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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप
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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप

जिस तरह सेना के नेतृत्व में भ्रष्ट बैंकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों की साझेदारी से ऊर्जा और अन्य कंपनियों के हितों के लिए अमेरिकी मीडिया व्यवसायिक घरानों का मुखपत्र बन गई थी, उसी तरह भारत में भी व्यवसायिक समूहों के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों में नीरा राडिया टेप के केस के दौरान टीवी एंकर कॉर्पोरेट घरानों का रु़ख लोगों के सामने रख रहे थे. जनरल वीके सिंह के केस में हुई चर्चा के दौरान आधिकारिक मान्यता रखने वाले आईएएस और आईएफएस अधिकारी बहुत ही दयनीय और पक्षपात पूर्ण बातें कह रहे थे, ताकि वे कुछ लोंगों के सामने अपनी छवि बना सकें.

अन्ना हजारे के बीते 26 मार्च को जंतर मंतर पर किए गए एक दिन के अनशन का बहुत सारे टीवी चैनलोंने चैनल मालिकों के आदेश पर बहिष्कार किया था. मूल रूप से हिसार शहर के रहने वाले अरविंद केजरीवाल के बहादुरी और चुनौती पूर्ण बयान और संसद का केजरीवाल पर ग़ुस्सा ही अनशन को सुर्खियों में लेकर आया था. मध्य प्रदेश के मुरैना में आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की हत्या का मामला चैनलों और मीडिया में वापस आ गया था. (जनरल वीके सिंह का परिवार भी हरियाणा के भिवानी का ही रहने वाला है. हरियाणा ने हमें बड़ी संख्या में बहादुर और ईमानदार सैनिक और अधिकारी दिए हैं.) भारत में बेशर्म, भ्रष्ट, अभिमानी शासक वर्ग की बड़े व्यवसायिक घरानों और अधिकारिक वर्ग की साठगांठ ने हमारे देश को हास्यास्पद बना दिया है, संभवतः बनाना रिपब्लिक बना दिया है. प्रतिदिन हो रहे बड़े-बड़े घोटालों का खुलासा आखिर क्या साबित करता है. राजनीतिक वर्ग न ही कभी आत्म विश्लेषण करेगा और न कभी समस्या के समाधान के साथ सामने आएगा, बल्कि वह स्वयं पर लगे आरोप को लेकर हो रही आलोचना का मुंहतोड़ जवाब देने की कोशिश करता है. संसद में पूरा राजनीतिक वर्ग अयोग्य जनप्रतिनिधि होने के दृश्य बना रहा है.

यह सब बहुत आवश्यक इसलिए है, क्योंकि यह आरोप लगता रहा है कि टीकेए नायर प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव इस मामले के पीछे हैं. जन्म तिथि विवाद के सबके सामने आने से पहले नायर ने अपने कुछ विश्वस्त लोगों को यह बताया था कि मई 2012 में वीके सिंह को जाना ही होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपनी पत्नी को यह भरोसा दिया है कि बिक्रम सिंह ही अगले लेना प्रमुख होंगे. संयोगवश यह सज्जन ही प्रशासनिक सेवा में एड्‌होक्रेसी के मुख्य संवाहक थे.

लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार को खत्म कर सकेगा और इस पर लगाम लगा सकेगा, यह अलग मुद्दा है. लेकिन राजनीतिक वर्ग पचास सालों से इस क़ानून को न लाकर यही करता आ रहा है. निर्वाचित की निर्वाचन योग्य व्यक्ति पर यह निरंकुशता चलती रहेगी. यहां एक अच्छे लोकपाल बिल के लिए कोई ईमानदार कोशिश होती नहीं दिख रही है. एक सांसद ने तो ईमानदारी से यह स्वीकार कर लिया कि हम इस बिल को पास नहीं होने देना चाहते हैं, नहीं तो हममें से कई लोग जेल चले जाएंगे. भारत एक सामंती देश है, जो कुछ प्रभावशाली राजनेताओं और सामंतों के क़ब्ज़े में है, जिन्होंने स्पेक्ट्रम, तेल, गैस और देश के अन्य संसाधनों को बिना उचित क़ीमत चुकाए अपने क़ब्ज़े में कर लिया है. मिस्र के लोग भी भारतीयों की तरह आलसी होते हैं, लेकिन उन्होंने निरंकुश और लुटेरे शासक के खिला़फ विद्रोह किया, लेकिन भारतीय ऐसा नहीं कर सके. उन्होंने देश के लिए त्याग किया और वह अब भी ऐसा कर रहे हैं. उन्होंने चार दशक तक अमेरिका के हाथ की कठपुतली बने रहे होसनी मुबारक के खिला़फ विद्रोह कर उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया. भारत में क्रांति होने की संभावना बहुत ही कम है. इसलिए यहां कोई समानता का अधिकार क़ानून कार्यशील नहीं है. सभी जानते हैं कि सेना की खरीद के लिए होने वाले मोटे ठेकों से चुनाव लड़ने और उच्चस्तरीय जीवन शैली के लिए शासक वर्ग पैसे कमीशन के रूप में उगाहता है. यह मराठा शासन के दौर में लगने वाले चौथ और सरदेशमुखी की तरह है. अधिकतर भारतीय शासकों की तरह आज के शासक बाहरी आक्रमण से बामुश्किल ही सुरक्षा देते हैं, जैसा मुंबई हमले के समय हुआ था. सरकार आज भी पाकिस्तानियों द्वारा तीन दिनों तक मुंबई के साथ हुए बलात्कार पर आज भी मंत्रणा कर रही है.

ईमानदार सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह द्वारा उन्हें घूस की पेशकश किए जाने का खुलासा यह दिखाता है कि सेना भी भ्रष्टाचार के कैंसर, जातिवाद, धर्म के वायरस से ग्रसित हो गई है. जनरल वीके सिंह के एक बिचौलिए के 14 करोड़ की रिश्वत की पेशकश के खुलासे के बाद पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय चौधरी ने 27 मार्च को कहा कि आरोप को केवल सेना तक सीमित नहीं रखना चाहिए, इसे रक्षा मंत्रालय से जोड़कर भी देखना चाहिए. सारा ध्यान सेना पर केंद्रित क्यों है. सेना में भ्रष्टाचार की संभावनाएं बहुत कम है, क्योंकि हथियारों की खरीददारी में सेना की सीमित भूमिका होती है. खरीददारी की पूरी प्रक्रिया में पैसे का लेन-देन रक्षा मंत्रालय से होता है. जनरल रॉय चौधरी ने भारतीय सेना के प्रमुख के रूप में नवंबर 1994 से सितंबर 1997 तक कार्य किया था. जनरल सिंह के जन्मतिथि विवाद के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने इसे एक सोची-समझी साज़िश बताया. जनरल रॉय चौधरी ने इस पर कहा कि हालांकि ये सभी अटकलें हैं कि सभी लोग अब भी इसे ही सही मानते हैं. जब वर्तमान सेना प्रमुख ने कार्यभार संभाला था, तब उन्होंने कहा था कि मैं इस तंत्र की पूरी तरह स़फाई करने जा रहा हूं. सिस्टम के बाहर से भी इसके कई संबंध हैं. यह सब विवाद उसकी प्रतिक्रिया हो सकता है, लेकिन उन्होंने कहा कि ये सब अटकलें ही हैं. जनरल रॉय चौधरी ने कहा कि जनरल सिंह को संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि जिस तरह उन्होंने सिस्टम को सा़फ करने की क़वायद में बाहरी एजेंसियों के खिला़फ काम किया है.

