ब्रज श्रीवास्तव

ब्रज श्रीवास्तव

|| ब्रज श्रीवास्तव, नरेंद्र जैन के साथ ||

समकालीन कविता के 80 के दशक के चर्चित कवि , कथाकार और अनुवादक नरेंद्र जैन से मैं खूब मिलता रहा हूं। विदिशा में रहते हुए अगर उनसे घनिष्ठता  न होती तो व्यर्थ जाती उमरिया । हांलांकि दीगर वजहों से यह बेकार कही जा सकती है।

नरेन्द्र जैन से मेरी पहली बार एक सरकारी बस में मुलाक़ात हुई थी। मैं और वह दोनों सिरोंज जाने वाली बस में बैठे थे। रास्ते में एक जगह पर मोटर बस  का एक टायर पंचर हो गयाऔर एक शख़्स बाहर निकल कर सिगरेट के कश लेते हुए अकेले ही खड़ा था तो मैंने नमस्ते करके पहचान की तो पता चला कि वह कवि और बैंक आफीसर हैं। मैंने भी अपनी रुचि कविता में होने की  बताई ,तो फिर बातें करते करते ऐसी कामना हुई  कि मोटर बस का पंचर देर में ही  सुधरे।हम दोनों ने फिल्मों के गीतों की बातें कीं। कुछ अभिनेताओं की बातें कीं।

फिर तो विदिशा में उनकी संगत बारहा मिलने लगी। रविवार की शामों में हम अक्सर साथ होते। कहीं न कहीं जाते। पहली मुलाकात में उन्होंने मुझे अपना संग्रह उदाहरण के लिए-भेंट किया। और उस पर लिखा ब्रज श्रीवास्तव के लिए उनकी आने वाली कविताओं की उम्मीद में।यह बात मेरे लिए कितनी उत्साह वर्धक थी, मैं बता नहीं सकता।

यह 1995 की बात होगी!

एक बार हम लोग एक क़स्बे में एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गए। वहां राजेश जोशी और राजेंद्र शर्मा भी उपस्थित थे। संचालन के दौरान संचालक ने कहा कि अब मैं श्री नरेन्द्र कुमार जैन साहब को कविता पाठ के लिए आमंत्रित करूंगा। इतना ‌सुनकर नजै बहुत गुस्से में आ गए। और जोर से बोले

मैं नहीं करूंगा कविता पाठ। जिस कार्यक्रम में संचालक को मेरा नाम तक नहीं मालूम और वह कुमार और साहब जैसे अनावश्यक शब्द जोड़ कर शब्द को जाया कर रहा है ऐसे में मैं क्या करूं। मैं तो यहां रुक भी नहीं सकता। और वह‌ अपने काले झोले को उठाकर चल दिए। वातावरण इतना संजीदा हो गया कि किसी ने उन्हें रोकना मुनासिब नहीं समझा ,थोड़ी ही देर बाद मैं भी उनके पीछे हो लिया करता भी क्या ? आख़िर उनके साथ ही मैं आया था| और मुझे उनका साथ देना था यह और बात है कि हम रेल के इंतज़ार में शाम तक उसी कस्बे में एक होटल पर बैठकर समय गुजारते रहे। तो यह था उनकी तुनकमिजाजी का एक नमूना |एक बार और भी ठीक ऐसा ही हुआ । भोपाल में किसी कवि गोष्ठी में हम तीन आमंत्रित थे, मैं, आलोक श्रीवास्तव  और दफै़रुन। शायद हरि भटनागर ने बुलाया था, केंद्रीय विद्यालय की एक बड़ी गोष्ठी में।संचालक ने फिर नरेन्द्र  कुमार जैन कहकर  सम्मानित किया।और फिर उन्होंने फटकार लगाई।

नरेंद्र जैन पानी की तरह सरल सहज और हर तरह के पदार्थ को अपने व्यक्तित्व में घुलने के लिए मोहलत देने वाले सरल कवि हैं ।लेकिन अगर उन्हें कोई बात ठीक नहीं लगती तो वह उसका सरेआम विरोध करना भी जानते हैं। यहां तक कि उन्होंने मेरे पिता की स्मृति कार्यक्रम में भी मुझे टोक दिया था कि

