असमान वित्त वितरण से पैदा हुए अनेक ख़तरे हैं. खाली व्यापार-धंधों में ही नहीं, बल्कि फौज में या सेना में कहीं भी देख लीजिए, एक सिपाही की जितनी आमदनी होती है, उसके अफसर को उससे कई गुना ज़्यादा होती है. परिणामस्वरूप काफी असंतोष होता है. इसी तरह न्यायालय में, विद्यालयों में, सरकारी दफ्तरों में, हर जगह असमान वित्त वितरण की वजह से घोर असंतोष फैला हुआ है और मानव अपनी बुद्धि या योग्यता के अनुसार कार्य नहीं कर पाता. समान वित्त वितरण आजमाई हुई चीज है, कोई नई बात नहीं. यह पूर्ण रूप से संभव है. आज यह कुछ अंशों में वर्गों के बीच विद्यमान भी है, पर व्यक्तियों में नहीं है. एक राज या बढ़ई को अगर 8 रुपये या 10 रुपये रोज़ाना मज़दूरी मिलती है तो दूसरे राज या बढ़ई को भी लगभग उतनी ही मिलती होगी. भारत के समस्त राज या बढ़ई इसी तरह क़रीब-क़रीब समान आय वाले होंगे. समस्त पोस्टमैन भी क़रीब-क़रीब समान आय वाले होंगे, पर एक पोस्टमैन या एक अध्यापक से एक डॉक्टर, वकील या व्यापारी की आय कई गुना ज़्यादा है. अत: यह असमान वित्त वितरण दुखदायी हो जाता है. अब अगर इस समान आय की पद्धति का सब वर्गों में विस्तार किया जा सके तो पहेली सुलझ सकती है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

हो सकता है कि कोई व्यक्ति अद्भुत प्रतिभा वाला निकल आए और अपनी श्रेणी के दूसरे कार्यकर्ता से कई गुना ज़्यादा कमा भी सके और शायद कोई इस ढंग का भी निकल आए, जो अपनी श्रेणी के दूसरे कार्यकर्ता से आधा भी न कमा सके, पर ये बहुत अल्प संख्या के ही प्राणी होंगे. ज़्यादातर तो औसत योग्यता या प्रतिभा के ही व्यक्ति मिलेंगे. समान वित्त वितरण किसी उद्योग में काम करते मज़दूरों में या सार्वजनिक सेवा में लगे सरकारी नौकरों में लागू कर दिया जाए तो बहुत अंशों में यह प्रथा सफल भी हो सकती है. आप पूछ सकते हैं कि भाई, जब आपको समान मिलेगा तो भी यह तो संभव है ही कि कई लोग तो बचाकर धीरे-धीरे धनिक बन जाएंगे और कई लोग धीरे-धीरे ज़्यादा ग़रीब बन जाएंगे. क्या फायदा है, एक बार आपने समान बंटवारा कर भी दिया तो? मानव की योग्यता या बुद्धि का तो आप समान बंटवारा कर नहीं सकते, फिर यह बहस फिजूल हो जाती है. मानव जैसा है, वैसा ही रहेगा, उसकी स्थिति को बदल सकना कैसे संभव होगा?

शायद आप ठीक कहते हों, पर मैं समझता हूं, जब समान वित्त वितरण हो जाएगा और कोई धनिक या कोई दरिद्र ही नहीं रहेगा, तो धनिक बनने में आज जो विशेष आकर्षण है, वह भी न रहेगा. बचा सकने की बात तो ख़ैर निर्मूल है ही, पर किसी भी उपाय से अगर मानव धनिक बन सकता है, वह भी बनने में उसे कुछ विशेष फायदा या अधिकार नहीं मिल पाए तो उसे धनिक बनने का प्रयत्न करने में कोई आकर्षण नहीं रहेगा. मानव अपनी योग्यता, बुद्धि या प्रतिभा का पूरा-पूरा उपयोग करके सुख प्राप्त करने का प्रयास ज़रूर करेगा और वह समान वित्त वितरण हो जाने से सबको ही उपलब्ध भी होगा. समान वित्त वितरण संभव है और इसके स्थायी रूप से चल सकने में कोई कठिनाई नहीं है. किसको कितना मिलना चाहिए, इस विवाद का भी अंत हो जाएगा. सब अपनी-अपनी प्रतिभा द्वारा ज़्यादा से ज़्यादा प्रयत्न कर सकें, इसके लिए बहुत बड़ा क्षेत्र मिलेगा.

