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पाकिस्‍तानः गहराता जा रहा है तख्‍तापलट का खतरा
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पाकिस्‍तानः गहराता जा रहा है तख्‍तापलट का खतरा

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ के एक बयान ने पिछले दिनों पूरी दुनिया में हलचल मचा दी थी. मुशर्ऱफ ने अपनी राजनीतिक पार्टी के लांच से तीन दिन पहले लंदन में कहा कि पाकिस्तान में एक बार फिर सैनिक शासन का दौर शुरू होने वाला है. पूरी दुनिया के लिए यह बयान भले चौंकाने वाला हो, लेकिन चौथी दुनिया ने जुलाई महीने में ही यह बात कही थी. हमने उस समय कहा था कि सितंबर महीने तक पाकिस्तान सैनिक शासन की गिरफ़्त में आ सकता है. ऐसा नहीं हुआ, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी है और सच्चाई यही है कि पाकिस्तान में कभी भी तख्तापलट हो सकता है और सैनिक तंत्र शासन पर अधिकार जमा सकता है.

सरकार मजबूर है क्योंकि वह जनता का विश्वास खो चुकी है. लोग मांग करने लगे हैं कि इनसे अच्छी तो सेना थी. यह मांग वहां बढ़ रही है और लोकतंत्र के लिए ख़तरा पैदा कर रही है. लोकतंत्र के नाम पर शासन करने वाले लोग लूट तंत्र और दमन तंत्र की रक्षा करने वाले बन गए हैं. अपने 63 साल के अस्तित्व में आधे से ज़्यादा समय तक पाकिस्तान सैनिक शासन के अंतर्गत ही रहा है.

पाकिस्तान के अंदरूनी हालात लगातार बद से बदतर होते जा रहे हैं. महंगाई आसमान से भी ऊपर जा रही है और बहुत सी जगहों पर रोटी और अनाज के लिए दंगे हो रहे हैं. आम आदमी परेशान है क्योंकि उसकी बातें सुनी नहीं जा रही हैं. बेरोज़गारी हद से ज़्यादा ब़ढ रही है. इसका सबसे ब़डा असर वहां की क़ानून व्यवस्था पर प़डा है. छीनाझपटी ब़ढ रही है और चोरी व डकैती की ख़बरें आम हो गई हैं. बेरोज़गार नौजवानों को लगता है कि नौकरी या काम न मिलने की हालत में चोरी डकैती रोज़ी-रोटी का आसान रास्ता है. पुलिस के पास समय नहीं है कि लोगों को पक़डे या फिर उसकी विश्वसनीयता इतनी गिर गई है कि कोई उसे तवज्जो ही नहीं दे रहा है. देश के अधिकांश हिस्सों में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है, वहां कट्‌टरवादी और आतंकी संगठनों का राज चलता है. दहशतगर्दी अपने चरम पर है, प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलबाला है.

क़ानून-व्यवस्था का आलम यह है कि सरेआम क़त्ल और हत्याएं हो रही हैं, लेकिन सरकार कुछ कर नहीं पाती. देश का पुलिस तंत्र सामंती ताक़तों का पिट्‌ठू बन कर रह गया है. आम लोग पुलिस के पास जाने से भी डरते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी शिक़ायत पर कार्रवाई तभी होगी जब किसी बड़ी शख्सियत का वरदहस्त उन्हें हासिल हो. हाल के दिनों में आई बाढ़ ने पहले से ही क़र्ज़ में डूबी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है. बाढ़ग्रस्त इलाक़ों में अभी भी लाखों लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हैं. देश का राजनीतिक तंत्र कितना ज़िम्मेदार है, इसका पता इस बात से लग जाता है कि जब लाखों लोग बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे थे, तो राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी विदेश यात्रा पर थे. बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाने में भी घपले हुए. अल्पसंख्यकों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. नतीजा यह है कि केवल ज़रदारी ही नहीं, राजनीतिज्ञों की पूरी जमात ही जनता की नज़रों में पूरी तरह ख़ारिज हो चुकी है. राजनीतिक दलों और नेताओं को आम जनता की दुश्वारियों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, उन्हें केवल अपने फायदे की चिंता है. देश का न्यायिक तंत्र भी कमोबेश इसी हालत में है. वह हर क़ीमत पर अपने अधिकारों में इज़ा़फे की कोशिश में है ताकि राजनीतिक तंत्र की उल-जुलूल हरकतों से बचा रह सके. देश में ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी लगातार बढ़ती जा रही है. जनता निराश है क्योंकि उसकी समस्याओं के बारे में सोचने वाला कोई नहीं है. ऐसे हालात हों तो तख्तापलट की संभावना से भला कैसे इंकार किया जा सकता है.