मैं ऐसे फोल्डर को क्यों वितरित करता हूं ‌,जिसमें परिवार के सदस्यों के नाम भी लिखे हैं।उनका कहना था कि कवि को अकेले ही अपनी कविता की दम पर सफ़र करना पड़ता है  तो ये सब फ़ालतू काम हैं, क्यों करना। जबकि उस फोल्डर में कविताएं भी थीं और सममतियां भी। मुझे भी बुरा लगा और मैंने मंच से ही जब जवाब देना चाहा तो उन्होंने मुस्कराकर इशारा करके रोका और कहा ब्रज कार्यक्रम आगे बढ़ाओ उसे मत खींचो। तो मुझे महसूस हुआ कि वह केवल राय दे रहे थे, गलती निकाल कर खुद को चक्रवर्ती सम्राट नहीं मान रहे थे।जब तक वह यहां रहे इस कार्यक्रम में सहयोग करते रहे। पिताजी (घनश्याम मुरारी पुष्प) की कविता के पोस्टर बनाये। और मुझे फ्रेम कराकर भी दिए। एक  और उदारता उनकी याद आती है। मेरे दूसरे संग्रह पर आयोजित चर्चा गोष्ठी के बाद अतिथि संगत की सरस भोजन पार्टी के बिल का भुगतान करने के लिए मैं उठा तो उन्होंने कहा नहीं। मैं  भुगतान करूंगा । तुम आज के कवि हो।हम लोगों का फ़र्ज़ है कि तुम्हारा खर्चा आज न हो। और मुझे मानना पड़ा,उस कार्यक्रम में मुकेश वर्मा, महेंद्र गगन, बलराम गुमास्ता के अलावा एक दो हम‌उम्र भी थे।

कवि और विद्वान विजय कुमार उनके बारे में अक्सर कहते हैं कि* वह हमारे दौर के एक संत कवि हैं।हमारे पूरे वर्तमान कविता परिदृश्य में नरेंद्र जैन सबसे अनूठे कवि हैं। उनका उचित मूल्यांकन हुआ नहीं है और वे एक बेहद निश्छल और निस्पृह किस्म के इंसान और ऊष्मा से भरे मित्र भी हैं। उनसे निकटता को मैं अपने जीवन का एक सुंदर अनुभव मानता हूँ।

ऐसा शायद वह इसलिए कहते हैं कि वह अनावश्यक किसी से झगड़ते नहीं और सब कुछ बर्दाश्त करते हैं ।सारे दुख अपने ऊपर ले लेते हैं लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। शायद इसलिए वह नरेंद्र जैन को संत कवि कहते हैं कि वह एक ऐसे बच्चे की तरह सरल सहज और मासूम हैं।कि वह किसी की भी मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं और कोई लाभ नहीं लेना चाहते। मैंने खुद देखा कि उन्हें लोग आयोजन में बुलाते और वह बचते भागते।अभी चार साल पहले की बात है। हालांकि प्रचलित अर्थ में संत सुनकर जो छवि बनती है वो तो बहुत गड़बड़ है, यहां तो वह नवनीत समाना के अर्थ में उल्लेखित हैं। त्रिलोक महावर जी के कविता संग्रह- हिज्जे सुधारता है चांद -का लोकार्पण भोपाल में हो रहा था। त्रिलोक जी ने मुझे कहा कि आप नरेंद्र जैन को लेकर आएं। मैंने कहा कि ठीक है मैं टैक्सी में उन्हें लेकर आ जाऊंगा। इधर मैंने नरेंद्र जैन  से कहा कि टैक्सी कार का प्रबंध है। तो उन्होंने इन्कार किया और बोले ट्रैन से ही चलें। व्यर्थ में इतना खर्च क्यों करें। भले ही किसी का हो। दूसरे हम कवि पर ईमान दारी से बोलने के लिए स्वतंत्र होते हैं। मैं उलझ गया और मुझे भी उनके साथ ट्रैन की जनरल डब्बे में यात्रा करना पड़ी। और उस समारोह में उन्होंने अपने वक्तव्य में त्रिलोक महावर की कविताओं पर आलोचनात्मक बातें भी कहीं। ज़ाहिर है जो किसी और ने नहीं कही थी ।इन सब बातों से विमोचन -कवि को भी अच्छा लगा कि कोई ऐसा भी मंच पर मौजूद अतिथि है जो आज के दिन भी थोड़ा तल्ख बोलकर मार्ग दिखा सकता है। इस आयोजन में हरिनारायण, राजेश जोशी, रामकुमार तिवारी भी मौजूद थे। अच्छा कार्यक्रम हुआ था। मैं उनके साथ ही कुमार सुरेश के कविता संग्रह भाषा सांस लेती है के विमोचन में भी लगभग इसी तरह गया था।

