कर दिया है. जैसे 23 साल पहले इराक के उपर केमिकल वेपन्स का झुठा बहाना बनाकर कब्जा कर लिया है . और इनका पाखंड देखिए यह सब गुनाहों को करते हूऐ सबसे ज्यादा मानवाधिकार और जनतंत्र तथा न्याय के नाम देते हूऐ युद्ध कर रहे हैं . और वहाकी जनता की मुक्ति का दावा भी करते हैं . जैसे कि वेनेजुएला और अब पिछले दो हफ्ते से ईरान में रेजिम चेंज का दावा डोनाल्ड ट्रंप लगातार किए जा रहे है. और पूरी दुनिया मूकदर्शक बनीं हुई दिखाई दे रही है. उल्टा क्रिकेट या फूटबॉल मैच के लाइव प्रसारण के जैसे युध्द के भी प्रसारण 2003 के बाद इराक युद्ध से यह चलन चल रहा है. मुझे इसमें माननीय संवेदनाओं की लुप्त होने की बात नजर आ रही है. बेंजामिन नेथ्थान्यू और डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना करने का साहस कोई क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? इस परिप्रेक्ष मे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान महात्मा गाँधी जी का हिटलर के नाम ओपन लेटर की याद आ रही है. उन्होंने 23 जुलै 1939 को पहला पत्र युद्ध शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले ही उन्होंने मानवता के नामपर हिटलर को युद्ध टालने का अनुरोध किया था. और 24 दिसंबर 1940 को दुसरा पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने हिटलर को चेताया था कि “तम्हारे ही हिंसक तरिको से और दुसरे भी उससे ज्यादा हिसंक तरिको को अपना कर तुम्हें युद्ध में हराने का काम कर सकता है.” बिल्कुल आज भी यही बात बेंजामिन नेथ्थान्यू और डोनाल्ड ट्रंप को भी लागू होती है. हिटलर के जैसे ही डोनाल्ड ट्रंप को और नेथ्थान्यू को भी बहुत गर्व हो गया है, कि वह पूरी दुनिया पर राज कर सकते हैं.

आज डोनाल्ड ट्रंप को दुसरी बार राष्ट्रपति का पद भार सम्हालने को एक साल दो महीना हो रहा है . इस बीच वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उनके घर से रात के अंधेरे में अगवा करने से लेकर ग्रिनलेंड को सौपने की जिद करने तथा पैरिस घोषणा को न मानने से लेकर, विश्व स्वास्थ्य संगठन से पल्ला झाडना. और आंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट ने नेथ्यानू को युद्ध अपराधी होने की घोषणा करने के बाद वह ट्रंप को मिलने के लिए जाता है .और ट्रंप उसे कुछ कहने के बजाय उल्टा आंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट के लोगों के उपर कारवाई की घोषणा करता है.और सबसे हैरानी की बात जिस गाजापट्टि को नेथ्यानू ने बर्बाद कर के रख दिया है. और लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया है . उसी गाजापट्टि के बचे हुए लोगों को ट्रंप बोल रहा है कि “आप सभी लोग गाजापट्टि को खाली कर के इजिप्त और जॉर्डन मे निकल जाओ, और मै वहां पर विश्व का सबसे बेहतरीन सी रिसॉर्ट बनाऊँगा .” और अमेरिका में फिलिस्तीन को लेकर धरना_ प्रदर्शन पर रोक लगाने से लेकर धरना प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों के फंडिंग बंद करने से लेकर अन्य कारवाई कर रहा है. और उसके बाद यूएनओ को साइडलाइन करते हूए गाजा की बर्बादी के बाद तथाकथित आंतरराष्ट्रीय ‘बोर्ड ऑफ पिस’ जैसे शिर्षक से डरा-धमकाकर दुनिया के अन्य देशों को उसके सदस्य बनाने के लिए दबाव डाल कर खुद को आजिवन उसका अध्यक्ष घोषित कर लिया है. और सदस्य बनने की फिस एक अरब डॉलर रखीं हुई है. तथाकथित पिस की जगह पर ईरान पर फरवरी के आखिर दिन 28 फरवरी को सुबह के 7 बजे रमजान के दौरान अचानक युद्ध शुरू कर दिया है. मतलब ट्रंप कीस मट्टी का बना हुआ है ? ऐसा संवेदनहीन आदमी आज