एक निजी टेलीविज़न की रिपोर्ट के अनुसार, बेनज़ीर भुट्टो हत्याकांड पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट सामने आने के बाद पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ से सरकारी प्रोटोकॉल और सुरक्षा वापस ले ली गई है. ब्रिटिश सरकार ने रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद परवेज़ मुशर्ऱफ की सुरक्षा में लगे जवानों की वीज़ा अवधि बढ़ाने से भी इंकार कर दिया. साथ ही स्कार्टलैंड यार्ड की ओर से दी गई बुलेटप्रूफ़ कार भी वापस ले ली गई. इधर पाकिस्तान के गृहमंत्री ने उक्त ख़बर को झूठा बताते हुए कहा है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सुरक्षा एवं प्रोटोकॉल उनका अधिकार है और सरकार की ज़िम्मेदारियों में शामिल है. इसलिए पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ की सुरक्षा एवं प्रोटोकॉल को ख़त्म नहीं किया गया और न ही इसका कोई नोटिफिकेशन जारी किया गया.

परवेज़ मुशर्रफ़ की भलाई इसी में है कि वह सियासत में आने की सोचें भी नहीं. देश की जनता और संसद अब भी मुशर्रफ़ को नापसंद करती है. वह अब भूतकाल का हिस्सा बन चुके हैं. मुशर्ऱफ के सत्ता पर क़ब्ज़ा करने से पहले फौज लोमड़ी की तरह चालाकी से सरकार पर क़ब्ज़ा कर लेती थी. मुशर्ऱफ ने एक हाथी की तरह देश, सत्ता, राजनीति और लोकतंत्र को रौंद कर रख दिया.

