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सेवानिवृत्‍त लेफ्टिनेंट कमांडर बेनीवाल : नियमों के जाल में उलझी पेंशन
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सेवानिवृत्‍त लेफ्टिनेंट कमांडर बेनीवाल : नियमों के जाल में उलझी पेंशन

तमाम सर्वे बताते हैं कि आज के युवा सेना में नौकरी करने की बजाय अन्य कोई पेशा अपनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सेना की नौकरी के आकर्षण में कोई कमी आई हो या फिर वहां मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती की गई हो, बावजूद इसके विभिन्न वजहों से सेना में नए अधिकारियों की कमी दिख रही है. उन्हीं वजहों में से एक है पेंशन का मामला. सेना में पेंशन विसंगतियों को लेकर संभवत: पहली बार कोई रिटायर्ड नौसेना अधिकारी सार्वजनिक रूप से सामने आया है. आखिर क्या है पूरी कहानी, पढ़िए चौथी दुनिया की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में….

देश के सैन्यबलों (थलसेना, नौसेना और वायुसेना) में अधिकारियों की कमी है. वर्तमान में केवल थलसेना में लगभग 11,000 अधिकारियों की कमी है. अमूमन यही स्थिति नौसेना और वायुसेना में भी है. 2009 में रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अधिकारियों की कमी पर चिंता ज़ाहिर की थी और रक्षा मंत्रालय से यह कमी जल्द से जल्द दूर करने के लिए कहा था. संसदीय समिति के अनुसार, थलसेना में 26.8 प्रतिशत, नौसेना में 16.7 और वायुसेना में 12.1 प्रतिशत अधिकारियों की कमी है. युवा आज भी सेना में करियर बनाने को वरीयता नहीं देते. समाज में पूर्व सैनिक अधिकारियों की बदहाली की वजह से नई पीढ़ी अपने क़दम पीछे खींच लेती है. आखिर युवाओं के मन में इस सेना के प्रति घटते रुझान की वजह क्या है. कारण और भी हो सकते हैं, लेकिन जब नौसेना से सेवानिवृत्त एक अधिकारी ने चौथी दुनिया को अपनी आपबीती सुनाई तो लगा कि पेंशन जैसे अहम मसले पर भी सेना के भीतर कई खामियां हैं.

दरअसल, सेना में उन अधिकारियों को पेंशन देने का प्रावधान नहीं है, जिन्होंने कम से कम 20 साल तक सेना में कार्य न किया हो. जबकि आर्मी पेंशन रेगुलेशन 1961, पेंशन रेगुलेशन फॉर एयरफोर्स 1961 एवं नेवी (पेंशन) रेगुलेशन 1964 के प्रावधान कुछ अलग बात करते हैं. चौथी दुनिया ने जब इन दस्तावेजों की जांच-पड़ताल की और नियत समय से पहले (प्री मेच्योर), नौसेना की अनुमति के साथ सेवानिवृत्त हुए लेफ्टिनेंट कमांडर जी एस बेनीवाल से मुलाक़ात की, तो मालूम हुआ कि वह 16 साल से पेंशन पाने के लिए जद्दोज़हद कर रहे हैं, मगर उनकी हर कोशिश नाक़ाम रही. यहां तक कि उच्चतम न्यायालय के दरवाजे से भी उन्हें मायूस लौटना पड़ा. वहां भी फैसला उनके खिला़फ गया. इसके बावजूद उन्होंने अब तक आस नहीं छोड़ी है.

