तारीख एक सितंबर 1983. इस दिन कोरियन एयरलाइंस के बोइंग 747 विमान ने न्यूयॉर्क से सियोल के लिए उड़ान भरी. इसने अमेरिका के जॉन एफ कैनेडी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 246 यात्रियों एवं 23 क्रू मेंबर्स के साथ उड़ान भरी थी. यात्रियों में अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य लॉरेंस मैक्डोनल्ड भी थे. उड़ान भरने के कुछ समय बाद यह विमान रास्ता भटक गया. पायलट को अपनी ग़लती का अंदाज़ा हो गया था. नतीजतन उसने विमान की गति कम कर दी. यह विमान ज्यों ही तयशुदा रास्ते से थोड़ी देर के लिए किसी दूसरे हवाई इलाक़े में दाख़िल हुआ, इसके क़रीब एक इंटरसेप्टर यानी हवा में ही विमान को मार गिराने वाला लड़ाकू विमान मंडराने लगा. अब दोनों विमान एक आइलैंड के ऊपर हवा से बातें कर रहे थे. लेकिन, उस आइलैंड का हवाई क्षेत्र बेहद संकरा था. इससे दोनों विमानों को का़फी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. एक तरह से कहा जाए तो इन दोनों के बीच शह और मात का खेल चल रहा था. बोइंग इंटरसेप्टर की पहुंच से बाहर होने ही वाला था, तभी इंटरसेप्टर को कंट्रोल रूम से एक संदेश मिला. बोइंग को नेस्तनाबूद करने का संदेश.
और, उसने ऐसा ही किया. लेकिन कहना जितना आसान था, करना उतना ही मुश्किल. इंटरसेप्टर का पायलट पहले ही 243 राउंड गोलियां इस कोशिश में बर्बाद कर चुका था. पायलट के मुताबिक़, यह उसकी ज़िंदगी का बेहद चुनौतीपूर्ण मिशन था. कई राउंड गोलियां चलाने के बाद भी वह बोइंग का बाल बांका नहीं कर पा रहा था. फिर पायलट ने एक तरक़ीब निकाली. वह अपने इंटरसेप्टर को बोइंग के ठीक ऊपर उड़ाने लगा. इस तरह कि संकरे हवाई इलाक़े से उसे बचने का कोई मौक़ा न मिल सके. यानी बोइंग का पायलट विमान को नीचे ले जाने के लिए मजबूर हो गया. इसका स़िर्फ एक ही अंजाम हो सकता था. उस संकरे हवाई क्षेत्र से विमान का लगभग 2000 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिर जाना. यही हुआ भी. विमान पूरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गया. लेकिन, कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई. बोइंग के नीचे गिरने के बाद इंटरसेप्टर ने उस पर एक के बाद एक मिसाइलें दागना शुरू कर दिया. पायलट के मुताबिक़, उसने विमान वैध तरीक़े से मार गिराया. यानी उसने विमान के परखच्चे उड़ा दिए. विमान में सवार सभी 246 यात्री मौत की नींद सो गए. यही नहीं, 23 क्रू मेंबर्स में भी कोई नहीं बच सका. यानी विमान के साथ-साथ कुल 269 लोगों का वजूद हमेशा के लिए इस दुनिया से मिट गया. यह पूरा हादसा बस एक ग़लती का नतीजा था. वह ग़लती थी कोरियाई विमान का रास्ता भटक जाना.

दुनिया की नजरों में भले ही वे 269 यात्री वेकसूर थे, लेकिन केजीवी ने उन्हें दुश्मन मान लिया था. कोरियाई विमान पर सीमा लाघने का आरोप लग गया और नतीजा यह हुआ की सारे लोग काल के गाल में समा गए. यह केजीवी के काले करतूतों की वेहद ही खोफनाक दास्ता थी.

