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इस बार का बजट लोकलुभावन नहीं होगा
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इस बार का बजट लोकलुभावन नहीं होगा

इस बार का बजट लोकलुभावन नहीं होगा

देश की तरक्क़ी आम जनता को हाशिए पर रखकर नहीं हो सकेगी, इसलिए वित्त मंत्री चिदंबरम को आम लोगों को दो व़क्त का खाना मिले, यह सुनिश्‍चत करना ही होगा. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वे इस बार का बजट लोकलुभावन बना पाएंगे? क्या वे देश में मौजूद कालेधन को मुख्यधारा में लाकर उसका उपयोग देश के विकास में कर पाने में सक्षम होंगे? क्या कहती है चौथी दुनिया की यह रिपोर्ट…

इस बार का बजट लोकलुभावन नहीं होगा

इस बार का बजट लोकलुभावन नहीं होगा

वैसे तो वित्त बजट अभी पेश होना बाक़ी है, लेकिन मोटे तौर पर बजट के स्वरूप का आकलन तो किया ही जा सकता है. यदि हम वित्त मंत्री पी चिदंबरम के हालिया बयानों पर ग़ौर करें, तो वित्त वर्ष 2013-14 के बजट में मौजूदा कर क़ानूनों को पारदर्शी बनाने और राजकोषीय घाटे को कम करने पर ज़ोर दिया जा सकता है. दरअसल, वोडाफोन से संबंधित 14000 करोड़ रुपये के कर विवाद में वित्त मंत्रालय की अच्छी-ख़ासी फ़ज़ीहत हो चुकी है. इसलिए अब मंत्रालय यही चाहता है कि कराधान के क़ानून को सरल एवं पारदर्शी बनाया जाए, ताकि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति न हो. दरअसल इसी वजह से प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को लागू करने में भी वह जल्दबाज़ी नहीं कर रहा है. वित्त मंत्रालय के नए सलाहकार पार्थसारथी शोम का मानना है कि कर में किसी को राहत नहीं दिया जाना चाहिए. उनका कहना है कि पिछली तारीख़ से ज़्यादा कर वसूलने से सरकार के ख़ज़ाने में और भी ज़्यादा इज़ाफ़ा हो सकता है. जल्द ही सरकार इस मामले पर विमर्श करने वाली है. यह भी माना जा रहा है कि आगामी बजट में कर दर को बढ़ाया जा सकता है. अमीर लोगों पर थोड़ा और ज़्यादा कर आरोपित करने के प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने की दिशा में भी सरकार काम कर रही है. चिदंबरम चाहते हैं कि चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 5.3 प्रतिशत के दायरे में रहे और अगले वित्त वर्ष में इसे घटाकर 4.8 प्रतिशत कर दिया जाए.

भले ही वर्ष 2014 में आम चुनाव होने वाले हैं, फिर भी आगामी बजट के लोक लुभावन होने की संभावना बहुत ही कम है. माना जा रहा है कि इस बजट में राजकोषीय घाटे को कम करना सरकार की प्रथम प्राथमिकता होगी. ईंधन के मद में दी जा रही सब्सिडी में की जा रही कटौती को जारी रखा जाएगा. रसोई गैस के मद में और राहत की गुंजाइश नहीं है.