बेनीवाल कहते हैं कि नेवी (पेंशन) रेगुलेशन 1964 के रेगुलेशन 18 में एडमीसिबिलिटी (ग्राह्यता) का जिक्र किया गया है, जिसमें कहा गया है कि एक अधिकारी, जिसे सेवानिवृत्त होने की अनुमति दी गई हो, को इन प्रावधानों के आधार पर पेंशन दी जा सकती है. वहीं रेगुलेशन 19 में न्यूनतम सेवा की अवधि के बारे में कहा गया है कि पेंशन की पात्रता के लिए लेट एंट्री करने वालों को 15 साल और बाक़ी सभी को 20 साल तक सेना में कार्य करना आवश्यक है. इन्हीं दो रेगुलेशंस के बीच बेनीवाल की पेंशन का मामला फंसा हुआ है. रेगुलेशन 21 (1) में कहा गया है कि किसी भी अधिकारी की सेवा पेंशन का आकलन रिटायरमेंट के पूर्व अंतिम दस माह में उसने जिस रैंक के अधिकारी के रूप में कार्य किया हो, उसके आधार पर की जाएगी. यदि अधिकारी ने एडमिरल के पद पर कार्य किया हो, तो उसके लिए अंतिम एक साल तक उस पद पर बने रहने के आधार पर पेंशन का आकलन किया जाएगा. यदि अधिकारी उपरोक्त समयावधि तक कार्य न कर पाया हो, तो पेंशन का आकलन वर्तमान पद के ठीक नीचे वाले पद पर दस महीने तक कार्य करने के आधार पर किया जाएगा. पेंशन की दर रेगुलेशन 22 में बताई गई है, जिसमें सेवाकाल और पद के आधार पर स्टैंडर्ड पेंशन की स्टैंडर्ड दर की चर्चा है. रेगुलेशन 23 में बताया गया है कि यदि कोई अधिकारी रेगुलेशन 22 में बताए गए समय से कम समय तक कार्य करता है तो उसकी पेंशन की गणना रेगुलेशन 23 में दिए गए प्रारूप के आधार पर की जाएगी. पेंशन की पात्रता की इसी तरह की शर्तें आर्मी पेंशन रेगुलेशन 1961 (रेगुलेशन 22, 25, 29 और 30) और पेंशन रेगुलेशन फॉर दि एयरफोर्स 1961 ( रेगुलेशन 24, 25, 28, 29 और 30) में दी गई हैं.

नेवी (पेंशन) रेगुलेशन 1964 एक स्टेट्यूटरी रेगुलेशन है, जिसमें संशोधनों के लिए उसे संसद के सामने रखना पड़ता है और उसके लिए संसद की सहमति आवश्यक है. जबकि आर्मी और एयरफोर्स के रेगुलेशन नॉन स्टेट्यूटरी हैं, जिनमें रक्षा मंत्रालय भारत सरकार के आदेशों के आधार पर संशोधन कर सकता है और उन संशोधनों के लिए संसद की सहमति आवश्यक नहीं है. 1964 से लेकर 2007 तक उसमें किसी भी तरह का कोई संशोधन नहीं हुआ है. नेवी (पेंशन) रेगुलेशन 1964 सभी परमानेंट कमीशन अधिकारियों पर समान रूप से लागू होता है. रेगुलेशन 18 के मूल स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, जबकि रेगुलेशन 22 एवं 23 में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं. रक्षा मंत्रालय के पत्र क्रमांक  8(3)/85/A/D(Pension/services) 19 फरवरी, 1987 में सेना के कमीशन अधिकारियों की किसी पब्लिक सेक्टर संस्थान में प्रतिनियुक्ति या रिटायर होने की अनुमति मिल जाने (एडमिसीबिलिटी) की स्थिति में उन्हें प्रो-रेटा पेंशन (आंशिक पेंशन) दिए जाने की बात कही गई है. पत्र में कहा गया है कि यह आदेश उन अधिकारियों के लिए लागू होगा, जो डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) के दौरान यदि किसी केंद्रीय पब्लिक सेक्टर संस्थान में पूरी तरह समाहित होने का विकल्प चुनना चाहते हों और इस उद्देश्य के निर्वहन के लिए उन्हें पदभार से मुक्त/सेवानिवृत्त होने की अनुमति दी गई हो अथवा वे प्रॉपर चैनल के ज़रिए पब्लिक सेक्टर में गए हों. इसी पत्र में प्रो-रेटा पेंशन पाने के लिए कम से कम दस वर्ष सैन्यबल में कार्य करने की अनिवार्यता की बात भी कही गई है.