वर्तमान विवाद का हवाला देते हुए जनरल रॉय ने कहा कि व्यक्ति का रिश्वत लेने से इंकार करना, यह दिखाता है कि सभी लोग भ्रष्ट नहीं हैं, इसलिए पूरे सिस्टम को नहीं ढहा देना चाहिए. जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि ब्यूरोक्रेसी वह संस्थान है, जो सरकार के अनिर्वाचित अधिकारियों का संगठन होता है और वह संस्था के नियम क़ायदों के आधार पर काम करता है. एड्‌होक्रेसी इसके विपरीत किसी व्यक्ति विशेष या एजेंडे के अंतर्गत कार्य करती है. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय ब्यूरोक्रेसी किसी एजेंडे के अंतर्गत काम करने वाली एड्‌होक्रेसी में बदल गई है. इस नव-उदारीकरण के एजेंडे में सामूहिक रूप से इसके समर्थक सरकार, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और भारत के कॉर्पोरेट क्षेत्र जिसमें रियल स्टेट में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विशेष आर्थिक क्षेत्र के लाइसेंस पाने, जनजातीय वनों को खनन माफियाओं को परोसनेवाले, करोड़ों रुपये का न्यूक्लियर बोनांनजा, वृहद ऊर्जा दायित्वों के लिए कम नागरिक उत्तरदायित्व, जीएम खाद्य पदार्थों को ज़बरदस्ती लोगों का निवाला बनाने और खेती में नॉलेज इनीशियेटिव के ज़रिये अमेरिकी फायदों के लिए भारतीय किसानों के हितों को गिरवी रख देने, कृषि कार्यों में सहयोग और खाद्य सुरक्षा के समझौते, खुदरा बाज़ार का भूमंडलीकरण और विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में प्रवेश जैसे मसले शामिल हैं.

अधीनता से शुरुआत करने वाले इस देश के इस एजेंडे में विकास की आशाओं के साथ वृहद भिन्नताएं हैं. भारत के राष्ट्रपिता के नज़रिये में स्वतंत्र भारत का समाज दूसरों से भिन्न होगा. यह अपने आप में विशिष्ट होगा. गांधी का भारत विशाल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, वित्त पोषित विकास परियोजनाओं, वृहद उद्योगों की स्थापना और खनन और पूंजीवाद के नेतृत्व वाले बाज़ार आधारित ग्रोथ वाला नहीं था. उन्होंने एक न्याय संगत, सबकी भागीदारी, छोटी सुंदर आवश्यकता आधारित, समावेशी और संतुलित विकास आधारित भारत की परिकल्पना की थी, जहां पर्यावरण संरक्षण के साथ आजीविका की बात की गई थी. इस सामाजिक आर्थिक परिकल्पना को साकार करने के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की स्थापना की गई थी और इसे संविधान के प्रति वचनबद्ध बनाया गया था.

आज का नव-उदारवादी एजेंडा इसके बिलकुल विपरीत है, जो भारत को मल्टीनेशनल कंपनियों, करोड़पतियों, अरबपतियों और 30 करोड़ की जनसंख्या वाले मध्यम वर्ग को बाज़ार उपलब्ध कराने के लिए काम कर रहा है. बाक़ी 80 करोड़ से ज़्यादा भारतीय साक्षर कुपोषित भीड़ के रूप में अपना जीवन गुज़ार रहे हैं. इस एजेंडे को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अंदर ही एड्‌होक्रेसी की एक नई नस्ल आगे बढ़ा रही है, जो इस तंत्र के अंदर पक्षपात से आगे ब़ढ रही है. जबसे (2004 में) यूपीए सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सत्ता अपने हाथों में ली है. दो तरीक़े की एड्‌होक्रेसी सामने घूम रही है. इनमें से एक की पैदाइश अंदर ही अंदर एक भाषाई समुदाय ने की है. एक व़क्त तो ऐसा भी आया था, जब दिल्ली के हर ताक़तवर गलियारे के लगभग सभी ऊंचे पदों पर यही लोग थे. दूसरी वह व़फादार कोर है, जिसे नव-उदारवादी एजेंडा लागू करने के लिए एक साथ रखा गया. प्रधानमंत्री कार्यालय की सक्रिय भागीदारी के बाद क्लेन विदइन क्लेन (गिरोह की तरह काम करने वाला) एड्‌होक्रेसी तीव्र और उग्र तरीक़े से ब़ढी और इनमें से कई ताक़तवर और मलाईदार पदों पर आसीन हो गए. कुछ पदों को छोड़ दिया जाए तो बाक़ी एजेंडा पद धनवान और ताक़तवर लोगों के सहयोग से भर दिए गए. ब्यूरोक्रेसी की स्थापना नियम क़ानूनों केे पालन के लिए की गई थी. भारतीय सिविल सेवा को प्रशासन का स्टील फ्रेम कहा जाता है, क्योंकि प्रशासनिक व्यक्ति क़ानून से किसी भी तरीक़े से हो रहे विचलन को अपराध की तरह देखते थे, लेकिन आईसीएस के उत्तराधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से इस स्तर को और ऊंचा रखने की उम्मीद थी. यहां उतार-चढ़ाव तो थे, लेकिन यहां किसी भी पुरुष और महिला की मेरिट के आधार पर तरक्क़ी और पोस्टिंग सुनिश्चित थी.

