इनसे सीखिए कैसे हो महिला सशक्तिकरण

जब महिलाओं के अधिकारों को लेकर चारों तऱफ हंगामा मचा हुआ है, तो ऐसे में कुछ सवाल ख़डे होते हैं. दरअसल, महिलाओं की आज़ादी के सवाल को समग्र रूप से देखना होगा. सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैयक्तिक और आर्थिक स्वतंत्रता से जु़डे कई सवाल हैं, जो सीधे-सीधे महिला सशक्तीकरण से जु़डे हुए हैं. चौथी दुनिया ऐसी […]

सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे.

धनवान बनने के लोभ का कारण

असमान वित्त वितरण से पैदा हुए अनेक ख़तरे हैं. खाली व्यापार-धंधों में ही नहीं, बल्कि फौज में या सेना में कहीं भी देख लीजिए, एक सिपाही की जितनी आमदनी होती है, उसके अफसर को उससे कई गुना ज़्यादा होती है. परिणामस्वरूप काफी असंतोष होता है.

कलम का सच्चा सिपाही

आलोक तोमर के निधन की ख़बर समूचे मीडिया जगत में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई. एक पत्रकार साथी ने जैसे ही मुझे बताया कि कलम के सिपाही आलोक तोमर सदा के लिए सो गए तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ.

अब बदलाव जरूरी है

हमारे देश में कई व्यवस्थाएं ऐसी हैं जो बाबा आदम के जमाने से चल रही हैं. वर्तमान में स्थितियां बदल चुकी हैं, इसके हिसाब से व्यवस्था में बदलाव होना ज़रूरी होता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है. अब पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट को ही ले लीजिए.