अमेरिका के राष्ट्रपति के पद पर विराजमान हो गया है . यह विश्व के इतिहास मे इक्कीसवीं शताब्दी का नया तानाशाह बनने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं . अमेरिका के लोगों की बर्दाश्त करने की बात मेरे गले नहीं उतर रहीं हैं. नेथ्यानू ने गाजा मे एक लाख से अधिक संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इस बात का ट्रंप के उपर कुछ भी असर नहीं हुआ है. उल्टा बचे हुए लोगों को बेहिचक गाजापट्टि खाली करने के लिए बोल रहा है. और उस जगह पर रिवेरा बनाने की घोषणा कर रहा है. मतलब दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के विषरूक्ष का दो सौ साल की प्रगति का यह फल है. जिसका नाम डोनाल्ड ट्रंप है. और अब पिछले बारह दिन से अधिक समय से उसने और इस्राइल के बेंजामिन नेथ्थान्यू ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया है. और हमले के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता आयातोल्लाह खामेनेइ और उनके परिवार के सदस्यों को मारकर अबतक ईरान के एक हजार से अधिक संख्या में लोगों की मौत हो चुकी है. और उसमे ईरान के स्कूल की 165 से अधिक संख्या में छात्राओं की मौत हो गई है. और डोनाल्ड ट्रंप बार – बार बोल रहे है कि “मै ईरान मे रेजिम चेंज किऐ बगैर युद्ध रोकने वाला नहीं हूँ” . डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका के लोगों ने तो दुसरीबार सिर्फ अमेरिका का राष्ट्रपति चुनकर भेजा है. लेकिन ट्रंप की गलत फहमी हो गई है की वह पूरी दुनियां का राष्ट्रपति बन गया है. क्योंकि दुसरी बार 20 जनवरी 2025 के शपथग्रहण समारोह के बाद उसने टेरिफ युद्ध छेड़ना शुरू किया. जिसे हालही मे अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने गैरकानूनी घोषित कर दिया तो, इस आदमी ने न्यायालय को ही गालियां देते हूऐ, ईरान पर अचानक ही हमला बोल दिया. और बार – बार रेजिमे चेंज – रेजिम चेंज की रट लगा रहा है. अगर यही बात कोई दूसरा देश बोले की “हमे अमेरिका की रेजिम चेंज चाहिए” तो कैसा लगेगा ?
भारत 12 साल पहले तक विश्व के तिसरी दुनिया की तटस्थ राष्ट्रो की नेतृकारी भूमिका को लेकर चल रहा राष्ट्र रहते हूऐ प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदी जी एक तरफ तो विश्वगुरु का दावा ठोक रहे हैं. वर्तमान समय में वह ब्रिक्स के अध्यक्ष रहते हूऐ, कैसे अमेरिका और इस्राइल के चक्रव्यूह मे फंसते जा रहे हैं ? और भारत की 75 सालों से लगातार चली आ रही तटस्थ राष्ट्र की भूमिका से हटकर इस्राइल और अमेरिकन कैम्प जाने के आसार नजर आ रहे हैं. यह पूरा दिमाग मोसाद और उसके आका इस्राइल के द्वारा पिछले 78 सालों से लगातार फिलिस्तीन अस्तित्व खत्म करने के लिए अमानवीय षड्यंत्र को देखकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ देखकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का सबसे पहले संघठन को अपनी तरफ आकर्षित किया गया है. इसलिए नरेंद्र मोदी जी अपने मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों की वजह से ही 26 फरवरी 2026 के दिन इस्राइल की संसद में मातृभूमि और पितृभूमि की हिंदुत्ववादी व्याख्या को दोहराने का काम किए हैं. क्योंकि बेंजामिन नेथ्थान्यू को आंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट ने वॉर क्रिमिनल डिक्लेअर करने के बावजूद नरेंद्र मोदी जी की क्या मजबूरी हो सकती है कि वह अचानक 26 फरवरी को विनायक दामोदर सावरकर के 70 वे मृत्यु दिवसपर इस्राइल की संसद में सावरकर के ‘हिंदूत्व’ शिर्षक की किताब के हवाले से रेसियल थेयरी को