श्रीकांत आप्टे: आजकल राजनीति में नया ट्रेंड है, मुख्यमंत्री को उखाड़ो। सरकार गिराओ। सरकार विपक्ष की हो या अपनी ही पार्टी की कोई फर्क नहीं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जमना है तो जो है उसे उखाड़ो।पार्टी कोई सी भी हो,लेकिन ट्रेंड समान है। देश तो चायनीज़ सस्ते माल में मस्त है। देश की आत्मनिर्भरता गई तेल लेने।परंतु सभी पार्टियां सरकार गिराने, मुख्यमंत्री को उखाड़ने के मामले में आत्मनिर्भर हो गई हैं।
मुख्यमंत्री को उखाड़ने के लिए पार्टी के भीतर ही भरपूर स्कोप रहता है।
चलो, मुख्यमंत्री उखाड़ें की मुहिम बारहमासी हो गई है।
बहुत दिन हो गए मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बैठे। गर्मी के सीज़न में कुर्सी पर बैठाया गया था। आसार तो ऐसे दिख रहे थे कि जल्द ही पिघल कर बह जायेगा। पर साला नहीं बहा। बारिश में प्रदेश का बाढ़ में बहुत कुछ बह गया। पर मुख्यमंत्री नहीं बहा। हाईकमान के सामने सारी गुहारें व्यर्थ रहीं। अब तो सर्दियों का मौसम है। इस मौसम में तो हर चीज़ जम जाती है। फिर वो तो मुख्यमंत्री है। जम जाए उसके पहले उखाड़ो।
हाईकमान राजधानी आए तो नये सिरे से मुहिम सी चल पड़ी। हाईकमान आने पर हर बार ही चलती है मुहिम प्रदेश की राजनीति में। राजनीति के अखाड़े में सच्चे,ईमानदार व निष्ठावान पहलवानों के पास और काम ही क्या होता है।
मुख्यमंत्री पद को भाईसाहब बपौती समझ बैठे हैं। कईयों ने तो बाकायदा संदेशा भी भिजवाया था कि उपमुख्यमंत्री बनने के लिए भी राजी हैं। ऐसों-ऐसों ने भी संदेशा भिजवाया जिनकी गिनती न भाजी में न भटन में। पर मुख्यमंत्री भी एक नंबर का हरामी है। सबकी रग-रग से वाकिफ है। खतरे को पहचानता है। उसे पता है कि उपमुख्यमंत्री से उप का पुछल्ला हटाकर साले कब मुख्यमंत्री की कुर्सी को झपट लें कोई ठीक नहीं। हरामी ऐसा है कि उपमुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव कब-कब, किससे मिला , सब कुछ नमक मिर्च लगाकर मीडिया वालों को लीक कर देता है। मीडिया वालों से कहता है कि ये साले हमें चूतिया समझते है। इन कमीनों की नीयत केवल हम ही नहीं बल्कि सारा देश जानता है। देश तो पचहत्तर सालों में राजनीति के सभी कमीनों की नीयत जान गया है।
अब आप ही बताइए कि उपमुख्यमंत्री बनने के प्रस्ताव पर भी मुख्यमंत्री मूतने उतर आए तो ऐसे में मुख्यमंत्री उखाड़ो मुहिम न चलाई जाए तो क्या किया जाए। लानत है ऐसी निष्ठा,ईमानदारी और सच्चाई पर यदि उससे मुख्यमंत्री को न उखाड़ पाएं।
सो जोर-शोर से मुहिम जारी है। इस पुनीत कार्य के लिए सभी गुटबाज अन्य गुटबाजों से भी संपर्क में हैं। हांलाकि इसमें भी खतरा कम नहीं है। सभी गुटबाज भी तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के आकांक्षी हैं। लेकिन कोई बात नहीं। इस खतरे से बाद में निपट लिया जाएगा। फिलहाल, सभी अर्जुनों का एक ही लक्ष्य- मुख्यमंत्री की कुर्सी। एक बार मुख्यमंत्री की कुर्सी हाथ आ जाए