नरेन्द्र जैन एकांत प्रेमी रहे। वह पढ़ाकू टाइप लेखक हैं। उनके दोस्त सब तरह के लोग थे। उन्होंने अंततः पत्रिका का राजेंद्र शर्मा के साथ संपादन और प्रकाशन किया। मुमकिन है वह चौराहे पर बैठे मोची से बहुत देर तक दोस्ती की बातें कर रहे हो। रोजाना 4:00 बजे से 6:00 बजे तक शाम को वह ऐसे दोस्तों के साथ समय गुजारते जो ताश खेलते थे यानी कि नरेंद्र जैन ताश के भी अच्छे खिलाड़ी माने जाते रहे हैं मैंने तो उन्हें ताश खेलते हुए कभी नहीं देखा लेकिन कई लोगों ने बताया कि नरेंद्र जैन साहब अगर रमी‌ हो तो बाजी उनके ही हाथ में जाती है ऐसा अक्सर हुआ है।

अगर किसी रात में मैं उनके पास पहुंचता तो वह मुझे अपने डेस्कटॉप कंप्यूटर पर काम करते हुए मिलते और शुरू हो जाते अपने कलेक्शन को दिखाते दिखाते साहित्यिक अंदाज में बातें करने में। उन्होंने ही मुझे नूरजहां के गीतों के  वीडियो  यू ट्यूब पर दिखाए। पिकासो की पेंटिंग्स दिखाईं। उन्होंने ही मुझे कविता कोश दिखाया और यह बताया कि मेरी कविताएं भी उसमें शामिल हैं। इकबाल बानो द्वारा गायी गई फैज की नज्म हम देखेंगे, हम देखेंगे दिखाई। कैसे वह खुद संगत करते हुए गाते थे। एक से बढ़कर एक क्लासिक पेंटिंग्स, एक से एक बढ़कर फिल्मी गीतों के कलेक्शन उन्होंने अपनी गैलरी में जमा कर रखे थे। मंगलेश डबराल से उनकी अंतरंग मित्रता रही, एक ही कमरे में साथ रहने के दिनों की कुछ  अंतरंग बातें वह अक्सर सुनाते। एक सुबह जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो देखा कि वह एक रंगीन कवर वाली किताब पलट रहे हैं। मुझे भी उन्होंने उस पत्रिका की खूबी बताई। यह फैमिना का वार्षिक अंक था, और इसमें अद्भुत चित्र थे। पेंटिंग्स थीं। एक क्लासिक कलेक्शन से भरी हुई यह पत्रिका ग़ज़ब की साज सज्जा से अटी थी। उन्होंने कहा कि तुम भी खरीद लो। मैं घर लौटते समय इसे खरीदने के लिए स्टेशन के स्टाल पर गया। सचमुच मैंने इसे अभी तक संभाल कर रखी है।

नरेन्द्र जैन का साथ मिलते ही मेरी कविताई का जीवन बदल गया। ऐसा लगा कि अब राह मिल गयी। वह मेरी कविताओं में उम्मीद देखते और अपने बड़े कवि होने को थोपते नहीं। उनकी विनम्रता ग़ज़ब का प्रभाव देती। कविता सुधारते हुए वह पहले अनुमति लेते फिर केवल एक दो शब्दों को आहिस्ता से यहां से वहां करते और बड़े अच्छे अंदाज़ में कविता पाठ करते तो ऐसा लगता  कि यह तो कविता मेरी रही ही नहीं।यह उन्होंने बस शुरूआत के दिनों में किया।

1999 की बात है एक दिन वह बोले कि -ब्रज तुमको कविता पाठ करना है नागार्जुन स्मरण समारोह में …तो मैंने कहा कि मैं कहां और उसमें जो आमंत्रित कवि हैं वह कितने बड़े-बड़े कवि हैं !ऊपर से उसके आयोजक हैं डॉक्टर विजय बहादुर सिंह जो एक बहुत ही जाने माने हुए चयनकर्ता रहे हैं !तो मैं कैसे उसमें जा सकूंगा लेकिन वह बोले कि नहीं मैं बोल रहा हूं संचालन मुझे ही करना है तो तुम्हें तो कविता पाठ करना ही है।

