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विधायक जी बैठक से गायब क्यों थे
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विधायक जी बैठक से गायब क्यों थे

जनता और जनप्रतिनिधियों का आमना-सामना पांच सालों में स़िर्फ एक बार ही होता है. वह तब, जब विधायक जी विधायक बनने की आस में जनता के आगे हाथ फैलाकर वोटों की भीख मांगते हैं. चुनाव खत्म होते ही जनप्रतिनिधि असली रंग रूप में आ जाते हैं. सबसे पहले तो ये विधासभा में आने का अपना मक़सद ही भूल जाते हैं. भूल जाते हैं कि उन्हें विधानसभा में उन बैठकों में उपस्थित होने के लिए भेजा गया है, जहां वे अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़ी जनता की समस्याओं पर चर्चा करेंगे. लेकिन हम आपको बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में आपके चुने हुए विधायकों का विधानसभा में क्या प्रदर्शन रहा है. ये विधायक, विधानसभा में होने वाली बैठकों में कितने दिन मौजूद रहे हैं, कितनी बैठकें हुई हैं, कितने बिलों पर चर्चा हुई, जनहित से जुड़े कितने प्रश्नों को विधानसभा में उठाया गया और इस दौरान कितने बिल पास हुए.

आप अपना विधायक चुनते हैं. इस उम्मीद के साथ कि आपके चुने हुए प्रतिनिधियों ने जो वादा आपसे वोट मांगते हुए किया था, उसे निभाएंगे. लेकिन होता ठीक इसके उलट है. चुनाव जीतते ही पता चलता है कि विधायक जी के तो तेवर ही बदल गए हैं. जनाब विधानसभा सत्रों की बैठकों से नदारद रहते हैं. अब चुनाव सामने हैं. अब जनता के पास मौक़ा है कि वह अपने वोट की ताक़त का अहसास भी कराएं.

एडीआर ने राज्यों की विधानसभा में विधायकों की उपस्थिति के जो आंक़डें पेश किए हैं, उनमें कई ऐसे तथ्य हैं, जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि जनता के इन प्यारे विधायकों ने किस तरह उन्हें छला है. एडीआर की इस रिपोर्ट में सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला तथ्य उत्तर प्रदेश से जुड़ा है. बात विधानसभा सत्रों की बैठकों में विधायकों के औसतन उपस्थिति की करें, तो उत्तर प्रदेश के विधायकों की विधानसभा में औसत उपस्थिति प्रतिवर्ष महज़ 23 फीसदी ही रही, यानी विधायकों की सबसे कम औसतन उपस्थिति के मामले सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश में ही हैं. अब जनता को अपने जनप्रतिनिधियों से इस बार पूछना चाहिए, इस बात का हिसाब-किताब मांगना चाहिए कि जब उनके खून-पसीने की गा़ढी कमाई से विधानसभा के सत्र चलते हैं तो ये विधायक अपना क़ीमती व़क्त कहां ज़ाया कर रहे होते हैं. इनके पास ऐसा कौन सा महत्वपूर्ण काम होता है, जो जनता की समस्याओं को भी ताक़ पर रखने के लिए मजबूर करता है. जिस दौरान विभिन्न बिलों पर चर्चा हो रही होती है, उस व़क्त आपके क्षेत्र के विधायक बैठक से ग़ायब रहकर न स़िर्फ अपनी ड्यूटी से मुंह मोड़ते हैं, बल्कि क्षेत्र की उस जनता की आवाज़ को भी दरकिनार कर देते हैं. आंकड़े बताते हैं कि सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में महज़ 89 बैठकों में ही 157 बिल पास हो गए. पहले पहल तो ताज्जुब होता है कि यह कमाल कैसे हो गया. जहां एक बिल को पास करने में चर्चाएं इतनी लंबी खिंच जाती हैं कि कई बिल तो सालों तक भी पास नहीं हो पाते, ऐसे में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 157 बिलों का पास होना हैरत में डाल देता है. लेकिन ग़ौर करें तो तस्वीर सा़फ हो जाती है कि इतनी कम बैठकों में इन बिलों को पास करने में कितनी सूझबूझ और समझदारी दिखाई गई होगी. आमतौर पर एक बिल को पास करने के लिए पर्याप्त चर्चा की जाती है और उस लिहाज़ से बैठकों और पास हुए बिलों की संख्या में कोई तर्कसंगत बात नज़र नहीं आती है. इस बात को कोई बच्चा भी समझ सकता है कि विधायकों ने किस खानापूर्ति वाले रवैये का इस्तेमाल करके जनता के हित से जुड़े बिलों को आनन-फानन में पास किया है. इन बिलों पर न तो ज़रूरी चर्चा हुई होगी और न ही बहस.

