क़ानूनी तौर पर जंगल आदिवासियों का नहीं

एक लंबे संघर्ष के बाद वन अधिकार कानून (एफआरए) लागू हुआ. मकसद जल-जंगल-जमीन पर वहां के मूल निवासियों को पहला अधिकार देना था. सरकार-कॉरपोरेट को भला ये कहां हजम होता, सो इस कानून को कमजोर बनाने की साजिश 2016 से ही शुरू कर दी गई. इसी के तहत कैंपा और सीएएफ बिल पारित किया गया. […]

अब हरित क्रांति की क़ीमत चुका रहा पंजाब

पंजाब में पिछले तीन दशक से आर्थिक विकास की एक आंधी चली है. पंजाब के किसानों ने हरित क्रांति को अपनाकर विकास तो किया, लेकिन इसकी कीमत अब लोगों को चुकानी पड़ रही है. जल, जंगल, जमीन और हवा का तालमेल बिगड़ने से संकट और ज्यादा गहराया है. पिछले तीन दशकों से रासायनिक उर्वरकों तथा […]

छत्तीसगढ़ में विकास कार्यों में 2168 करोड़ रुपए की अनियमितता : ग़रीब प्रदेश में ‘विकास’ की लूट

बात एक ऐसे प्रदेश की जिसे प्रकृति ने समृद्ध-संपन्न बनाया, लेकिन प्रशासनिक अकुशलता, सरकारी काहिली, नीतियों और दूरदृष्टि के अभाव में आज यह पिछड़े प्रदेशों से होड़ ले रहा है. आदिवासियों, वंचितों और पिछड़ों की बहुलता वाले इस प्रदेश का आलम यह है कि स्पष्ट सोच और रणनीति नहीं होने के कारण सरकार अपने बजट […]

मोक्ष-ज्ञान भूमि : बदलेगी बोधगया की तस्वीर

स्मार्ट सिटी के रूप में भले ही गया का चयन नहीं किया गया है लेकिन हृदय व प्रसाद योजना के तहत इसकी तस्वीर बदलने का प्रयास किया गया है. इस योजना के तहत गया-बोधगया को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन स्तर का स्वरूप प्रदान किया गया है. मोक्ष और ज्ञान भूमि गया-बोधगया अनादि काल से दुनिया के लोगों […]

असहमति की जगह बचनी चाहिए

कामनाएं की गई थीं कि पिछली शताब्दी में जितने ख़ून-ख़राबे हुए, जितनी असहिष्णुता हुई, वह अगली शताब्दी में नहीं होगी. नई शताब्दी आई, लेकिन लोगों की शुभकामनायें काम नहीं आईं. विश्‍व के लगभग हर देश में किसी न किसी प्रकार के सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं. असहमति के लिए कोई जगह बचेगी या नहीं, इस […]

गंगा बचाओ अभियान : लौटा द नदिया हमार

बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित लंगट सिंह कॉलेज में बीते दिनों गंगा समाज के प्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, समाजशास्त्रियों, संस्कृतिकर्मियों, नदी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों एवं प्रदूषण की वजह से तबाह हुए लोगों का एक सम्मेलन हुआ, जिसका उद्घाटन समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने किया. इस अवसर पर गंगा मुक्ति आंदोलन के संयोजक अनिल […]

अखिलेश राज की रणनीति – आतंकियों पर नरम सत्याग्रहियों पर गरम?

सरकार को जनता का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसे मुसीबतों से बचाने के लिए रणनीति एवं योजनाएं बनाना उसी की ज़िम्मेदारी है. संविधान का अक्षरश: पालन हो, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए. किसी भी सरकार या राजनीतिक दल को राजनीति देश एवं समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि जोड़ने, विकास, जनता को रोजी-रोटी मुहैय्या […]

जल,जंगल और ज़मीन – आखिर सरकार किसके लिए कानून बनाती है?

जल, जंगल और ज़मीन ऐसे प्राकृतिक संसाधन हैं, जो इस देश के करोड़ों लोगों के जीवन का मूलभूत आधार हैं. सदियों से नदी के किनारे और जंगल में बसे लोगों का इन संसाधनों पर नैसर्गिक अधिकार रहा है. लेकिन सरकार नव-उदारवादी व्यवस्था की आड़ में आम आदमी को उसके इस अधिकार से वंचित करने की […]

एक आंदोलन- ताकि यमुना कैदमुक्त हो

1990 में शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण अब अपना असर दिखा रहा है. ख़ुशहाली से भरे सपनों का गुब्बारा फटने लगा है. व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश और व्यवस्था के प्रति नाराज़गी बढ़ती ही जा रही है. देश भर में हज़ारों आंदोलन चल रहे हैं और सभी आंदोलनों का मूल मुद्दा एक ही है, जल, जंगल और […]