दरिद्रता पर किसी का अधिकार नहीं

प्रश्न उठता है कि जब समान रूप से ही बंटवारा होना है तो अपनी अपनी योग्यता या प्रतिभा के अनुसार ज़्यादा से ज़्यादा प्राप्त कर सकने का विस्तृत क्षेत्र मिलने का क्या अर्थ? लोग अपनी योग्यता या प्रतिभा का उपयोग ही क्यों करेंगे? जब एक कम अक्ल वाले आदमी को या ज़्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति को समान ही मिलना है तो क्यों कोई व्यर्थ काम करेगा? क्यों दिमाग़ लगाएगा? शंका सही है. मानव-मानव की संपत्ति में, आय में जो फर्क़ है, उसे शायद प्रयत्न से समाप्त किया जा सकता है, पर योग्यता या प्रतिभा कभी छिप नहीं सकती. बहुत ही योग्य या प्रतिभाशाली व्यक्ति पूर्ण श्रम करते हुए भी भारत में आज क़रीब-क़रीब भूखों मरते हैं, जबकि कम अक्ल या बिल्कुल मूर्ख, निर्दयी-स्थायी या धूर्त करोड़पति बने बैठे हैं. कुछ काम न करके भी निठल्ले बैठे-बैठे भी इनके करोड़ों रुपयों में श्रीवृद्धि ही होती रहती.

मान लीजिए, देश के एक महान वैज्ञानिक ने कोई मानवोपयोगी नया यंत्र आविष्कृत किया और आपकी संसद या सरकार ने प्रसन्न होकर उस वैज्ञानिक को 2 लाख रुपया पारितोषिक दे दिया (यह होना भारत में तो असंभव सा ही है) तो भी वह वैज्ञानिक उन चालाक व्यापारियों के सामने बिल्कुल दरिद्र या निर्धन ही है, जिन्होंने गेहूं का सारा स्टाक ख़रीद कर गोदामों में भर लिया है और बहुत ऊंचे भाव में बेचा है या जो असली घी के बदले में वनस्पति घी देते हैं या जो कपड़े के ताने-बाने में सूत के बदले स़िर्फ मांडी ही भर देते हैं या जो दवाइयों या खानपान की तमाम चीजों में मिलावट करके बेचते हैं या जो रुई की फसल कम होगी, यह जानकारी पहले से हासिल कर लेते हैं या जो झूठे विज्ञापनों से प्राप्त धन से अपने समाचारपत्रों को समृद्ध बनाए हुए हैं या जो अनेक घृणित कार्यों से करोड़ों-अरबों रुपये इकट्ठा किए हुए हैं. जबकि बहुशिक्षित, होनहार आदर्श आदमी, जो मानवीय ज्ञान शक्ति बढ़ाने में प्रयत्नशील है, उसे बहुत ही कम धन प्राप्त हो पाता है. इसलिए गुणों की अपेक्षा धन की महत्ता ज़्यादा होती है और समाज में हर जगह धनवान का समादर गुणवान की अपेक्षा ज़्यादा होता है. अगर धन का समान वितरण हो जाए तो गुणी पुरुष अपने आप अपने गुणों के कारण चमक उठेगा. वही सबसे आगे मान्य होगा. उसको आदर्श मानकर बाक़ी दूसरे आदमी भी उसका अनुसरण करने का प्रयत्न करेंगे. बिना गुणज्ञान या प्रतिभा के धन का महत्व ही क्या है?

समाज की वर्तमान प्रचलित भावनाएं बदलनी होंगी. वित्त वितरण समान होने के बाद मानव का श्रेणी विभाजन उनकी प्रतिभा, सदाचार या गुणों पर ही आधारित होगा, वही तो उत्तम समाज होगा. मनुष्यों में फिर भी बड़े, मध्यम और छोटे लोगों की श्रेणी होगी ही, पर उनका मापदंड उनका धन न होकर उनकी बुद्धि, प्रतिभा या गुण ही होंगे. जो देश के लिए कला, विज्ञान या शिल्प में आदर्श स्थापित करेंगे, वे ही बड़े और महान माने जाएंगे. जो लोग देश के और अपने हित में जनसाधारण की तरह ही अपना-अपना कार्य समुचित ढंग से करते रहेंगे, वे ही मध्यम श्रेणी के या भले आदमी कहे जाएंगे और जो शठ, मूर्ख, धूर्त लोग अपने स्वार्थ साधन के लिए बड़े या मध्यम लोगों के काम में रोड़ा अटकाएंगे, वे ही निम्न कोटि के छोटे आदमी माने जाएंगे. मापदंड तथ्यपूर्ण होगा, उस दिन रुपये की महत्ता घट जाएगी. सदाचार या गुणों की या नैसर्गिक प्रतिभा की ही ज़्यादा क़ीमत होगी, उनका ही समादर होगा. वही समाज ज़्यादा उपादेय, ज़्यादा पूज्य और आदरणीय होगा.

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