इस तरह मैंने उस कवि सम्मेलन में जिसमें मुख्य रुप से आमंत्रित महान कवि त्रिलोचन शास्त्री थे ,अष्टभुजा शुक्ल ,बोधिसत्व, वेणुगोपाल,आदि कविता पाठ कर रहे थे उसमें मेरा नाम भी शामिल हो गया । कहने का आशय यह है कि जब पहचान और अस्तित्व के संकट के लिए नये कवि गुरु सेवा या अन्यतम उठा पटक कर रहे हों तब मुझे एक ऐसा कवि हाथ पकड़ कर बड़े मंच पर ले जा रहा हो तो उसके लिए आदर और स्नेह अपने आप आता है। मैं तो उनके साथ की पेय बैठक भी नहीं करता था। जबकि वह एक बार तो कहते थे कि अगर तुम चाहो तो मैं थोड़ी सी तैयार कर दूं.. थोड़ी सी।इन्कार ही करते जाने पर फिर कहते कोई बात नहीं। लेकिन एकाध बार तो मुझे उनका ऐसा इसरार कबूल करने का याद है। भाभी जी मुझे कदाचित उनके साथ देर तक इसी वजह से बैठे रहने देतीं कि उनके साथ कोई वैसा प्यासा नहीं बैठा है।

इस तरह मैं और वह लगभग बीस साल तक साथ में रहे हैं। लेकिन वह घोषित रूप से मदिरा सेवी और आज़ाद जीवी थे तो क‌ई बार उनसे दूर रहना भी उचित लगता था। जबकि उनका मानना था कि कवि को थोड़ा आवारा,अधूरा, और अव्यवस्थित होना चाहिए। तफ़रीह प्रिय  होना चाहिए। मैं ऐसा नहीं हो सका। मुझे तो रात के दस‌ बजे तक घर की याद आने लगती है। बचपन में पिताजी ने ऐसे संस्कार दिए और अब पत्नी जी  इनको पोषित कर रहीं हैं। और बकौल अंतरंग मित्र आलोक के कुछ अपन भी अलाल ठहरे। मेरे लिए ग़ालिब का एक शेर ही मुनक्कद हो गया।

न तीर कमां में है,न सैयाद कमीं है।

गोशे में कफ़स के मुझे आराम बहुत है।

लेकिन नरेन्द्र जैन अगर हुक्म करें कि आज नदी किनारे चलना है या किसी कार्यक्रम में चलना है तो मैं कम ही इंकार कर पाता। बासौदा और भोपाल की यात्राएं तो प्राय: साथ में ही   होतीं। इस मामले में हमारा दोस्ताना व्यवहार रहा।यानि अगर मैं उन्हें कहीं साथ ले जाना चाहता तो वह साथ जाते।

विदिशा में संगीत प्रेमी अक्सर फिल्मी संगीत की पकौड़ों की पार्टी के साथ बैठक का भी अच्छा चलन है और  इनमें शामिल होने वाले लोग उभयनिष्ठ हैं।जब डा. राकेश श्रीवास्तव के नये घर में आयोजित गोष्ठी में उन्हें मैं ले गया तो सब चौंके और खुश हुए। और तो और वह भी खुश रहे। उन्होंने खुद कहा कि मैं भी गुनगुनाना चाहता हूं। उन्होंने मोतीलाल पर फिल्माया गीत -ज़िंदगी ख्वाब है ,ख्वाब में झूठ क्या गाय तो उसकी संगीतात्मकता तो नहीं शब्दार्थ मुखर हो उठे थे।यहां दिनेश मोहन श्रीवास्तव भी उनके अंतरंग रहे। वैसे तो  उन्हें चाहने वालों की कमी नहीं।अक्सर वह भाभी से झगड़े के कारण विदिशा में ही होटल में किराए पर कमरा लेकर लिखते पढ़ते रहते। हालांकि भाभी उनकी शुभचिंतक के सिवा भला क्या होतीं। और मुझे वहीं तलब करते। अपनी ताजा कविताएं सुनाते। अनूदित रचनाएं आ सुनाते। कभी कभी एकाध प्रेम का किस्सा भी सुना देते जो अतिशयोक्ति जैसा लगता। विदेशी साहित्य के तो वह दीवाने हैं। खुद अच्छे चित्रकार हैं। रंग तो जैसे उनसे बातें करते हैं। कोलाज बनाना उनको अच्छा लगता है।एब्सट्रैक्ट के तो वह ऐसे जानकार हैं। मैंने उनकी कला केन्द्रित कविताओं पर एक टिप्पणी कला समय के लिए लिखी थी जो उन्हें बहुत पसंद आयी थी।बल्कि मित्र  विनय उपाध्याय ने ही कला और कविता के कुछ अंक लिखने का मुझे कहते हुए नरेंद्र जैन की कविता को लेने के लिए पहले मुझे कहा था।