वैसे भी, पाकिस्तान में तख्तापलट का पुराना इतिहास है. ख़ुद मुशर्ऱफ भी 1999 में नवाज़ शरीफ को सत्ता से बेदख़ल कर सैन्य शासन के मुखिया बने थे. मुशर्ऱफ ने यह मांग भी की है कि देश के संविधान में बदलाव कर शासन तंत्र में सेना की भूमिका तय की जाए. उनके इस बयान की चारों ओर आलोचना हो रही है और देशद्रोह का मुक़दमा चलाने की मांग की जा रही है. लेकिन सच्चाई यही है कि सेना वैसे भी शासन में अपना दख़ल देती रही है. मौजूदा हालात में भी सभी फैसले परदे के पीछे से सेना द्वारा ही लिए जा रहे हैं. कुछ दिन पहले की बात है जब भारत और पाकिस्तान के विदेशमंत्रियों के बीच वार्ता हो रही थी. भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा का पाक प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी के साथ मिलने का कार्यक्रम तय था. इसी बीच सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी गिलानी से मिलने पहुंचे और कृष्णा के साथ उनकी मीटिंग को टाल दिया गया. यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि पाकिस्तान में सत्ता का केंद्र कहां स्थित है. सच्चाई तो यह है कि कयानी को सेवा विस्तार न मिलता तो पाकिस्तान में सैन्य तख्ता पलट शायद पहले ही हो चुका होता. पाकिस्तान में ऐसा पहली बार हुआ, जब सेना प्रमुख को किसी चुनी हुई सरकार द्वारा सेवा विस्तार हासिल हुआ है. कयानी को सेवा विस्तार देने का फैसला मजबूरी में लिया गया और इसमें अमेरिकी दबाव की भी बड़ी भूमिका रही, लेकिन इससे ख़तरा पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ, बस कुछ समय के लिए टल गया. कयानी पाकिस्तानी सेना के उस धड़े से जुड़े हैं, जो आईएसआई के साथ मिलकर आतंकी संगठनों को बढ़ावा देता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि सैन्य तख्ता पलट की किसी भी योजना में कयानी को पाक सेना के साथ आतंकी संगठनों, कट्टरवादी राजनीतिक पार्टियों और अमेरिका का भी समर्थन हासिल होगा. अमेरिका अ़फग़ानिस्तान-युद्ध में कामयाबी के लिए पाकिस्तान पर आश्रित है. उसकी एक ही इच्छा है कि पाकिस्तान में चाहे किसी की भी सत्ता हो, वह उसके कहे मुताबिक़ काम करे और इस लिहाज़ से कयानी एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं.

सरकार मजबूर है क्योंकि वह जनता का विश्वास खो चुकी है. लोग मांग करने लगे हैं कि इनसे अच्छी तो सेना थी. यह मांग वहां बढ़ रही है और लोकतंत्र के लिए ख़तरा पैदा कर रही है. लोकतंत्र के नाम पर शासन करने वाले लोग लूट तंत्र और दमन तंत्र की रक्षा करने वाले बन गए हैं. अपने 63 साल के अस्तित्व में आधे से ज़्यादा समय तक पाकिस्तान सैनिक शासन के अंतर्गत ही रहा है. 1958 में जब तत्कालीन सेनाध्यक्ष जेनरल अयूब ख़ान ने पहली बार तख्तापलट को अंजाम दिया था तो पाकिस्तान के नए संविधान को लागू हुए बमुश्किल दो साल ही हुए थे. 1971 में एक हिंसक संघर्ष के बाद देश का विभाजन हुआ और 1972 में ज़ुल्फिकार अली भुट्‌टो के नेतृत्व में लोकतंत्र की वापसी हुई, लेकिन केवल पांच साल बाद सेनाध्यक्ष जिया उल हक ने उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर दिया. 1977 से लेकर 1988 तक देश में सैन्य शासन का दूसरा दौर चला. 1988 में जेनरल जिया की मौत के बाद बेनजीर भुट्‌टो नई प्रधानमंत्री बनी. अगले एक दशक तक पाकिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी तरह चलती रही. कभी भुट्‌टो तो कभी नवाज़ शरीफ देश के प्रधानमंत्री बनते रहे, लेकिन समस्याएं जस की तस बनी रहीं. भारत के साथ कारगिल की लड़ाई में मिली पराजय से जनता में निराशा बढ़ी और 1999 में सेना ने मौक़े का फायदा उठाते हुए एक बार फिर सत्ता अपने हाथों में ले ली. आज पाकिस्तान में एक बार फिर फौज़ के आने की आहट सुनाई देने लगी है. मुशर्ऱफ ने हो सकता है यह बयान अपने राजनीतिक फायदे के लिए दिया हो, लेकिन इसे हलके में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि आज शायद पाकिस्तान के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है.

पाकिस्तान में सैनिक शासन

1958-71              -1958-69                     अयूब ख़ान

1969-71                       याहया ख़ान

1977-88                                                     जनरल जिया उल हक

1999-2008                                                परवेज़ मुशर्ऱफ

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