अपनी बात शुरू करने से पहले मैं आपको एक तीसरी ख़बर से परिचित कराना आवश्यक समझता हूं. पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ के ख़िला़फ संविधान के अनुच्छेद छह के अंतर्गत गद्दारी का मुक़दमा दर्ज करवाने के लिए न्यायालय में दायर याचिका पर सरकार से जवाब तलब किया गया है. याचिका में कहा गया है कि पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ ने जो क़दम उठाए थे, उन्हें न्यायाधीशों द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है. इसलिए उनके ख़िला़फ गद्दारी का मुक़दमा क़ायम किया जाए. लाहौर उच्चतम न्यायालय ने याचिका को सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है. मेरे हिसाब से जनरल परवेज़ मुशर्ऱफ का प्रोटोकॉल और सुरक्षा का सूरज ढल चुका है. पूर्व राष्ट्रपति की सुरक्षा व्यवस्था पर ब्रिटिश सरकार को प्रतिदिन 25 हज़ार पौंड ख़र्च करना पड़ रहा है (या था). इसके अतिरिक्त ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त वाजिद शम्सी अलहसनी ने कुछ समय पहले दी न्यूज़ को दिए गए अपने साक्षात्कार में बताया था कि विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान उच्चायोग लंदन को निर्देश जारी किए हैं कि पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ को संपूर्ण प्रोटोकॉल उपलब्ध कराया जाए. हम इस्लामाबाद से प्राप्त होने वाले निर्देशों पर अमल के लिए प्रतिबद्ध हैं. लिहाज़ा हम संपूर्ण प्रोटोकॉल उपलब्ध करा रहे हैं, जिसमें सुरक्षा में तैनात फौज के सात जवान भी शामिल हैं, जिन्हें पूर्व तानाशाह ने अपने दौर में भी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया था और अब रिटायर्ड होने के बाद भी अपने साथ रख लिया है. पूर्व राष्ट्रपति के साथ एक फौजी अफसर कर्नल इलियास तैनात हैं, जो तीन साल पूर्व गृह मंत्रालय में डेपूटेशन पर चले गए थे. कर्नल इलियास के अलावा सुरक्षा के इस अमले में पाकिस्तानी फौज के 12 अधिकारी शामिल हैं, जो पूर्व राष्ट्रपति द्वारा दक्षिणी लंदन में ख़रीदे गए फ्लैट पर सुरक्षा सेवा प्रदान करते हैं. उच्चायोग ने परवेज़ मुशर्रफ़ की लंदन रवानगी के समय एक बुलेटप्रूफ़ कार प्रोटोकॉल अधिकारी के साथ भेजी है. साथ ही उच्चायोग उनके लिए वीआईपी व्यवस्था भी कराता है. लंदन में परवेज़ मुशर्रफ़ की सुरक्षा के लिए 12 नियमित अधिकारी तैनात किए गए हैं, इसलिए उन्हें राष्ट्रीय कोष से वेतन भी ब्रिटिश समाज के अनुसार दी जा रही है. इस 12 सदस्यीय टीम में कर्नल मेजर, नायक, हवलदार और सिपाही रैंक के जवान शामिल हैं. यह टीम सुरक्षा के अलावा पूर्व राष्ट्रपति को प्रतिदिन की सेवाएं भी प्रदान करती है. जबकि मेरी जानकारी के अनुसार, पाक फौज के मौजूदा नियमों के तहत किसी भूतपूर्व आर्मी चीफ को ऐसे प्रोटोकॉल की अनुमति नहीं है.
भूतपूर्व आर्मी चीफ मिर्ज़ा असलम बेग ने एक इंटरव्यू में फौज की परंपराओं के बारे में बातचीत करते हुए बताया था कि भूतपूर्व आर्मी चीफ को रिटायरमेंट के बाद एक बीटमैन, एक पर्सनल सेक्रेटरी, एक ड्राइवर और आर्मी टेलीफोन प्रदान करने के नियम होते हैं. फिर भी पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो ने अपने दूसरे शासनकाल में उस व़क्त के आर्मी चीफ जनरल जहांगीर करामत को निर्देश दिए थे कि मुझसे सुविधाएं वापस ले ली जाएं. बेनज़ीर के आदेश से लागू हुआ यह नियम आज भी मौजूद है. मेरे हिसाब से पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व जनरल के लिए पाकिस्तानी राजनीति में अब कोई अवसर नहीं है. जनरल अय्यूब ख़ान हों या अस्कंदर मिर्ज़ा या कोई और तानाशाह, इनकी देश वापसी असंभव होती है. यही कारण है कि परवेज़ मुशर्ऱफ ख़ुद भी अक्सर यह बात मीडिया से कहते रहते हैं कि विदेशों में उनकी व्यस्तता अधिक हो गई है, इसलिए वह पाकिस्तान आने-जाने के बजाय बाहर ही रहना चाहते हैं. वह कहते हैं कि उन्होंने जिस क़ानून के तहत इस्ती़फा दिया था, उसके अनुसार वह छह महीने बाद ही चुनाव लड़ने योग्य हो जाते हैं, मगर ऐसा उनका इरादा नहीं है. वह विदेशों में लोकतंत्र पर व्याख्यान देकर संतुष्ट हैं. प्रधानमंत्री युसू़फ रज़ा गिलानी ने भी गत दिनों परवेज़ मुशर्ऱफ को कुछ इसी तरह का संदेश दिया था. उन्होंने तुर्की के एक दैनिक अख़बार को साक्षात्कार देते हुए कहा था कि मुशर्ऱफ के ख़िला़फ उस व़क्त तक कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी, जब तक कि वह राजनीति से दूर रहते हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि परवेज़ मुशर्रफ़ की भलाई इसी में है कि वह सियासत में आने की सोचें भी नहीं. देश की जनता और संसद अब भी मुशर्रफ़ को नापसंद करती है. वह अब भूतकाल का हिस्सा बन चुके हैं. मुशर्ऱफ के सत्ता पर क़ब्ज़ा करने से पहले फौज लोमड़ी की तरह चालाकी से सरकार पर क़ब्ज़ा कर लेती थी. मुशर्ऱफ ने एक हाथी की तरह देश, सत्ता, राजनीति और लोकतंत्र को रौंद कर रख दिया. अंधों, नशे के आदी लोगों और मुस्लिम लीगियों के अलावा सब जान चुके हैं कि अगर पाकिस्तान को बचाना है तो फौज को सियासत से दूर, बहुत दूर रखना होगा. परवेज़ मुशर्ऱफ हों या कियानी या कोई भी जनरल हो, फौजियों से लोकतंत्र की तमन्ना रखना सूरज से पानी निकालने के बराबर है.

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