तो बाकियों से निपट लिया जाएगा। अभी तो मुख्यमंत्री उखाड़ो अभियान की सफलता के लिए प्रयास जारी है। राजनीतिक षड़यंत्रों की सफलता के लिए बाबाओं के आशीर्वाद और धार्मिक अनुष्ठान भी चलते रहते हैं। इस धाम के बाबा भी और उस धाम के बाबा भी सबके चरणों में मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी दण्डवत हो चुके हैं। मौनीबाबा ने तो स्लेट पर लिखित आशीर्वाद दिया था कि – बच्चा शीघ्र तेरी मनोकामना पूरी होगी। मनोकामना की ऐसी मैय्यो हुई कि जो कुर्सी है वो भी जाते-जाते बची।
सब कुछ गुपचुप किया फिर भी किसी चुगलखोर ने चुगली कर दी। बड़ी कुर्सी पाने के फेर में जो है वह भी बामुश्किल बची। कुर्सी गयी तो काम सलटाने के चक्कर में चिपके रहने वाले चेलेचपाटे भी खिसक जाते हैं।
हर पार्टी की परंपरा और परिपाटी एक जैसी। हाईकमान इसका हो या उसका सारे समान। कुर्सी की टांगे ही छोटी,बड़ी फिट कर देते हैं। पर्ची से चुना मुख्यमंत्री अपने दम पर ऐसी डगमग कुर्सी में लगातार पांच साल बैठकर बताए तो जाने। कोई कसर नहीं रह जाए इसका भी प्रबंध हाईकमान कुर्सी पर बैठाने के साथ ही कर देते हैं। भरोसेमंदों को आरी थमा जाते हैं। जो भी बैठे उसी की सांसे फूली रहती हैं दमे के मरीज सी। कुर्सी महाठगनी। कुर्सी सुख की नश्वरता कुर्सी पर बैठने वाले से बेहतर भला कौन जानता है। पता है उसे कि यह सुख तभी तक है जब तक हाईकमान चाहे। कुर्सी के हत्थे चाहे कसकर पकड़े रहे परंतु छोटी-बड़ी टांगों का क्या करे। डगमगाती कुर्सी पर सदैव डर बना रहता है,अब गिरे की तब गिरे। जो आज जमा है वह कल उखड़ेगा जरूर। किसी और की क्या कहें अगर खुद कुर्सी पर न हो तो उखाड़ने का पावन कार्य खुद भी करेगा।
सरकार यदि गठबंधन की है तो कोढ़ में खाज का मामला जानो। हाईकमान ने डबल इंजन की सरकार के चक्कर में मुख्यमंत्री से उपमुख्यमंत्री बना दिया था। बन गये बिना चुं चपड़के । न मानते तो दोनों दीन से गये पांडे वाला सीन होता। यहां खून का घूंट कोई नहीं पीता। सभी की रगों में पानी।
कुर्सी पर चिपकने और चिपके रहने के लिए हाईकमान के ड्रम से फेविकाॅल सप्लाई जरूरी। सप्लाई कम तो कुर्सी हिली और सप्लाई बंद तो कुर्सी गिरी। हाईकमान यानी बाप। बाप की लात में बड़ा दम होता है। जो मुख्यमंत्री चुनाव के बाद फिर से मुख्यमंत्री बनने के हसीन सपनों में खोया हुआ था उसके पिछवाड़े पर हाईकमान की वो लात पड़ी कि बच्चू चुनाव के पहले ही अखाड़े में चौखान चित्त गिरे।
तो यही हाल है आज राजनीति का। पांच दिन का टेस्ट मैच, वन डे , ट्वेंटी-ट्वेंटी चलते रहते हैं। सरकार बनाने या उखाड़ने का भ्रम यदि जनता पालना चाहे तो जरुर पाले। किसी पार्टी या नेता को आपत्ति नहीं होती। जीवन जीने की जुगाड़ों के बोझ तले दबी जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता , कौन बैठा है और कौन कुर्सी से गिर गया। जो भी बैठेगा वही लूटेगा। जनता को लुटना है ये लूटे या वो।
लेखक: श्रीकांत आप्टे