दूसरी तऱफ एड्‌होक्रेसी नियम क़ायदों और प्रक्रिया को ताक़ पर रखते हुए पोषित होती रही. सरकार में सचिव, सहसचिव, संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव जैसे उच्च पद केवल एक विशिष्ट समुदाय और उनके एजेंडे को आगे बढ़ने में मददगार व़फादार लोगों द्वारा ही भरे जाते रहे हैं, जो ब्यूरोक्रेसी पर अपना शासन चलाते हैं. यह कुटिलता से निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. इसका परिणाम नीतिगत स्तर पर हर तरह का असफलता, घुटन भरा भ्रष्टाचार और गवर्नेंस के पतन के रूप में हम सबके सामने है. जो हाल एड्‌होक्रेसी ने प्रशासन का किया है, उनके इरादे से तो यही लगता है कि वे सेना मुख्यालय में भी अपनी पैठ बना चुके हैं. 2005 में किसी समय तत्कालिक सेना प्रमुख (जनरल जेजे सिंह) ने एक अनोखी लुक डाउन पॉलिसी की शुरुआत सेना के उच्च स्तर पर लाइन ऑफ सक्शेसन को जानने के लिए की थी. वह केवल तत्कालिक उत्तराधिकारी को नहीं देख रहे थे, बल्कि वह 2012 की गहराई में देख रहे थे. उन्होंने अपने एक चहेते बिग्रेडियर बिक्रम सिंह को वहां पाया. सेना प्रमुख ने घटनाओं और तिथियों के आधार पर यह अनुमान लगा लिया था कि 2010 में जनरल वीके सिंह निश्चित रूप से सेना प्रमुख बनेंगे और उन्हें बिक्रम सिंह को उनके उत्तराधिकारी के रूप में देखना है तो कोई न कोई मेनीपुलेशन करना पड़ेगा.