5 राज्यों में पिछले पांच सालों की विधानसभा की सर्वाधिक बैठकों की औसतन संख्या पर बात करते हैं. अगर गोवा की बात करें तो यहां की विधानसभा की सर्वाधिक बैठकों की औसतन संख्या 26 है, यानी यहां पिछले पांच सालों में मात्र 26 बैठकें हुईं. उसके बाद मणिपुर में 24 और उत्तर प्रदेश में बैठकों की संख्या 22 है. इसके अलावा सबसे कम बैठकों की औसतन संख्या पंजाब और उत्तराखंड की है, यानी यहां की विधानसभा की सर्वाधिक बैठकों की औसतन संख्या 19 है. बैठकों की संख्या के अलावा अगर बात करें विधायकों की सर्वाधिक औसतन उपस्थिति की, तो उत्तराखंड विधानसभा में विधायकों की औसतन उपस्थिति 91 प्रतिशत है, वहीं पंजाब में यह 71 प्रतिशत और मणिपुर में 65 प्रतिशत है. यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि इन पांच राज्यों में विधायकों की सबसे कम औसतन उपस्थिति के मामले में उत्तर प्रदेश का नाम सबसे पहले आता है. जी हां, उत्तर प्रदेश में विधायकों की औसतन उपस्थिति सबसे कम यानी मात्र 23 प्रतिशत है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले पांच वर्षों में मणिपुर विधानसभा में सबसे अधिक 110 दिन विधानसभा की बैठकें चलीं और सबसे कम बैठकें उत्तराखंड में चलीं. यहां पिछले पांच सालों में महज़ 68 दिन ही बैठकें चलीं. यहां विधायकों द्वारा सबसे अधिक यानी 8796 प्रश्न गोवा विधानसभा में पूछे गए और सबसे कम प्रश्न मणिपुर विधानसभा में पूछे गए. यहां मात्र 565 प्रश्न ही पूछे गए. ग़ौरतलब है कि इस मसले पर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह जवाब मुहैया ही नहीं कराया है. उत्तर प्रदेश एक मामले में अव्वल रहा है वह है बिल पास करने में. यहां महज़ चार साल में ही 157 बिल पास हुए. सबसे कम 35 बिल मणिपुर में पास हुए. सबसे कम महज़ 11 बार मणिपुर विधानसभा की बैठक स्थगित की गई.

बहरहाल, विधानसभा के चुनावों में जनता को सचेत रहने की ज़रूरत है. जनता अपने मौजूदा विधायकों की ज़िम्मेदारियां और उनके प्रदर्शन का रिपोर्ट कार्ड देखे, समझे. फिर इस आधार पर इन सभी विधायकों से जवाब मांगे कि आ़िखर उन्हें जनहित से भी ज़रूरी और कौन से काम आ गए, जो उन्होंने सत्रों की बैठकों से ग़ायब रहना उचित समझा.

राज्य विधानसभा माने गए वर्ष विधानसभा के सत्रों की संख्या बैठकों की कुल संख्या बैठकों की औसत संख्या/वर्ष विधायकों की औसतन उपस्थिति (%) विधानसभा स्थगित किए जाने की समय संख्या
उत्तर प्रदेश (फरवरी 11 तक) 4 वर्ष 10 89 22 23% 26
पंजाब  (जनवरी 11 तक) 5 वर्ष 17 240 48 71% 14
मणिपुर (अगस्त 11 तक) 4.5 वर्ष 11 110 24 65 % 11
उत्तराखंड (सितंबर 10 तक) 3.5 वर्ष 11 68 19 91% 108
गोवा  (फरवरी 11 तक) 3.5 वर्ष 12 95 26 60% 85
लोकसभा (दिसंबर 10 तक) 2.5 वर्ष 9 208 77 मौजूद नहीं मौजूद नहीं

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