दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने समाचार एजेंसी यूएनआई के दो वरिष्ठ पत्रकारों समेत तीन लोगों की ज़मानत याचिका ख़ारिज़ कर उन्हें जेल भेज दिया. इन लोगों पर दलित सहकर्मी को प्रता़िडत करने के आरोप हैं. एजेंसी में विभिन्न मामलों को लेकर  चल रहे  आंदोलन के प्रवक्ता संजय कनौजिया के मुताबिक़, इन आरोपियों के विरुद्ध करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार के मामले की जांच चल रही है. अब इनके विरुद्ध मुक़दमा चल रहा है. आशा है कि सरकार यूएनआई के संकट पर विशेष ध्यान देगी और कई भाषाओं में समाचार सेवाएं प्रदान करती आ रही है इस एजेंसी को स्वार्थी तत्वों के चंगुल से आज़ाद कराकर आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रयास करेगी.
pdबीते 12 दिसंबर 2013 को पटियाला हाउस न्यायालय द्वारा समाचार एजेंसी यूएनआई के एक दलित कर्मचारी के साथ दुर्व्यवहार के मामले में ज्वाइंट एडीटर नीरज बाजपेयी, डिप्टी चीफ़ ऑफ ब्यूरो यूनिवार्ता अशोक उपाध्याय और क्लर्क मोहन लाल जोशी की ज़मानत याचिका ख़ारिज़ करके न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. इस मामले में निष्पक्षता से खबरें छापने और सक्रिय भूमिका अदा करने के लिए ‘चौथी दुनिया’ (उर्दू-हिंदी) की सराहना की जा रही है. यूएनआई में कुछ वरिष्ठ कर्मियों पर वित्तीय अनियमितता के  भी आरोप हैं. कोर्ट द्वारा इन कर्मचारियों को जेल भेजे जाने के बाद  फैसले के बाद अब यह आशा की जा रही है कि न्यायालय के इस निर्णय से यूएनआई जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की समाचार एजेंसी को कुछ स्वार्थी तत्वों से निजात दिलाने और आर्थिक संकट से बाहर निकलने में मदद मिलेगी. साथ ही इस समाचार एजेंसी को बंद करने के षडयंत्र को हमेशा के लिए ख़त्म किया जा सकेगा और वास्तविक विवाद में आरोप सिद्ध होने पर आरोपियों को सज़ा मिलेगी और पीड़ितों को न्याय मिल सकेगा.
उपरोक्त निर्णय पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल ज़िला व सेशन जज दिया प्रकाश द्वारा तीन बिंदुओं के मद्देनज़र लिया, जिनमें मुक़दमा एससी एंड एसटी (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज़) एक्ट की धारा तीन से संबंधित है, जो एक सोशल लेजिसलेशन है और इसका उद्देश्य एससी और एसटी समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी के लिए कार्यवाही करना है. दूसरी शिकायत जांच के दौरान शिकायतकर्ता के द्वारा दर्ज की गई है. शिकायतकर्ता के साथ दो गवाहों के बयान लिए गए हैं. चालान के अनुसार आरोपों की व्याख्या की गई है. तीसरा बिंदु यह है कि आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप बेहद गंभीर हैं. यूएनआई की पीड़ित दलित महिला कर्मचारी के वकील के अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एपीएन गिरि और दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अरविंद कुमार चौधरी ने आरोपियों की अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी का विरोध किया और कहा कि आरोपियों का जुर्म काफ़ी गंभीर है. लिहाज़ा उन्हें तत्काल ही न्यायिक हिरासत में भेजा जाना चाहिए.
इस मामले में आरोपी अशोक उपाध्याय पर यूएनआई की एक वरिष्ठ पत्रकार के मानसिक उत्पीड़न और शोषण का आरोप है और इस मामले की जांच राष्ट्रीय महिला आयोग के द्वारा की जा रही है. ज्ञात रहे कि इस मामले में तथाकथित कर्मचारी लीडर मुकेश कौशिक भी आरोपी हैं. यूएनआई बचाव आंदोलन के प्रवक्ता संजय कनौजिया ने ‘चौथी दुनिया’ को बताया कि इन आरोपियों के विरुद्ध करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार के मामले की जांच चल रही है. उन्होंने यह भी कहा कि इन्हीं मामलों को लेकर 25 फ़रवरी 2013 को नई दिल्ली में यूएनआई मुख्यालय और एनआईएस पर पत्रकारों, कवियों, साहित्यकारों, ट्रेड यूनियनों, राजनीतिक पार्टियों और गैर-सरकारी संगठनों ने प्रदर्शन किया था और फिर 6 अगस्त 2013 को भी जंतर-मंतर पर ज़बरदस्त प्रदर्शन किया गया था. कनौजिया का कहना है कि यूएनआई के पूरे मामले को उजागर करने में ‘चौथी दुनिया’ की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है. हमने 29 जुलाई से 4 अगस्त 2013 के अंक में ‘यूएनआई के आर्थिक संकट का अंजाम क्या होगा?’ और 16 से 22 सितंबर 2013 के अंक में ख़ुलासा करती रिपोर्टें प्रकाशित की थीं. इसके बाद यह मामला सामने आया था कि किस तरह यूएनआई पर क़ब्ज़ा करने या इसे ख़त्म करने के षडयंत्र चल रहे हैं. ज़ाहिर सी बात है कि तीन आरोपी, जिनकी ज़मानत की याचिका ख़ारिज हुई है और जिनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चल रहा है, उनका संबंध यूएनआई से है जो भारी आर्थिक संकट का शिकार है.
यूएनआई के लिए दुर्भाग्य यह रहा है कि यह समय-समय पर किसी न किसी स्वार्थी व्यक्ति के शोषण का शिकार रही है. वर्तमान में विश्‍वास त्रिपाठी इस पर क़ाबिज़ हैं, जबकि अतीत में प्रफुल्ल महेश्‍वरी का इस पर प्रभुत्व था और इससे पूर्व ज़ी न्यूज़ की मीडिया वॉच के सुभाष चंद्रा को धांधली कर यूएनआई का स्वामित्व अधिकार दे दिया गया था, जिसे आनंद बाज़ार पत्रिका समूह ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी. ज्ञात रहे कि आनंद बाज़ार समूह के पास यूएनआई के सबसे अधिक शेयर हैं. इसके बाद सुभाष चंद्रा ने स्वयं को इससे अलग कर लिया था और कहा था कि अब मेरा यूएनआई से कोई लेना देना नहीं है. उस समय सुभाष चंद्रा ने यह भी कहा था कि 32 करोड़ रुपये, जिनमें से जो कुछ ख़र्च हो गया है, वह पूरे का पूरा नहीं वापस किया जाए. दरअसल, आनंद बाज़ार समूह के चेयरमैन डीडी पुरकायस्थ और उदय भट्टाचार्य ने यूएनआई के सभी कर्मचारियों के वेतन व अन्य सुविधाओं आदि को नियमित कर दिया, जिससे यह संदेश मिला कि अब यूएनआई की आर्थिक स्थिति में सुधार आ रहा है, लेकिन यह सरासर धोखा था.
अब यूएनआई के तीन कर्मचारियों के विरुद्ध मुक़दमा चल रहा है और अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी है. आशा है कि सरकार यूएनआई के संकट पर विशेष ध्यान देगी और दशकों से कई भाषाओं में समाचार सेवाएं प्रदान करती आ रही है इस एजेंसी को स्वार्थी तत्वों के चंगुल से आज़ाद कराकर निष्पक्ष एवं आत्मनिर्भर बनाने के लिए समग्रता से प्रयास करेगी.

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