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उत्तर प्रदेश और निर्दलीय उम्मीदवार : कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना, कभी वह भी मना
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उत्तर प्रदेश और निर्दलीय उम्मीदवार : कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना, कभी वह भी मना

सूबे में गठबंधन राजनीति का दौर क्या आया, निर्दलीयों की अहमियत में चार चांद लग गए, उनका मोल लगने लगा. हालांकि निर्दलीयों के लिए ऐसा अवसर कई बार आया, जब सत्ता की दावेदारी रखने वालों ने उन्हें लालबत्ती से नवाज़ कर कैबिनेट मंत्री तक का दर्जा दिया, लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकारों में उन्हें अहमियत नहीं मिली. कहते हैं, अधिकतर यही होता रहा है कि जिसकी सरकार रही, अधिकतर निर्दलीय उसी के खेमे में जाते रहे. बिना शर्त समर्थन देने वालों को बिना लालबत्ती के ही रहना पड़ा. वैसे त्रिशंकु विधानसभाओं में निर्दलीयों की पौ बारह रही. राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस बार अगर किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो छोटे दलों के साथ-साथ निर्दलीय विधायकों की अहमियत बढ़ने की प्रबल संभावना है. इस बार छोटे दलों की संख्या क़रीब 150 के आसपास है. बसपा के शासन में इस बार निर्दलीयों की कोई कद्र नहीं रही. बसपा ने अपने 110 विधायकों को कमज़ोर मानकर उनके टिकट काट दिए. उनमें से ज़्यादातर पहले तो बड़े दलों में टिकट के लिए चक्कर लगाते रहे, लेकिन जब निराशा हाथ लगी तो पीस पार्टी, अपना दल, जदयू एवं अन्य छोटी पार्टियों से टिकट पा गए. बहुत से विधायक निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. मथुरा से बसपा विधायक श्याम सुंदर शर्मा का टिकट कट गया तो वह ब्राह्मण स्वाभिमान की अलख जगाते हुए निर्दलीय ही मांट सीट से चुनाव लड़ने कूद पड़े हैं. प्रदेश सरकार में कुछ समय पहले तक मंत्री रहे राजपाल त्यागी फिर निर्दलीय ही चुनाव लड़ रहे हैं. माना जा रहा है कि इस बार निर्दलीय विधायकों की तादाद बढ़ेगी.

वर्ष 2007 में निर्दलीय चुनाव लड़कर जीतने वालों की तादाद तो नौ ही रही, लेकिन जो जीते, उनमें दो ऐसे सूरमा रहे, जो सर्वाधिक वोटों से जीतने वाले टॉप दस विधायकों में पहला-दूसरा स्थान पा गए. प्रतापगढ़ के कुंडा विधानसभा क्षेत्र से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया सर्वाधिक वोटों से जीते थे. क्षत्रिय गौरव के प्रतीक बने राजा भैया पर मुख्यमंत्री मायावती की नज़रें टेढ़ी हो चुकी हैं. वह उन्हें जेल भी भिजवा चुकी हैं. इस बार वह निर्दलीय ही ताल ठोंक रहे हैं. वही बाहुबली अखिलेश कुमार सिंह कांग्रेस में रहकर जीतते रहे हैं. सोनिया गांधी के गढ़ रायबरेली में वह निर्दलीय जीतकर अपना असर साबित कर चुके हैं. पिछले चुनाव में उन्होंने भारी अंतर से जीत हासिल की थी. अखिलेश सिंह इस बार पीस पार्टी से चुनाव लड़ रहे है. निर्दलीय विधायक इमरान मसूद एवं अजय राय कांग्रेस और अशोक यादव जदयू से चुनाव लड़ रहे हैं. मुख्तार अंसारी पिछली बार निर्दलीय ही कामयाब हो गए थे. इस बार कौमी एकता दल के मार्फत मैदान में हैं. मौजूदा निर्दलीय विधायकों में अखिलेश सिंह, अजय राय, अशोक यादव, इमरान मसूद, मुख्तार अंसारी, यशपाल सिंह रावत, रघुराज प्रताप सिंह, रामप्रकाश यादव, विनोद कुमार एवं राजपाल त्यागी आदि शामिल हैं