हम जानते हैं कि नरेंद्र जैन बाकायदा वामपंथी कवि और कार्यकर्ता रहे हैं। जनवादी लेखक संघ में उनकी मौजूदगी असरदार थी, विदिशा में तो जलेस के सिपाही ही दृश्य में रहे।यहां जनवादियों का आना जाना  खूब हुआ,डा.विजय बहादुर सिंह तो सुना है राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।प्रलेसं  मात्र का था! पता नहीं इन सबके रहते हुए मैंने कैसे प्रलेसं की सदस्यता लेकर कुछ काम किए। मुझे दरअसल ओमप्रकाश शर्मा, और मालम सिंह चंद्रवंशी ने प्रलेसं हेतु प्रेरित किया। नरेन्द्र जैन हमारे हर कार्य क्रम में आते। उधर,कमला प्रसाद,भगवत रावत, कुमार अंबुज और शैलेंद्र शैली भी कहते कि नरेंद्र जैन से पूछ लिया करो। बाद में हमने इकाई बनाई, जिसमें आलोक श्रीवास्तव को अध्यक्ष और मुझे सचिव चुना गया।उन दिनों का एक प्रसंग है। आइए पढ़ लेते हैं।

हम लोगों ने एक शायर गोविंद आर्य निशात का एकल पाठ रखा, आलोक श्रीवास्तव संचालन और आशुतोष व्यास व्यवस्था कर रहे थे।कवि न जै भी आमंत्रित थे,न जै को पता नहीं क्यों कुछ ज्यादा नहीं जम रहा था कार्यक्रम तो वो बाहर के दरवाजे पर जाकर बैठ ग‌ए, और शायद पैगबाजी भी करने लगे। आलोक ने और मैंने उनसे अंदर आने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा कि मैं यहीं ठीक हूं। व्यवस्थापक होने के कारण मूड खराब हो रहा था, कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी नजै घर जाने के लिए तैयार ही नहीं। उन्होंने तो अपनी कविताएं निकाल लीं और शुरू… आखिर में गुस्सा आया और उन्हें जबरन हम लोग घर तक छोड़ कर आये। इस प्रसंग में खट्टी बात यह हुई कि आलोक भाई का दिल उनसे फट गया। लेकिन मैंने इसे एक कवि की सामान्य फितरत मानी, खुद नरेंद्र जैन भी सब भूल चुके थे।मगर आलोक श्रीवास्तव को उनसे जुड़ने में दो चार साल लगे।यह बात शहर में आम हो गई थी। मतलब यह कि कैसे नरेन्द्र जैन एक ऐसे प्रसंग से जुड़े। तभी उनका कहानी संग्रह एकालाप आया। कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो गया।

उन्होंने सेवानिवृत्त होने के बाद एक दुकान खोल ली। उसमें क्लासिक किताबें थी, बेचने के लिए। अनेक रंग की शीशियां,ब्रश कैनवस पेपर,तब हम लोगों के लिए अच्छा हो गया था, हमेशा एक अड्डा मुहैया हो गया। सुलखान सिंह हाड़ा,शिव डोयले, दिनेश मोहन श्रीवास्तव, अक्सर वहां मिल जाते। एक बार कुमार अंबुज आए, तो बैठक जमी, एक बार आनंद हर्षुल आए, राजेंद्र दानी भी, तो नजै ने मुझे फोन करके बुलाया, गपशप के साथ कहानी, कविता भी हुई। ऐसा वातावरण विदिशा में अब कहां रहा। उनकी शहर से विदाई के समय लक्ष्मीकांत कालुस्कर ने एक बैठक रखी थी, जिसमें,डा.सुरेश गर्ग,, दिनेश मिश्र, हाड़ा जी ने उनसे कुछ बातचीत की थी। सोचता ही रह गया कि उसे संभाल कर रखूंगा और प्रकाशित कराऊंगा मगर कहीं गुम हो गए वे पन्ने। वैसे मैंने उनसे एक साक्षात्कार लिया था जो वागर्थ में आया था।

तीन चार दिन पहले उन्होंने मुझे फोन पर ही कविता सुना‌ईं। हाल लिए और दिए।

वह इन दिनों उज्जैन में हैं। छः महीने अमरीका में  बिताकर आए हैं। और कह रहे थे कि विदिशा छोड़ कर वह अकेले हो गये हैं।

ब्रज श्रीवास्तव