ram vilas paswanअब मंजिल तक पहुंचाने के लिए साथ आए दोस्त ही बोझ बन जाएं, तो रास्ता तय करना कितना मुश्किल हो जाता है, इसकी बानगी बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में खुलकर देखने को मिली. मिशन बिहार में जुटी भाजपा ने जब अपने सहयोगी दलों के बीच 85 सीटें बांट दीं, तो सवाल उठने लगा था कि कहीं उसने ग़लती तो नहीं कर दी.

सवाल भाजपा के अंदर भी उठे, पर केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में स्थानीय नेताओं ने ज़्यादा मुंह नहीं खोला. पर अंदरखाने यह बात होने लगी थी कि सहयोगी दलों को उनकी हैसियत से ज़्यादा सीटें बांट दी गईं, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. आ़िखरकार यह आशंका सही साबित हुई और चुनाव नतीजों से सा़फ हो गया कि सहयोगी दल भाजपा के लिए बोझ ही बन गए.

85 सीटों में से केवल छह सीटें जीतकर सहयोगी दलों ने बिहार में महा-गठबंधन की सरकार बनने का रास्ता बेहद आसान कर दिया. इसके उलट सहयोगी दल खुलकर तो नहीं, पर अंदरखाने कहने लगे हैं कि भाजपा अगर सहयोगी दलों को उचित सम्मान देती, तो नतीजे कुछ और ही होते. विज्ञापनों से लेकर भाषणों तक केवल एक ही नारा गूंजा, भाजपा सरकार और केवल भाजपा सरकार.

सहयोगी दलों ने अंदरूनी बैठकों में कई बार कहा कि इससे जनता के बीच सही संदेश नहीं जा रहा है. इसके बाद कुछ पोस्टरों में जीतन राम मांझी, राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के चेहरे चमके, पर तब तक काफी देर हो चुकी थी.

वहीं भाजपा नेताओं का कहना है कि सहयोगी दलों ने पार्टी की संभावनाओं को चौपट कर दिया. पहले तो सीटों के बंटवारे में सहयोगी दलों के कारण काफी देर हुई और कुछ खास इलाकों में सहयोगी दलों के दबाव के चलते भाजपा सही प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतार पाई. भाजपा नेता कहते हैं कि पार्टी बोचहा में बेबी कुमारी को लड़ाना चाहती थी, पर लोजपा के दबाव के चलते यह सीट उसे देनी पड़ी.

बेबी कुमारी को लोजपा का उम्मीदवार बनाया गया, पर राम विलास पासवान के दामाद के दबाव के चलते बेबी कुमारी का टिकट काट दिया गया. हालात ऐसे हो गए कि बेबी कुमारी को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा और वह चुनाव जीत गईं. लोजपा ने अगर बेबी कुमारी का टिकट न काटा होता, तो यह सीट एनडीए के खाते में आ जाती.

इसी तरह जमुई ज़िले की चारों सीटों को लेकर स्थानीय सांसद चिराग पासवान के अड़ियल रवैये के कारण वहां तीन सीटों का ऩुकसान हो गया. चकाई सीट को लेकर चिराग इतने अड़े कि निवर्तमान विधायक सुमित कुुमार को निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा. हद तो यह हो गई कि वहां से लोजपा प्रत्याशी विजय सिंह मुक़ाबले में भी नहीं रहे और निर्दलीय लड़ रहे सुमित कुमार को लगभग 12 हज़ार वोटों से चुनाव हारना पड़ा.

विजय सिंह 22 हज़ार वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे. अगर वहां से सुमित एनडीए के टिकट पर लड़ते, तो राजद की जीत संभव नहीं थी. इसी तरह लोजपा ने जमुई से एनडीए प्रत्याशी अजय प्रताप को मदद नहीं की. गठबंधन में रहते हुए भी चिराग अपनी जिद पर अड़े रहे और ज़िले में एनडीए को खासा ऩुकसान हो गया. लोजपा ने जिस तरह से सगे-संबंधियों को टिकट दिए, उससे भी जनता के बीच सही संदेश नहीं गया.

जनता की प्रतिक्रिया इतनी सख्त रही कि लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस बुरी तरह चुनाव हार गए. राम विलास पासवान के भतीजे प्रिंस राज और दोनों दामाद भी चुनाव हार गए. हाल यह रहा कि 42 सीटों पर लड़ी लोजपा केवल तीन सीटें जीत सकी. इसी तरह जनता ने जीतन राम मांझी के बड़बोलेपन को भी नकार दिया. जीतन राम मांझी चुनाव से पहले और चुनाव के बाद भी बार-बार स्वयं को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करते रहे.

जनता को आभास हो गया कि अगर जीतन राम को ज़्यादा सीटें मिलीं, तो वह नई सरकार में विध्न-बाधा ही पैदा करेंगे. हाल यह हुआ कि जीतन राम मांझी पूरे बिहार में तो छोड़िए, मगध में ही अपने वोट एनडीए को नहीं दिला पाए. मांझी से भाजपा ने कुछ ज़्यादा ही उम्मीद बांध रखी थी, लेकिन उनके खराब प्रदर्शन ने एनडीए की संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया.

हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी और उनके पुत्र चुनाव हार गए. घोसी से कभी न हारने वाले जगदीश शर्मा के पुत्र राहुल शर्मा भी चुनाव हार गए. हम से जुड़े नरेंद्र सिंह के दोनों बेटों को भी जनता ने नकार दिया. इसी तरह रालोसपा से भाजपा को भारी निराशा हाथ लगी. कुशवाहा वोटों को लेकर भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा पर अपना दांव खेला, लेकिन कुशवाहा वोटों का झुकाव महा-गठबंधन की तऱफ रहा.

उपेंद्र कुशवाहा ने जिस तरह से टिकटों का बंटवारा किया, उसी से सा़फ हो गया था कि उनसे ज़्यादा उम्मीद करना बेमानी है. पार्टी हित में उपेंद्र कुशवाहा ने अपने कार्यकर्ताओं को टिकट दिए, पर चुनावी रणनीति के लिहाज से उनका यह फैसला सही साबित नहीं हुआ. रालोसपा केवल दो सीटों पर ही विजय हासिल कर सकी.

जानकार बताते हैं कि अब चूंकि एनडीए चुनाव हार गया है, इसलिए भाजपा हर हाल में चाहेगी कि हार का ठीकरा सहयोगी दलों के सिर पर फोड़ दिया जाए. पहली नज़र में यह सही भी दिखता है कि 85 में से अगर सहयोगी दल स़िर्फ छह सीटें जीतते हैं, तो वे बोझ ही कहे जाएंगे. लेकिन, ग़लती स़िर्फ एक तऱफ से ही नहीं हुई है. यह सा़फ है कि भाजपा ने भी बहुत सारी ग़लतियां कीं, जिसका नतीजा यह हुआ कि नीतीश और लालू के लिए रास्ता आसान हो गया.

राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि भाजपा अपने सहयोगी दलों को लेेकर पुनर्विचार कर सकती है. पटना और दिल्ली में उनकी भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा अपने सहयोगी दलों को लेकर क्या सोचती है और यह साथ लंबा खिंचता भी है या नहीं.

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