दोहराने का ‘(मातृभूमि और पितृभूमि’) की गैरवैज्ञानिक बातों को लेकर बोलकर आऐ है. और उसी इस्राइल के यहूदि लेखक यूवल नोआ हरारी की किताब हिब्रू तथा अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी है जिसमें वह खुद यहूदि धर्म मे पैदा होने के बावजूद मानव वंश के निर्माण के ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर एकके बाद दूसरे किताब को लिख चुके हैं. और सबसे हैरानी की बात नरेंद्र मोदी जी इस्राइल से लौटने के 48 घंटे के भीतर इस्राइल और अमेरिका ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमले शुरू कर दिए. हमारे प्रधानमंत्री जी को क्या यह बात बेंजामिन नेथ्थान्यू ने विश्वास मे लेकर नही बताई होगी ? क्योंकि इस्राइल से वापसी के बाद शुरू किया गया युद्ध में 165 मासूम लड़कियों की मौत हो जाती है. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी की तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी गई.उल्टा उसके जवाब मे ईरानी हमले में यूएई मे 7-8 लोगों की मौत पर दुःख जताना और ईरान के सर्वोच्च नेता आयातोल्लाह खामेनेइ अपने परिवार के सदस्यों के साथ मारे जाने पर प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदी जी का मौन – व्रत किस बात के लिए चल रहा है ? क्या सिर्फ विदेश सचिव को पांच दिन बाद ईरान की एंबेसी मे भेजकर चंद लाइन का शोक जताना पर्याप्त है ? हमारे साथ ईरान के संबंध तीन हजार साल से भी अधिक समय पूराने है. और कश्मीर की समस्या से लेकर तेल के संकट के समय में भारतीय करेंसी मे तेल देनेवाले ईरान ने चाबहार पोर्ट को भारत को निर्माण कार्य सौपा था. लेकिन अमेरिकन पाबंदियों के दबाव में बाहर होने के लिए मजबूर कर देने के बाद भी. इस्राइल की एजेंसियों से और मुख्यतः इस्त्राइल की सबसे खतरनाक एजेंसी मोसाद की पेगासस मे जासूसी के लिए मदद और सलाह से तो हमारे देश का कारोबार तो नहीं ना चल रहा है ? क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की निर्मिती भले हिटलर और मुसोलिनी की प्रेरणा और उनके एस एस और बलाला संघठनो के तर्ज पर हुई है. लेकिन 1948 के बाद इस्राइल के चारो तरफ इस्लामिक देश होने के बावजूद वह एक करोड़ से भी कम यहूदी जनसंख्या होने के बावजूद सबको नाको तले चने चबाने के लिए, विशेष रूप से अमेरिकी मदद से भारी पड रहा है. और उसी इस्राइल को मुसलमानों के खिलाफ द्वेष के कारण तो नही ना मदद की जा रही है ? लेकिन नरेंद्र मोदी जी शायद सबसे महत्वपूर्ण बात भूल रहे हैं कि भारत में दुनिया के दो नंबर की जनसंख्या मुसलमानों की है. और कितना भी गुजरात कर लो लेकिन 30-40 करोड़ आबादी के भारत के मुसलमानों को एन आर सी और एस आई आर के बाद भी कितने को बाहर निकाल सकते हैं ? और निकाला तो भी उन्हें लेने के लिए कौन सा देश तैयार बैठा है ?

जब इटली-जर्मनी और रशियन तानाशाह यह सब करतूतों को अंजाम दे रहे थे. और उनके साथ तबका मिडियाने भी इसी तरह के लोगों को बरगलाने के लिए महिमामंडित करने के कागज आज भी उपलब्ध है. और उनके कारनामों को उजागर करने वाले भी कागजातों की संख्या उनसे ज्यादा है. और आज वह हीरों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं या विलेन ? तो डोनाल्ड ट्रंप से लेकर नरेंद्र मोदी जी को भी यही तर्क लागू है. और आने वाले समय में वह किस रूप में जाने जांय यह बात अभिभी उनके हाथों में है.
आखिरी बात डॉ. बाबा साहब अंबेडकर जी ने कहा है कि “इतिहास में की गई गलतियों से जो नहीं सिखता है, उसे वर्तमान और सबसे ज्यादा भविष्य में कभी भी माफ नहीं किया जाता है. “












