आदरणीय सोनिया गांधी जी,
यह पत्र मैं एक खास वजह से लिख रहा हूं या कहें तो मेरी निराशा और मेरी मजबूरी का एक परिणाम है ये. मैं यह देखकर व्यथित हूं कि किस तरह बहुमत के ज़ोर पर महिला आरक्षण बिल को जल्दबाज़ी में हमारे उपर थोपा जा रहा है. यह देश की तीस प्रतिशत जनसंख्या के अस्तित्व से जुड़ा सवाल है, आबादी के ऐसे तबके से जुड़ा है, जो हमेशा से शोषित और पीड़ित रही है और इस बिल के माध्यम से उसके और ज़्यादा शोषण की ज़मीन तैयार की करने की कोशिश हो रही है. इसे बहुमत के ज़ोर पर तानाशाही नहीं तो और भला क्या कहेंगे.
देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व का एक हिस्सा होने के नाते आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि लोकतंत्र का आधार हरेक इंसान की ज़रूरतों और उम्मीदों पर खरा उतरना है. लेकिन यहां तो तीस प्रतिशत आबादी के दौड़ में पीछे छूट जाने का खतरा है.
हालांकि, मैं पहले ही स्पष्ट करना चाहूंगा कि हम इस विधेयक के खिला़फ नहीं हैं. लेकिन हमारी सोच के मुताबिक़ यहां सवाल लिंग भेद से ज़्यादा वर्ग भेद का है. बिल के मौजूदा स्वरूप में आबादी के उसी वर्ग के महिला आरक्षण का लाभ लेकर संसद की सीटों पर क़ाबिज़ हो जाने का खतरा है, जिसके पुरूष सदस्य पहले से ही सत्ता प्रतिष्ठान के केंद्र में क़ाबिज़ है. ऐसी हालत में तो वर्गभेद की खाई और चौड़ी हो जाएगी.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद के पटल पर विधेयक को मिला समर्थन वास्तव में एक धोखा है और यह लोगों की वास्तविक इच्छाओं को प्रतिबिंबित नहीं करता. इसको समर्थन देने वाले राजनीतिक दल अपनी बाध्यताओं के चलते इसका समर्थन करने को मजबूर हैं. अगले लोकसभा चुनावों के बाद संभव है, राजनीतिक समीकरणों में बदलाव हो और तब हमें यह अहसास होगा कि हमने दलित और मुस्लिम महिलाओं के एक बड़े वर्ग के साथ कितना बड़ा अन्याय किया है.
मुस्लिम, दलित और समाज के अन्य कमजोर तबकों ने बार-बार आपके नेतृत्व और आपकी पारदर्शिता में अपना भरोसा जताया है, आपको अपना रहनुमा माना है. ऐसे में यदि अपनी भलाई से जुड़े सामाजिक, शैक्षिक और सत्ता में हिस्सेदारी जैसे मुद्‌दों पर वह यूपीए सरकार से पारदर्शी और ज़िम्मेदार व्यवहार की उम्मीद रखती है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है.
लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी यूपीए सरकार से आगे निकलने की लगातार कोशिश करती नज़र आई है, वह हमारे लिए चिंता का विषय है. भाजपा ने पहले तो महंगाई के मुद्‌दे पर पूरे विपक्ष को सरकार के खिला़फ खड़ा कर दिया और फिर महिला आरक्षण के सवाल पर लोकसभा में सरकार के समर्थन में खड़ी हो गई.
जैसा कि आप खुद भी जानती हैं, मुस्लिम और दलित महिलाओं का यह वर्ग विधेयक के प्रावधानों से संतुष्ट नहीं है. उनका अंदेशा है कि मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत समाज का वही वर्ग इसका ज़्यादा फायदा उठायेगा जो पहले से ही सत्ता के क़रीब है. लिंग के आधार पर समानता की वकालत पूरे समाज के हित में है, लेकिन वर्ग भेद को ब़ढावा देना किसी हालत में समाज के हित में नहीं है.
बिल के मौजूदा स्वरूप में शोषित और पीड़ित महिलाएं इसका कितना फायदा उठा पाएंगी, यह संदेह का विषय है. यही वजह है कि हम कोटा के भीतर कोटे की मांग कर रहे हैं ताकि पीड़ित और उपेक्षित महिलाओं का यह वर्ग भी महिला सशक्तिकरण आंदोलन में कदम से कदम मिलाकर चल सके.
दुख की बात तो यह है कि कांग्रेस पार्टी ने महंगाई के मुद्‌दे पर लोकसभा में भाजपा का साथ देने के लिए धर्मनिरपेक्ष दलों की आलोचना की, लेकिन महिला विधेयक पर उसी भाजपा का सहयोग लेने में उसे कोई झिझक नहीं हुई. ताज्जुब की बात तो यह है कि दोनों हालतों में फायदा भाजपा को ही हुआ.
अब जबकि महिला आरक्षण विधेयक को हर हाल में लोकसभा की मंजूरी दिलाने के लिए सरकार दुश्मनों से भी हाथ मिलाने को तैयार है, समाज के पिछड़े वर्गों के बीच फैले निराशा की सहज ही कल्पना की जा सकती है. साथ ही, यह कमजोर और उपेक्षित लोगों के साथ खड़े होने के यूपीए सरकार के दावों की भी असलियत सामने लाता है.
यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा और सिद्धांतों की दुहाई देते हुए हम आपसे विधेयक के प्रावधानों की दोबारा समीक्षा करने की मांग करते हैं ताकि महिला सशक्तिकरण की आड़ में वर्ग भेद को बझाने वाला एक और कानून हमारे गले न पड़ जाए. हम देश के राजनीतिक नेतृत्व से इस पर पुनर्विचार की उम्मीद रखते हैं, ताकि उन्हें बाद में अपने किए पर पछताना न पड़े.
आखिर में, मैं फिर से यह बताना चाहूंगा कि हम महिला आरक्षण विधेयक के खिला़फ नहीं हैं. हम आपसे केवल यह अपील करना चाहते हैं कि जल्दबाजी में कोई कदम न उठायें और समाज के सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें बदलावों पर विचार करें.

डॉ. मंज़ूर आलम

महासचिव, आल इंडिया मिल्ली काउंसिल

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