समाजवादी आंदोलन का इतिहास जुड़ने से ज़्यादा टूटने का रहा है. जिस डा. लोहिया को कांग्रेस के ख़िला़फ मोर्चा बनाने में जनसंघ से समझौता करने में परहेज नहीं हुआ, उसी जनसंघ के नए चेहरे भाजपा को लेकर समाजवादी खेमों में पिछले अनेक वर्षों से खींचतान मची हुई है. यह और बात है कि अनेक राजनीतिक दबावों के कारण शरद यादव और नीतीश कुमार ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को स्वीकार किया और अब बिहार या झारखंड या दूसरी जगहों पर भाजपा के साथ सरकार चलाना मंजूर किया है. डा. राम मनोहर लोहिया की जन्मशती पर आयोजित सभा में भी थोड़ी बहुत खींचतान दिखती रही. पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्य प्रकाश मालवीय ने तो सीधे सीधे प्रकाश करात, शरद यादव और ए. बी. वर्द्धन की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब देश में पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू हुआ तो इन नेताओं ने क्रीमी लेयर की नई थ्योरी गढ़ ली, लेकिन राज्यसभा में महिला आरक्षण के बिल के समय क्रीमी लेयर को भूल गए. उन्होंने डा. लोहिया को याद करते हुए कहा कि वे महिलाओं को बराबर का हक़ देने के पक्ष में रहते थे, पर यहां उनके अनुयायी दो खेमों में चले गए. उनका इशारा शरद यादव और नीतीश कुमार की ओर था.

भाकपा के ए.बी बर्धन ने कहा कि जिस तरह से ख़ुद साम्यवादी आंदोलन आज की तारीख़ में बिखरा हुआ है, कुछ वैसा ही हाल समाजवादी आंदोलन का भी है. उन्होंने कहा कि आज ज़रूरत क्रांति की है, अगर कोई क्रांति नहीं होती है तो स़िर्फ लोहिया को याद करने का क्या फायदा, केवल माला पहनाने से कुछ नहीं होता. बर्धन ने समाजवादियों और साम्यवादियों को एक साथ मिल कर भारत को समाजवाद की तऱफ ले चलने का आह्वान भी किया. आरएसपी नेता अबनी राय ने कहा कि लोहिया के नाम को आगे बढ़ाने के लिए लोहिया के काम को आगे बढ़ाना चाहिए. जस्टिस राजेंद्र सच्चर का यह कहना कि इस देश में समाजवाद और साम्यवाद को एक साथ चलना चाहिए था, दरअसल अतीत की ग़लतियों को याद कर सीख लेने जैसा ही लगता है.

कभी अगस्त क्रांति के नायकों में से एक रहे समाजवादी चिंतक डा. राम मनोहर लोहिया ने एक बार कहा था कि लोग मेरी बात समझेंगे ज़रूर, पर शायद मेरे मरने के बाद. इसीलिए एक साम्यवादी (कम्युनिस्ट) नेता, प्रकाश करात यह कहते हैं कि लोहिया के सप्त क्रांतियों में स्त्री-पुरुष समानता, आर्थिक असमानता, रंग-विभेद, जाति-विभेद, शस्त्र होड़ और निजी संपत्ति जुटाने जैसे मसलों के ख़िला़फआंदोलन की बात है और यदि इसके साथ सांप्रदायिकता के  ख़िला़फ भी लोहिया की आवाज़ को जोड़ दें तो यह समाजवादियों और साम्यवादियों का एक साझा आंदोलन बन सकता है. करात ने यह बयान विरोध की राजनीति का झंडा बुलंद करने वाले अनेक राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने दिया. मंच पर माकपा, भाकपा, भाजपा, कांग्रेस, जद (यू), जद (एस), सपा, आरएसपी और लोजपा के सभी महत्वपूर्ण नेता मौजूद थे. ऐसे मंच और ऐसे अवसर पर अगर करात ऐसी बातें कहते हैं तो निश्चित तौर पर इसके कुछ राजनीतिक निहितार्थ होंगे. ज़ाहिर है, यह बयान  भविष्य में एक राजनीतिक विकल्प की ओर भी इशारा करता है. हालांकि, भारतीय राजनीति ने अनेक मौक़ों पर ऐसे राजनीतिक विकल्पों को बनते-टूटते देखा है. जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने लोहिया जन्मशताब्दी समागम का उदघाटन करते हुए कहा कि गांधी के बाद लोहिया ही एक ऐसे नेता रहे, जिन्होंने जनता को सबसे अधिक प्रभावित किया. हालांकि ऐसा कहते हुए शरद यादव जेपी को भूल गए क्योंकि मंच तो लोहिया का था. उन्होंने यह भी कहा कि वे ख़ुद कभी लोहिया से मिले नहीं, लेकिन उनकी लिखी पुस्तकों को पढ़ कर ही लोहिया की विचारधारा पर चलने के लिए प्रभावित हो गए.
इस मौक़े पर भाकपा के ए.बी बर्धन ने कहा कि जिस तरह से ख़ुद साम्यवादी आंदोलन आज की तारीख़ में बिखरा हुआ है, कुछ वैसा ही हाल समाजवादी आंदोलन का भी है. उन्होंने कहा कि आज ज़रूरत क्रांति की है, अगर कोई क्रांति नहीं होती है तो स़िर्फ लोहिया को याद करने का क्या फायदा, केवल माला पहनाने से कुछ नहीं होता. बर्धन ने समाजवादियों और साम्यवादियों को एक साथ मिल कर भारत को समाजवाद की तऱफ ले चलने का आह्वान भी किया. आरएसपी नेता अबनी राय ने कहा कि लोहिया के नाम को आगे बढ़ाने के लिए लोहिया के काम को आगे बढ़ाना चाहिए. जस्टिस राजेंद्र सच्चर का यह कहना कि इस देश में समाजवाद और साम्यवाद को एक साथ चलना चाहिए था, दरअसल अतीत की ग़लतियों को याद कर सीख लेने जैसा ही लगता है. लेकिन समाजवादियों और साम्यवादियों एक साथ नहीं मिल पाने के लिए क्या स़िर्फ साम्यवादियों को ही ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए? या फिर उन नेताओं को भी, जिन्होंने राजनीति तो लोहिया के नाम पर की लेकिन लोहिया के विचारों पर चलने की ज़हमत कभी नहीं उठाई. और कुछेक ने कोशिश की भी तो किनारे लगा दिए गए. छोटे लोहिया के नाम से मशहूर समाजवादी नेता स्व. जनेश्वर मिश्र का समाजवादी पार्टी में सम्मान तो बहुत था, लेकिन सपा की राजनीति में उनका कितना चलता था, यह सबको मालूम है.
बहरहाल,  इतना तो सा़फ हो गया कि लोहिया के विचारों से सहमत न होने वालों या सहमत होकर भी उस पर न चलने वालों को भी आज लोहिया और उनकी विचारों की प्रासंगिकता समझ में आने लगी है. डा. लोहिया का वह नारा समाजवादियों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ इस बात की ताकीद करता है कि कोई राष्ट्र तभी आगे ब़ढ सकता है जब इसके लोगों को बराबरी का हक़ मिल जाए. आज जब 33 फीसदी महिला आरक्षण या 15 फीसदी अल्पसंख्यक आरक्षण के मुद्दे पर बहस छिड़ी हुई है, समर्थन और विरोध का तमाशा चल रहा है तो ऐसे मौक़े पर ख़ुद को लोहिया का चेला बताने वाले और सभी दलों के नेताओं को लोहिया के विचारों को एक बार फिर से प़ढ लेना चाहिए.

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