हालांकि इस विमान हादसे को लेकर कई सस्पेंस पैदा किए गए. किसी के लिए यह बात बेहद अटपटी लग सकती है कि आख़िर रास्ता भटकने की क़ीमत 269 लोगों की जान नहीं हो सकती है. वह भी तब, जबकि उस विमान में अमेरिकी कांग्रेस का प्रभावशाली सदस्य सवार हो. यदि आप ऐसा सोचते हैं कि विमान के इस तरह नेस्तनाबूद होने के पीछे इतनी छोटी वजह नहीं हो सकती, तो आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं. यह कोई विमान हादसा नहीं था और न ही किसी ग़लती का नतीजा. इसकी हक़ीक़त तो कुछ और ही थी. हम आपको बताते हैं कि आख़िर उस विमान के साथ हुआ क्या था?
बात अस्सी और नब्बे के दशक की है. उन दिनों शीतयुद्ध अपने पूरे उफान पर था. दुनिया की दो बड़ी शक्तियां एक-दूसरे को पटखनी देने की हर कोशिश में लगी थीं. इसके लिए उन्होंने हर मुमकिन तरीक़े को अपनाया. इसी का नतीजा था कोरियन एयरलाइंस के विमान का हवा में हमेशा के लिए ख़त्म हो जाना. जैसा हमने आपको बताया कि यह हादसा एक सितंबर 1983 को हुआ. शुरुआत में सोवियत संघ इस बात से मुकरता रहा कि इस विमान को उसके अंजाम तक पहुंचाने में उसका कोई हाथ है, लेकिन बाद में उसने यह बात स्वीकार कर ली कि यह उसका ही कारनामा था. केजीबी के मुताबिक़, यह यात्रियों से भरा कोई विमान नहीं, बल्कि जासूसी मिशन पर निकला अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का विमान था. और, यह सोवियत संघ के हवाई इलाक़े में अहम जानकारियां जुटाने के मक़सद से मंडरा रहा था. सोवियत संघ के मुताबिक़, इस विमान के ज़रिए अमेरिका उसकी सैनिक ताक़तों की असलियत का अंदाज़ा लगाना चाहता था. लेकिन, इस मिशन से किसी ख़तरनाक मंसूबे की बू आ रही थी. दरअसल, शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका ने यूरोप में सोवियत संघ को निशाना बनाकर अपनी मिसाइल तैनात की थी. यह बात सोवियत संघ को नागवार लगी. नतीजतन, उसने अमेरिका पर अपनी धौंस जमाने के लिए इस मिशन को अंजाम दिया. सोवियत संघ के इस मिशन के लिए उसकी खुफिया एजेंसी केजीबी ने पूरे जाल को बिछाया.
मेजर गेन्नाडी ओसिपोविक. यही नाम था उस इंटरसेप्टर सु-15 के पायलट का, जिसने बोइंग 747 को नेस्तनाबूद किया था. इस पायलट ने 1991 में यानी इस वारदात के ठीक आठ साल बाद अपने इंटरव्यू में इस मिशन की पूरी दास्तां बताई. उसने बताया कि सोवियत अधिकारियों को यह बात पूरी तरह मालूम थी कि यह कोई जासूसी विमान नहीं, बल्कि नागरिक विमान है. इसके बावजूद उन्होंने इसे ख़त्म करने का आदेश दिया. मेजर ओसिपोविक ने बताया कि इंटरसेप्टर से उस विमान को गिराने से पहले मैंने अच्छी तरह देखा कि वह एक बोइंग 747 विमान था. मुझे यह भी पता था कि यह एक नागरिक विमान है, लेकिन मुझे इन सब बातों से कुछ भी लेना-देना नहीं था. उस विमान ने सोवियत हवाई इलाक़े में दाख़िल होते समय पूरी जानकारी मुहैया नहीं कराई थी. उसका ख़ामियाज़ा तो उसे भुगतना ही था. पायलट के मुताबिक़, मुझसे न किसी ने पूछा और न ही मैंने बताया कि यह एक नागरिक विमान है. यानी उस नागरिक विमान को जानबूझ कर मार गिराया गया.
यह सारा खेल केजीबी की रणनीतियों का नतीजा था. इस शातिर एजेंसी ने अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए सोवियत अधिकारियों को गुमराह किया, जिसकी क़ीमत 269 लोगों को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी. यह बेहद जुदा, लेकिन बेहद ख़ौ़फनाक तरीक़ा था केजीबी का. वह भी अपने नापाक मंसूबे को अंजाम देने का.

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