fbpx
Now Reading:
श्री साईनाथ स्तवन मंजरी
Full Article 3 minutes read

श्री साईनाथ स्तवन मंजरी

मैं अज्ञानी पतित पुरातन, पापी दल का परम शिरोमणि,

सच में कुटिल महा खलकामी, मत ठुकराओ अंतर्यामी.

दोषी कैसा भी हो लोहा, पारस स्वर्ण बनाता चोखा,

नाला मल से भरा अपावन, सुर सरिता करती है पावन.

मेरा मन अति कलुष भरा है, नाथ हृदय अति दया भरा है,

कृपादृष्टि से निर्मल कर दें, झोली मेरी प्रभुवर भर दें.

पारस का संग जब मिल जाता, लौह सुवर्ण यदि नहीं बन पाता,

तब तो दोषी पारस होता, विरद वही अपना है खोता.

पापी रहा यदि प्रभु तव दास, होता आपका ही उपहास,

प्रभु तुम पारस, मैं हूं लोहा, राखो तुम ही अपनी शोभा.

अपराध करे बालक अज्ञान, क्रोध न करती जननी महान,

हो प्रभु प्रेम पूर्ण तुम माता, कृपा प्रसाद दीजिए दाता.

सद्गुरु सांई हे प्रभु मेरे, कल्पवृक्ष तुम करुणा प्रेरे,

भवसागर में मेरी नैया, तू ही भगवान पार करैया.

कामधेनु सम तू चिंतामणि, ज्ञान-गगन का तू है दिनमणि,

सर्वगुणों का तू है आकार, शिरडी पावन स्वर्ग धरा पर.

पुण्य धाम है अतिशय पावन, शांति मूर्ति हैं चिदानंदन,

पूर्ण ब्रह्म तुम प्रणव रूप हो, भेदरहित तुम ज्ञानसूर्य हो.

विज्ञान मूर्ति अहो पुरुषोत्तम, क्षमा शांति के परम निकेतन,

भक्त वृंद के उर अभिराम, हों प्रसन्न प्रभु पूरण काम.

सद्गुरु नाथ मछिंदर तू है, योगीराज जालंधर तू है,

निवृत्तिनाथ ज्ञानेश्वर तू है, कबीर एकनाथ प्रभु तू है.

सावता बोधला भी तू है, रामदास समर्थ प्रभु तू है,

माणिक प्रभु शुभ संत सुख तू, तुकाराम हे सांई प्रभु तू.

आपने धारे ये अवतार, तत्वत: एक भिन्न आकार

रहस्य आपका अगम अपार, जाति-पांति के प्रभु उस पार.

कोई यवन तुम्हें बतलाता, कोई ब्राह्मण तुम्हें जतलाता,

कृष्ण चरित की महिमा जैसी, लीला की है तुमने तैसी.

गोपियां कहतीं कृष्ण कन्हैया, कहे लाडले यशुमति मैया,

कोई कहे उन्हें गोपाल, गिरिधर यदूभूषण नंदलाल.

कहें बंशीधर कोई ग्वाल, देखे कंस कृष्ण में काल,

सखा उद्धव के प्रिय भगवान, गुरुवत अर्जुन केशव जान.

हृदय भाव जिसके हों जैसे, सद्गुरु को देखे वह वैसे.

प्रभु तुम अटल रहे हो ऐसे, शिरडी थल में ध्रुव सम बैठे.

रही मस्स्जिद प्रभु का आवास, तव छिद्रहीन कर्ण आभास,

मुस्लिम करते लोग अनुमान, सम थे तुमको राम-रहमान.

धूनी तव अग्नि साधना, होती जिससे हिंदू भावना,

अल्ला मालिक तुम थे जपते, शिवसम तुमको भक्त सुमरते.

हिंदू-मुस्लिम ऊपरी भेद, सुभक्त देखते पूर्ण अभेद,

नहीं जानते ज्ञानी विद्वेष, ईश्वर एक पर अनगिन वेश.

पारब्रह्म आप स्वाधीन, वर्ण जाति से मुक्त आसीन,

हिंदू-मुस्लिम सबको प्यारे, चिदानंद गुरुजन रखवारे.

करने हिंदू-मुस्लिम एक, करने दूर सभी मतभेद,

मस्जिद-अग्नि जोड़कर नाता, लीला करते जन सुखदाता.

प्रभु धर्म-जाति बंधन से हीन, निर्मल तत्व सत्य स्वाधीन,

अनुभवगम्य तुम तर्कातीत, गूंजे अनहद आत्म संगीत.

समक्ष आपके  वाणी हारे, तर्क-वितर्क व्यर्थ बेचारे,

परिमति शब्द है भावाभास, हूं मैं अकिंचन प्रभु का दास.

यद्यपि आप हैं शब्दाधार, शब्द बिना न प्रगटें गीत,

स्तुति करूं ले शब्दाधार, स्वीकारो हे दिव्य अवतार.

कृपा आपकी पाकर स्वामी, गाता गुण-गण यह अनुगामी,

शब्दों का ही माध्यम मेरा, भक्ति प्रेम से है उर प्रेरा.

संतों की महिमा है न्यारी, ईश्वर की विभूति अनियारी,

संत सरसते साम्य सभी से, नहीं रखते बैर किसी से.

हिरण्यकशिपु-रावण बलवान, विनाश हुआ इनका जग जान,

देव-द्वेष था इसका कारण, संत द्वेष का करें निवारण.

गोपीचंद अन्याय कराए, जालंधर मन में नहीं लाए,

महासंत ने किया क्षमा था, परम शांति का वरण किया था.

बढ़कर नृप उद्धार किया था, दीर्घ आयु वरदान दिया था,

संतों की महिमा जग पावन, कौन कर सके गुण-गण गायन.

संत भूमि के ज्ञान दिवाकर, कृपा ज्योति देते करुणाकर,

शीतल शशि सम संत सुखद हैं, कृपा कौमुदी प्रखर अवनि है.

है कस्तूरी सम मोहक संत, कृपा है उनकी सरस सुगंध,

ईख रसवत होते हैं संत, मधुर सुरुचि ज्यों सुखद बसंत.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.