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Tag: दिल्ली

शीला जी, कैसे जिंदा रहेंगे गरीब

शीला जी, कैसे जिंदा रहेंगे गरीब

जिस देश के नेताओं पर चारा, खाद, चीनी खा जाने और कोलतार पी जाने तक के आरोप लगते हों, वहां की जनता (अपेक्षाकृत अमीर) अगर ग़रीबों का राशन हड़प ले तो ज़्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए. लेकिन आश्चर्य तब होता...

युवाओं की भागीदारी से प्रकाशक गदगद

युवाओं की भागीदारी से प्रकाशक गदगद

दिल्ली में आयोजित उन्नीसवां पुस्तक मेला ख़त्म बीती सात फरवरी को संपन्न हो गया. इस पुस्तक मेले में कई दिलचस्प बातें हुईं. पिछले विश्व पुस्तक मेले से मैंने कवि मित्र और कला प्रेमी यतींद्र मिश्र के साथ जामिनी राय की...

न पदक की उम्‍मीद, न कोई चिंता

न पदक की उम्‍मीद, न कोई चिंता

राष्ट्रमंडल खेल का काउंट डाउन शुरू हो चुका है. खेल गांव से लेकर महंगे होटलों, फ्लाईओवर और सड़क निर्माण पर करोड़ों रुपये फूंके जा चुके हैं. दिल्ली को शंघाई बनाने की कवायद जारी है. कुल मिलाकर कहें तो खेल के...

सर्वोच्च न्यायालय का विभाजन : एक खतरनाक खेल

सर्वोच्च न्यायालय का विभाजन : एक खतरनाक खेल

कानून मंत्रालय द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक खंड और अपीलीय खंड में बांटने के मुद्दे का बारीक़ी से परीक्षण किए जाने की ख़बर है. यह विधि आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है. विधि आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को...

भारतीय कंपनियां भी बेहतर सामरिक साज़ोसामान बना सकती हैं

भारतीय कंपनियां भी बेहतर सामरिक साज़ोसामान बना सकती हैं

सैद्धांतिक तौर पर गणतंत्र दिवस परेड हमारी सैन्य शक्तिके प्रदर्शन का एक अवसर है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर ऐसा लगता है, जैसे हमारी सैन्य कमज़ोरियां ज़ाहिर हो रही हैं. अगर स़िर्फ कमज़ोर प्रदर्शन का सवाल है तो कोई बात नहीं...

प्रकृति के प्रति ख़तरनाक संवेदनहीनता

प्रकृति के प्रति ख़तरनाक संवेदनहीनता

कुछ दिनों पहले की बात है, दिल्ली और आसपास के इलाक़े में ज़बरदस्त ठंड पड़ रही थी. रात में कोहरा इतना घना था कि सामने कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. देर रात तक़रीबन एक बजे नोएडा स्थित अपने...

दांव पर दिल्ली पुस्तक मेला

दांव पर दिल्ली पुस्तक मेला

पंद्रहवीं शताब्दी में जब पुस्तक मेले की शुरुआत हुई थी तो उसके पीछे अवधारणा यह थी कि विश्‍व के देशों के प्रकाशकों को एक मंच मिले, जहां वे किताबों के प्रकाशन अधिकार का सौदा कर सकें. प्रारंभिक अवधारणा में समय...

कामकाज से शासन संतुष्ट, लेकिन आम लोग नहीं

कामकाज से शासन संतुष्ट, लेकिन आम लोग नहीं

उत्तराखंड के तीर्थनगर हरिद्वार में कहने को महाकुंभ शुरू हो चुका है और सरकारी घोषणाओं में इस महापर्व की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. घोषणाओं से ऐसा लगता है कि मेज़बान जाजम बिछाकर, थाली

जनता महंगाई की मार से बेहाल

जनता महंगाई की मार से बेहाल

दिल्ली में गृहणियां आसमान छूती महंगाई के बोझ तले दबती जा रही हैं. रोज़मर्रा के इस्तेमाल में आने वाले सामानों की बढ़ती क़ीमत ने उन्हें सबसे अधिक परेशान किया है.

ज्योति बसु प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सके?

ज्योति बसु प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सके?

वर्ष 1997 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने से उनकी पार्टी ने ही इंकार कर दिया, तो बसु ने इसे क्यों भारतीय मार्क्सवाद की ऐतिहासिक भूल करार दिया? उन्हें अपने रुतबे से ज्यादा लगाव नहीं था.

अकादमी पुरस्कारों का खेल

अकादमी पुरस्कारों का खेल

साल के आख़िरी दिनों में साहित्यिक हलके में अकादमी पुरस्कारों को लेकर सरगर्मियां तेज़ हो जाती हैं. राजधानी दिल्ली में तो अटकलों का बाज़ार इस कदर गर्म हो जाता है कि तथाकथित साहित्यिक ठेकेदारों की जेब में पुरस्कृत होने वाले...

इस भटकाव की वजह क्या है

इस भटकाव की वजह क्या है

बीती 15 नवंबर को राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने एक ऐसे शिक्षक को एक लाख रुपये मुआवजे की सजा से दंडित किया, जिसने आज से 12 वर्ष पहले एक छात्र को पूरे दिन निर्वस्त्र ख़डा रखा था. अतिरिक्त सत्र...

राष्ट्रमंडल खेलों की सुरक्षा पर सरकार का रवैया

राष्ट्रमंडल खेलों की सुरक्षा पर सरकार का रवैया

भारत अगले साल राष्ट्र मंडल खेलों की मेजबानी के लिए पूरी तरह मुस्तैद है. राजधानी दिल्ली में होने वाले इन खेलों के लिए हर लिहाज़ से चौकसी बरती जा रही है, क्योंकि भारत आतंकियों के लिए पहले से ही एक...

जनता के पैसे पर अययाशी का खेल

जनता के पैसे पर अययाशी का खेल

भारत में किसी भी बड़े खेल आयोजन में बड़े स्तर की आर्थिक घोटालेबाज़ी भी सामने आती है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, पिछली बार जब भारत में क्रिकेट विश्वकप आयोजित किया गया था तो वित्तीय अनियमितताओं के लिए तत्कालीन बीसीसीआई...

पपीते ने दी पहचान

पपीते ने दी पहचान

राजस्थान में भरतपुर ज़िले की वैर तहसील के किसान यह अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि परंपरागत फसलों की खेती से भोजन की आवश्यकता तो पूरी की जा सकती है, लेकिन बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, शादी-ब्याह एवं अन्य खर्चों...

हक़ीक़त है, जिन्ना में जादू था

हक़ीक़त है, जिन्ना में जादू था

यदि गांधी अभी जीवित होते तो 2 अक्टूबर 2009 को अपने 140वें जन्मदिन पर कहां होते? बेशक़, वह महाराष्ट्र में अनशन कर रहे होते. आख़िर क्यों? यदि आंकड़ों के मुताबिक़ देखें तो राज्य पुलिस का आम नागरिक जीवन में दख़ल...

आडवाणी की नियति है कि वे सूरज बनकर चमक नहीं सकते

आडवाणी की नियति है कि वे सूरज बनकर चमक नहीं सकते

आडवाणी सज्जन पुरुष हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह दब्बू भी हैं, कई बार उन्होंने कड़े फैसले भी किए हैं न केवल दूसरों के बारे में, बल्कि अपने बारे में भी. ऐसा ही एक कड़ा निर्णय था 1973...

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