सूत्रों के अनुसार, अप्रत्यक्ष कर संग्रह में गिरावट और स्पेक्ट्रम नीलामी की धीमी गति के बावजूद राजकोषीय घाटा को 5.3 प्रतिशत के स्तर पर रखने के लिए क़वायद की जा रही है. सरकारी ख़ज़ाने को भरने के लिए वित्त मंत्रालय हर तरह की संभावना तलाश कर रहा है. ज्ञातव्य है कि स्पेक्ट्रम शुल्क के रूप में टेलीकॉम कंपनियां पहली क़िस्त के रूप में तक़रीबन 8000 करोड़ रुपये सरकार के ख़ज़ाने में जमा करने वाली हैं. इस मद में वोडाफोन को 2093 करोड़ रुपये, एयरटेल को 1758 करोड़ रुपये, भारत संचार निगम लिमिटेड को 1282.98 करोड़ रुपये, आइडिया सेल्युलर को 810 करोड़ रुपये, एयरसेल को 584 करोड़ रुपये, रिलायंस कम्युनिकेशन को 63 करोड़ रुपये, स्पाइस कम्युनिकेशन को 84.45 करोड़ रुपये, लूप मोबाइल  को 607 करोड़ रुपये और एमटीएनएल को 916 करोड़ रुपये जमा करने हैं. सरकार फ़िलहाल टेलीकॉम कंपनियों से संबंधित स्पेक्ट्रम शुल्क ढांचे में कोई छेड़छाड़ नहीं कर रही है, पर ऐसा माना जा रहा है कि सरकारी ख़ज़ाने को भरने के लिए जल्द ही इस फैसले पर पुनर्विचार किया जा सकता है. इसी क्रम में सरकार यह मानकर भी चल रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश से उसकी झोली में 30000 करोड़ रुपये आ सकते हैं. इस मामले में ऑयल इंडिया में विनिवेश किया जा चुका है. एनटीपीसी और नालको का विनिवेश फ़रवरी, 2013 में किए जाने की संभावना है और एमएमटीसी, सेल एवं राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड का विनिवेश मार्च, 2013 में किया जा सकता है. रेलवे एवं पोर्ट ट्रस्ट के पास मौजूद ज़मीनों को बेचकर राजकोषीय घाटे को कम करने के मुद्दे पर भी विचार-विमर्श किया जा रहा है. इसके अलावा, वित्त मंत्रालय अन्य मंत्रालयों के ख़र्च को कम करने के लिए भी मशक्क़त कर रहा है. अपने प्रस्ताव में मंत्रालय ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय के ख़र्च को 24 प्रतिशत तक कम करने की बात कही है. कृषि मद में ख़र्च किए जाने वाले प्रस्तावित 20000 करोड़ रुपये में से 3000 करोड़ रुपये कम कर दिए गए हैं. रक्षा बजट के ख़र्च प्रस्ताव में से भी 10000 करोड़ रुपये कम किए गए हैं. राज्य सरकारों को बीजों के लिए सब्सिडी मुहैया कराने वाले बीज निगम को भी पहले की तरह पूरा आवंटन नहीं किया जाएगा. चिदंबरम ने सभी मंत्रियों को ताक़ीद करते हुए कहा है कि वे अपने ख़र्चों को कम करें. अदरअसल, ख़र्च कम करने के बाबत मंत्रियों से सुझाव भी मांगे गए हैं. वित्त मंत्रालय के द्वारा ख़र्चों को कम करने के लिए कसरत करना सही दिशा में उठाया गया एक क़दम हो सकता है. इस संदर्भ में स्पेक्ट्रम की नीलामी या स्पेक्ट्रम शुल्क के रूप में वसूले धन को भी समीचीन माना जा सकता है, परंतु राजकोषीय घाटा को कम करने के लिए सरकारी संपत्ति को बेचना और आम ज़रूरत की चीज़ों पर लगातार सब्सिडी को कम करना देश और जनता के हित में नहीं है. कालेधन के मामले में सरकार का चुप रहना भी राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सरकार के द्वारा की जा रही कोशिशों को हास्यासप्रद इसलिए बनाता है, क्योंकि आज की तारीख़ में देश में मौजूद कालेधन की उगाही से राजकोषीय घाटे की समस्या से निजात पाई जा सकती है. ग़ौरतलब है कि काला धन हमारे देश में लगातार बढ़ रहा है. ग़लत तरी़के से अ़कूत धन जमा करके भ्रष्ट लोग समाज के शीर्ष पर पहुंच गए हैं और देश में काले धन से एक समानांतर अर्थव्यवस्था चलाई जा रही है. एक अनुमान के मुताबिक़, भारत में काले धन की मात्रा देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के क़रीब 30 प्रतिशत (अंदाज़न 26 लाख करोड़ रुपये) के आसपास है, जो कि वर्ष 1999 में 22.9 प्रतिशत और वर्ष, 2006 में 25.1 प्रतिशत था. उल्लेखनीय है कि अभी हाल में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी), नेशनल  इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंशियल मैनेजमेंट (एनआईएफएम) और नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाएड इकनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) को देश में मौजूद काले धन का पता लगाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट अभी वित्त मंत्रालय के पास रखी है, जिसे आगामी बजट सत्र में पेश किया जा सकता है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 1985 के बाद काले धन पर पेश की गई यह पहली सरकारी रिपोर्ट है. उसके पहले प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के द्वारा वर्ष 2011 में पेश की गई एक रिपोर्ट में देश में 27.5 लाख करोड़ रुपये से 74 लाख करोड़ रुपये के बीच काला धन होने का अनुमान लगाया गया था. इसी विषय पर जारी अपनी एक रिपोर्ट में अमेरिका की थिंकटैंक ग्लोबल फाइनेंस इंटेग्रिटी (जीएफआई) ने पाया कि वर्ष 2001 से वर्ष 2010 के बीच भारत के भ्रष्टाचारियों के द्वारा लगभग 6.76 लाख करोड़ रुपये का कालाधन विदेश भेजा गया. ग़ौरतलब है कि काले धन की अर्थव्यवस्था की उत्पत्ति मूलत: सभी प्रकार की बाज़ार आधारित वस्तुओं और सेवाओं को ग़लत तरी़के से उत्पादित करने, जानबूझकर आयकर सरकारी खाते में जमा नहीं करने, कृत्रिम मूल्य वृद्धि, अन्यान्य कर वंचना, कामगारों को न्यूनतम वेतन देने, काम करने के अधिकतम घंटे, भविष्य निधि की चोरी, सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने आदि से होती है. इसके मद्देनज़र वित्त मंत्री बजट सत्र में कालेधन को स़फेद बनाने से संबंधित एक महत्वपूर्ण योजना की घोषणा कर सकते हैं. इस प्रस्तावित योजना के तहत 30 प्रतिशत टैक्स प्रभारित करके काले धन को स़फेद बनाने की इजाज़त सरकार के द्वारा भ्रष्ट लोगों को दी जा सकती है. ज़ाहिर है, इस योजना को व्यवहारिक बनाना सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा. बीते सालों से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (सप्रंग) सरकार लोक लुभावन बजट से बचने की ज़रूरत पर बल दे रही है. उसका मानना है कि विविध मदों में दी जा रही सब्सिडी के कारण राजकोषीय घाटे में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. इसके आलोक में अब देखने की बात यह है कि सरकार के पास राजकोषीय घाटे को कम करने के  उपाय कौन-कौन से हैं और इस क़वायद में किसे आसानी से बलि का बकरा बनाया जा सकता है? क़ायदे से राजस्व संग्रह के द्वारा सरकार को इस घाटे को कम करना चाहिए, लेकिन इस फ्रंट पर वह बेबस और लाचार ही दिखती है. ले-देकर वेतनभोगी कर्मचारी पर वह अपना चाबुक़ चला पाती है, लेकिन इस वर्ग से वसूल किया जाने वाला कर इतने बड़े देश को चलाने के लिए नाकाफ़ी है. छोटे-बड़े सभी कारोबारी कर वंचना में माहिर हैं. इस समस्या का दूसरा पहलू है देश में घोर भ्रष्टाचार का व्याप्त होना. भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इस देश में सब कुछ मैनेज हो जाता है. उसके बाद सरकार के पास दो ही विकल्प बचते हैं. पहला, या तो वह सरकारी संपत्ति को बेचे या फिर आम जनता को मुहैया की जाने वाली सब्सिडी को कम करे. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का विनिवेश करना सरकारी संपत्ति को बेचने का ही दूसरा नाम है. सब्सिडी के मामले में ध्यान देने की बात यह है कि कॉरपोरेट्स को भी भारी मात्रा में सब्सिडी दी जा रही है, जिसका पता सामान्यत: अशिक्षित जनता को नहीं चल  पाता है. आमतौर पर यह सब्सिडी आयात-निर्यात में संतुलन बनाए रखने का तर्क देकर, औद्योगिक इकाई शुरू करने की बात कहकर, स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) के विकास को लेकर या फिर कॉरपोरेट्स को घाटे से उबारने के लिए उनके ॠण खातों को कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग (सीडीआर) में अंतरित करने के नाम पर दी जा रही है. इस बाबत यह बताना अहम है कि कुछ ऐसी वस्तुएं हैं, मसलन, डीजल, जिसमें सब्सिडी दी जा रही है, लेकिन फायदा अमीर तबके के लोग उठा रहे हैं. आर्थिक विकास के नाम पर कार उद्योग को सरकार की तरफ़ से विशेष सुविधा एवं रियायत दी जा रही है. डीजल कारों के अंतिम उपभोक्ता कौन हैं, यह जानते हुए भी डीजल कारों के निर्माण की इजाज़त कॉरपोरेट्स घरानों को देना सरकार की मंशा को जनविरोधी बनाता है. अस्तु डीजल के वितरण में राशनिंग की व्यवस्था की जानी चाहिए. साथ ही, यह भी सुनिश्‍चित किया जाना चाहिए कि अमीर वर्ग इसका लाभ न ले पाएं, पर क्या कॉरपोरेट्स या अमीर तब़के को नाराज़ करने की हिम्मत सरकार में है? चूंकि आम जनता सभी के लिए हमेशा से सॉफ्ट टारगेट रहा है, इसलिए सरकार के आक्रमण का केंद्रबिंदु भी वही होता है और इसी तथ्य को ध्यान में रख करके आम ज़रूरत के सामानों पर दी जा रही सब्सिडी को सबसे पहले कम या समाप्त किया जा रहा है. भले ही वर्ष 2014 में आम चुनाव होने वाले हैं, फिर भी आगामी बजट के लोक लुभावन होने की संभावना बहुत ही कम है. माना जा रहा है कि इस बजट में राजकोषीय घाटे को कम करना सरकार की प्रथम प्राथमिकता होगी. ईंधन के मद में दी जा रही सब्सिडी में की जा रही कटौती को जारी रखा जाएगा. रसोई गैस के मद में और राहत की गुंजाइश नहीं है. हो सकता है कि समावेशी विकास की सभी योजनाओं को फ़िलहाल ठंडे बस्ते में डाल  दिया जाए. हां, सामाजिक दायित्व के मुद्दे पर सरकार थोड़ी दरियादिली ज़रूर दिखा सकती है. उम्मीद है कि सरकार खाद्य सुरक्षा के मद में, नक़द सब्सिडी अंतरण और महिला केंद्रित योजनाओं पर बजटीय आवंटन दिल खोलकर करेगी. यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सप्रंग सरकार ऐसी उदारता चुनावी मजबूरी के तहत दिखा सकती है, क्योंकि वह जानती है कि इस मामले में कटौती की कैंची चलाने पर वर्ष 2014 के आम चुनाव में उसके लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता है. भारत जैसे लोकतांत्रिक एवं कल्याणकारी देश में आम जनता को हाशिए पर रख करके तरक्क़ी नहीं की जा सकती है. इस वस्तुस्थिति के मद्देनज़र सरकार को उनकी ज़रूरत को समझना होगा और उनको दो वक़्त का खाना मिलता रहे, इसे भी सुनिश्‍चित करना पड़ेगा. लिहाज़ा, सरकार को चाहिए कि वह देश में मौजूद काले धन को मुख्यधारा में लेकर आए, ताकि देश का पैसा देश के विकास में ख़र्च हो सके. इसके बरअक्स अमीरों को प्रदान की जाने वाली विविध प्रकार के आर्थिक लाभ में कटौती एवं काले धन को समाप्त करने के लिए कड़े फैसले लेने से संबंधित प्रस्ताव को आगामी बजट सत्र में ज़रूर प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि आम आदमी का भला हो सके. वैसे, ऐसा करने से ग़रीबों से अधिक फ़ायदा वर्ष 2014 के चुनाव में सप्रंग सरकार को मिलेगा.

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