एक बार जब यह एजेंडा फिक्स हो गया, तो सभी चीज़ों ने अपना काम करना शुरू कर दिया. एमएस ब्रांच के कुछ लोगों ने उस यूपीएससी में वीके सिंह के उस आवेदन को ढूंढ निकाला, जिसमें इनकी आयु 1950 दर्ज है, जिसका वीके सिंह के सेना प्रमुख के रूप में कार्यकाल को कम करने में ब्राह्मास्त्र की तरह उपयोग किया गया और यहां से बिक्रम सिंह को उनके उत्तराधिकारी के रूप में 2012 में बैठाने का रास्ता सा़फ हो गया. वह काग़ज़ जो वीके सिंह की जन्म तिथि 1951 सिद्ध करता, उसकी उपेक्षा की गई. वीके सिंह की जन्म वर्ष की स्व-स्वीकृति का नाटक रचा गया. लेकिन वहां बहुत सारी बाधाएं थीं. उस समय यह फेवरेट (बिक्रम सिंह) सेना प्रमुख बनने की दौड़ में सबसे आगे नहीं थे. उनसे आगे रहने वालों को भी इस दौड़ से बाहर करना था. इसके लिए ओप मोसेस नाम की एक सूची बनाई गई, जिसमें इस बात का ध्यान रखा गया कि किस तरह ब्रिक्रम सिंह की ताजपोशी के लिए आसान रास्ता बनाया जाए. ओप मोसेस लिस्ट के कुछ ताक़तवर और प्रभावशाली खतरों को ब्रिगेडियर और मेजर जनरलों ने धीरे-धारे करके एक-एक को जोड़-तोड़ करके रास्ते से हटा दिया. सेना के एड्‌होक्रेसी में लिप्त लोगों ने जनरल वीके सिंह के उम्र विवाद को तूल दिया, जिसने सारे देश को हिला कर रख दिया. वास्तविक जन्म तिथि का मामला रिकॉर्ड में आंकड़ों का है, जैसा उच्चतम न्यायालय ने कहा. क्या यह वैसा मामला है, जिस तरह इस मामले का लोगों के सामने लाया गया. इस मामले की गहन जांच की आवश्यकता है. यह सब बहुत आवश्यक इसलिए है, क्योंकि यह आरोप लगता रहा है कि टीकेए नायर प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव इस मामले के पीछे हैं. जन्म तिथि विवाद के सबके सामने आने से पहले नायर ने अपने कुछ विश्वस्त लोगों को यह बताया था कि मई 2012 में वीके सिंह को जाना ही होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपनी पत्नी को यह भरोसा दिया है कि बिक्रम सिंह ही अगले लेना प्रमुख होंगे. संयोगवश यह सज्जन ही प्रशासनिक सेवा में एड्‌होक्रेसी के मुख्य संवाहक थे. हमने प्रशासनिक एड्‌होके्रसी के निर्माण के नव-उदारवादी एजेंडे को देखा है. लेकिन सेना के लिए एड्‌होक्रेसी का क्या एजेंडा है, यह इस सवाल को जन्म देता है. लेकिन भ्रष्टाचार और कार्पेट बगिंग (जासूसी) इसके संभावित जवाब हो सकते हैं. यह यक़ीन किया जाता है कि आईबी की कुछ रिपोर्टें इस बारे में खुलासा कर रही हैं कि हाल में हुई यूरोकॉप्टर खरीदी के समझौते के बाद एक सैन्य अधिकारी ने हवाला के ज़रिये पेरिस में अपने एक रिश्तेदार के खाते में 145 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए थे, लेकिन दुर्भाग्य से डील रद्द हो गई और उन्हें वे पैसे लौटाने पड़ गए. इसकी भरपाई करने के लिए उस व्यक्ति को करोड़ों के कॉन्ट्रेक्ट दिए गए. अब भविष्य में होने वाली किसी भी डील के लिए सेना मुख्यालय की एड्‌होक्रेसी को एमएनसी के उद्देश्यों की भरपाई करनी होगी.

देश अक्रियाशील क्लेपटोक्रेसी (घोटाला करने वाले) में परिवर्तित होता दिख रहा है. भ्रष्टाचार सैन्य और सिविल एड्‌होक्रेसी के बीच कड़ी के रूप में दिखाई दे रहा है. पिछले दिनों हमने कई ऐसे मामले देखेहैं, जिनमें धोखे और ग़बन के कई मामलों में अधिकारियों का कोर्ट मार्शल कर दिया गया और सेवा से ब़र्खास्त कर दिया गया. सेना और सामान्य एड्‌होक्रेसी के गठजोड़ ने यह खतरा भांप लिया था कि वीके सिंह इस सिस्टम में फिट नहीं बैठेंगे. मीडिया के प्रतिष्ठित लेखकों और रक्षा विश्लेषकों ने क्लेपटोक्रेट्‌स के साथ इस घृणित कार्य में सहयोग किया, जो कि वास्तविक त्रासदी है.

(एम जी देवासहयम एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं. उन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भाग लिया था. साथ ही वह नागालैंड में अलगाव विरोधी अभियान से जु़डे रहे हैं. इस लेख में वर्णित विचार उनके अपने हैं और सैन्य सूत्रों से मिली सूचनाओं पर आधारित हैं.)

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