वर्ष

निर्दलीय प्रत्याशी

जीते

वोट प्रतिशत

1952

1005

14

9.50

1957

662

74

8.68

1962

694

31

12.91

1967

1237

37

18.72

1969

674

18

7.16

1974

1522

05

10.24

1977

1976

16

15.23

1980

2221

16

10.66

1985

3674

25

16.71

1989

3579

40

15.32

1991

4898

07

7.42

1993

6537

08

6.77

1996

2031

13

6.52

2002

2353

16

7.67

2007

2581

09

7.89

 पंद्रहवीं विधानसभा और काबिल माननीय

15वीं विधानसभा में पहुंचने वाले 403 माननीयों में अधिकतर डिग्रीधारी हैं, जिनमें स्नातकों की संख्या 112,  स्नातकोत्तरों की संख्या 55 और विधि स्नातकों की संख्या 35 रही. इनमें से 48 विधि स्नातकोत्तर विधानसभा में जनता की सेवा करने पहुंचे थे. तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा एवं इंजीनियरिंग करने वाले 14 विधायक थे. पीएचडी एवं अन्य उच्च शैक्षिक अर्हताधारी आठ विधायकों को विधानसभा जाने का मौक़ा मिला. केवल 36 विधायक ऐसे थे, जो इंटरमीडिएट उत्तीर्ण थे. नौ हाईस्कल और इससे भी कम पढ़े थे. 59 विधायकों की शिक्षा के बारे में कोई जानकारी चुनाव आयोग को प्राप्त नहीं हो सकी. इस विधानसभा की विडंबना यह रही कि बहुमत वाली सरकार ने 403 विधायकों में से 110 विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, क्योंकि उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों का इल्ज़ाम था अथवा वे अन्य गतिविधियों में लिप्त थे. इनमें कई बाहुबली-धनबली थे, वहीं कुछ आपराधिक विचारधारा के थे, जिन्हें पार्टी ने चुनाव के ऐन व़क्त पर गले लगाकर टिकट बांटा था. बाद में यूज एंड थ्रो वाली नीति अपनाकर पार्टी से जुदा कर दिया. राजनीतिक पंडित मानते हैं कि 16वीं विधानसभा में परिवर्तन आएगा, जब कई ऐसे माननीयों को जनता चुनकर भेजेगी, जो विकास की बात सोचेंगे. इस बार लोकपाल पर जोर देने और मतदाताओं को जागरूक करने के लिए कई समाजसेवी संस्थाएं एवं विद्यार्थी लगे हुए हैं. विशेष बात यह है कि प्रदेश में पचास प्रतिशत के आसपास युवा मतदाता हैं, जो राजनीतिक बारीकियों को समझने लगे हैं. गांव में पंचायतों के चुनाव ने इन्हें वोट देने का पाठ पढ़ा दिया है कि वोट कितना मूल्यवान होता है. हर किसी को सोच-समझ कर वोट ज़रूर डालना चाहिए, ताकि अच्छे लोग विधानसभा पहुंच सकें.

– दर्शन शर्मा

शराब की पेटी में प्रचार सामग्री

चुनाव आयोग की नज़र प्रदेश के चप्पे-चप्पे पर है. यह बात कांग्रेस कार्यालय में शराब की पेटियों में बंद प्रचार सामग्री मिलने से सामने आई. शराब की पेटी में बंद प्रचार सामग्री मिलने की ख़बर से जहां चुनाव आयोग के कर्मचारी सन्न थे, वहीं मीडिया वाले अपने कैमरों में इन पेटियों को कैद करने में जुटे हुए थे. खबर सुनते ही कांग्रेसियों का हुजूम कांग्रेस कार्यालय पर आ डटा. मामला तूल पकड़ने लगा तो लखनऊ के डीएम अनिल सागर और डीआईजी डी के ठाकुर भी मौक़े पर पहुंच गए. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी को भी अनायास पहुंचना पड़ा. वह फौरन सत्यता उजागर करने के लिए एक-एक पेटी खोलकर उसमें से प्रचार सामग्री निकाल कर ख़बरिया चैनलों के सामने उड़ेलते हुए बोलीं, देखो क्या है इनके अंदर. दरअसल यह अफवाह तब फैली, जब कांग्रेस की चुनाव प्रचार सामग्री लेकर ट्रक शाम के वक्त पार्टी के प्रदेश कार्यालय पहुंचा. प्रचार सामग्री का बड़ा हिस्सा अंग्रेजी शराब की पेटियों में पैक था. इससे ही अफवाह फैली थी कि पार्टी मुख्यालय में चुनाव में इस्तेमाल के लिए शराब उतारी जा रही है. बहरहाल, शराब की पेटियों में प्रचार सामग्री भले ही निकली हो, लेकिन चुनाव के दौरान इस तरह प्रचार सामग्री लाने का औचित्य ही क्या बनता था. यह तो वही कहावत हुई कि आ बैल, मुझे मार. मालूम हो कि चुनाव आयोग ने शराब पर पाबंदी लगा रखी है. कांग्रेस की प्रचार सामग्री शराब की पेटियों में पैक होकर आए तो इसमें मीडिया वालों या किसी अन्य का क्या दोष?

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