लेफ्टिनेंट कमांडर (रिटा.) जी एस बेनीवाल के मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने नेवी (पेंशन) रेगुलेशन 1964 के  रेगुलेशन 23 के अंतर्गत डिफिसिएंसी इन सर्विस का जिक्र किया और कहा कि उक्त प्रावधान केवल उन अधिकारियों पर लागू होते हैं, जिन्होंने कम से कम 20 वर्ष तक सेना में कार्य किया हो. इसलिए नेवी (पेंशन) रेगुलेशन के रेगुलेशन क्रमांक 21 एवं 23 का फायदा केवल उन्हीं अधिकारियों को मिलेगा, जिन्होंने सेना में 20 वर्ष तक कार्य किया हो (रेगुलेशन 19) और वे ही पेंशन पाने के पात्र होंगे. लेफ्टिनेंट कमांडर (रिटा.) जी एस बेनीवाल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि देश में मंत्रालय के आदेशों के आधार पर पेंशन दी जा रही है, जबकि पेंशन रेगुलेशन का उल्लंघन किया जा रहा है. कुछ ब्यूरोक्रेट्‌सरेगुलेशन की जगह मंत्रालय के पत्रों को अथॉरिटी बना रहे हैं. इसलिए पूर्व सैन्य अधिकारियों को पेंशन के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ती है. उच्चतम न्यायालय का मैं सम्मान करता हूं. उन्होंने कहा कि जिस दौरान उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हो रही थी, मुझे मामले से संबंधित कुछ निर्णायक दस्तावेज़ और सूचनाएं उसके बाद मिल पाईं, जिस कारण फैसला मेरे पक्ष में नहीं गया. मैं क़ानून के सम्मान की बात कर रहा हूं और उसे स्थापित कराने के लिए कई वर्षों से संघर्ष कर रहा हूं. सरकारी पत्रों की जगह क़ानून को ऊपर रखकर मेरे जैसे सैन्य अधिकारियों को न्याय मिल सकता है. मैं अपना हक मांग रहा हूं, कोई खैरात नहीं. आज नहीं तो कल, मैं अपने आपको सही साबित करके रहूंगा.

एक तऱफ तो सेना से सेवानिवृत्त अधिकारियों को पीएसयू में जाने के प्रावधान की जानकारी नहीं है, वहीं दूसरी तऱफ उन सैन्य अधिकारियों, जिन्होंने 20 साल से कम सेवा की है और जो प्रॉपर चैनल के जरिए पीएसयू में चले गए थे, उन्हें रक्षा मंत्रालय के उक्तआदेश के आधार पर रेगुलेशन 23 (नेवी रेगुलेशन) के तहत पेंशन दी जा रही है. चौथी दुनिया के पास ऐसे दस्तावेज़ हैं, जो बताते हैं कि कई सैन्य अधिकारी 19 फरवरी, 1987 के पत्र के आधार पर पीएसयू में गए और उन्होंने वहां पदभार ग्रहण नहीं किया. उसके बावजूद वे आज पेंशन पा रहे हैं. इसके साथ ही कई ऐसे अधिकारी भी हैं, जिन्होंने पीएसयू में पदभार ग्रहण किया और जल्दी ही वहां नौकरी छोड़ दी. वे भी पेंशन पा रहे हैं, लेकिन बेनीवाल, जिन्होंने 16 साल तक देश की सेवा की, वह रेगुलेशन 18 में एडमिसीबिलिटी बनने और रेगुलेशन 23 के आधार पर पेंशन पाने की कोशिश कर रहे हैं, पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही है. हाल में केंद्र सरकार ने सैन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए वन रैंक-वन पेंशन योजना के तहत 2300 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं. कैबिनेट के इस निर्णय का फायदा उन सैन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों को मिलेगा, जो जनवरी 2006 से पहले रिटायर हुए हैं. उन्हें इस तिथि के बाद समान रैंक के सेवानिवृत्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लगभग बराबर पेंशन मिलेगी. इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक पूर्व सैनिक को सेवानिवृत्ति के पद के आधार पर पेंशन मिलेगी, न कि इस आधार पर कि वह सेना में कब भर्ती हुआ और कब रिटायर हुआ. इस योजना का फायदा लगभग 13 लाख पूर्व सैनिकों को मिलेगा.

अगर सरकार सैनिकों की पेंशन को लेकर गंभीर है तो उसे लेफ्टिनेंट कमांडर (रिटा.) जी एस बेनीवाल जैसे अधिकारियों की पेंशन संबंधी मामले का हल ज़रूर निकालना चाहिए, जिससे पूर्व सैन्य अधिकारियों का सम्मान बना रहे और वे बाहर रहते हुए भी सेना में शामिल होने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित करते रहें.

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