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जल ही जीवन है
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जल

जल

हम सब अपने दैनिक कार्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं की हम ये तक भूल जाते है की जल हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है. अगर जल को औषधि रूप में प्रयोग  किया जाए तो जल को ‘अमृत’ कहा गया है अर्थात जो मृत जीवन को जीवित करे. जहां अशुद्ध जल भिन्न भिन्न प्रकार के रोगों को शमन करता है. ज्वर, अतिसार, पेचिश, अजीर्ण, कब्ज़, कृमि आदि रोगों से बचने के लिए पानी शुद्ध करके उबाल के ही काम में लेना चाहिए. औषधि के रूप जल को शीतल अथवा उष्ण दोनों ही प्रकार से काम में लिया जाता हैं.

शीतोपचार: शीतल जल का प्रयोग प्रकृति के अनुसार वात, पैत्तिक प्रकृति के लिए उपयुत्क हैं. शीतल जल रक्त को रोकता है, यानी बहते हुए रक्त पर अत्यंत शीतल जल डाला जाए तो रक्त का बहाव रुक जाएगा. यह दाह का भी शमन करता है. जैसे जले हुए अंग पर पानी डालने से एकदम शान्ति मिलती है. नाडी संसथान के लिए भी जल एक ताकतवर स्त्रोत हैं. निम्न रोगों में जल अधिक उपयोगी है.

नकसीरनकसीर आने पर ललाट पर गीली पट्टी लगाने से नकसीर बंद हो जाती है.

गर्भावस्था शोथस्त्रियों में मासिक में होने वाले अधिक रक्त स्त्राव में बर्फ की पट्टी को नाभि से नीचे वाले प्रदेश पर रखने से लाभ मिलता है. प्रसुतावास्था में भी रक्त स्त्राव अधिक होने पर पानी की या बर्फ की थैली को गर्भाशय पर रखकर सेंकने से सुजन कम हो जाती है तथा दर्द में आराम मिलता हैं.

संकोचनठंडा पानी संकोचन क्रिया का कार्य भी करता है जैसे किसी स्थान पर लग जाने से वहा शोथ हो जाता है. उस स्थान को बर्फ से सेंकने पर सूजन कम हो जाता हैं.

प्रदरस्त्रियों में होने वाले सफ़ेद लाल पानी के स्त्राव को ठन्डे पानी की पिचकारी से धोने से लाभ मिलता हैं.

वमनगर्मी में होने वाले वमन में बर्फ का पानी पिलाने से अथवा आमाशय पर बर्फ कटोरी में डालकर सेंकने से वमन तुरंत बंद हो जाती हैं.

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