दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक की पूरी राजनीतिक ल़डाई ही जाति के आधार पर लड़ी जाती है. यहां की राजनीति मुख्यत: लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के बीच केंद्रित रही है. हालांकि, मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस व्यवस्था को तोड़ा और वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने जो राज्य के तीसरे राजनीतिक समुदाय कुरुबा से आते हैं, लेकिन अंतत: वे भी जातीय राजनीति में फंसते नज़र आ रहे हैं. चुनावी माहौल में चौथी दुनिया की यह कोशिश है कि अपने हिंदी पट्टी के पाठकों को गैर हिंदी भाषी राज्यों के राजनीतिक माहौल से अवगत कराए. इस कड़ी के चौथे अंक में आइए समझते हैं दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक का राजनीतिक परिदृश्य…

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देश की राजनीति पर जातिगत राजनीति सबसे बड़ा धब्बा है. चुनाव सुधार और सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों के अलावा आम राजनीतिक बहसों पर भी गौर करें तो जातिगत राजनीति को देश के लिए सबसे मुश्किल कड़ी बताया जाता है. विडंबना देखिए कि पिछले तकरीबन 60 वर्षों से अपने मुल्क की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही कमोबेश इसी आधार पर खड़ी है. उत्तर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में यह विचार आम है, लेकिन आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक की पूरी राजनीति ही जाति के आधार पर लड़ी जाती है. हालांकि, मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस व्यवस्था को तोड़ा और वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने. सिद्धारमैया राज्य के तीसरे राजनीतिक समुदाय कुरुबा से आते हैं. जातीय बंधनों से बंधी इस राजनीति को समझने के लिए पहले वहां की जातीय व्यवस्था को समझना आवश्यक है.

जाति के आधार पर कर्नाटक का सबसे प्रभावशाली वर्ग है लिंगायतों का. गौरतलब है कि जो लिंगायत आज जाति में तब्दील हो गई है, वह किसी ज़माने में एक पंथ था. लिंगायत आंदोलन कर्नाटक में जाति-व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन था. जाति-व्यवस्था को मिटाने के लिए दार्शनिक बसवन्ना ने 12वीं सदी में एक पंथ का निर्माण किया, जिसमें सभी जातियों के लोगों को शामिल किया गया. इस आंदोलन में शामिल होने की शर्त थी कि जो लोग भी इसमें शामिल होंगे, अपनी जाति को छोड़ देगे. इस तरह जो जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े हो रहे थे वे लिंगायत समुदाय में शामिल हो रहे थे, लेकिन भारतीय सामाजिक व्यवस्था जाति के बंधनों में इस तरह बंधी है कि कर्नाटक में जाति-व्यवस्था को तोड़ने के लिए चला एक आंदोलन ख़ुद एक जाति में तब्दील हो गया. चूंकि उस लिंगायत आंदोलन में कर्नाटक का एक बड़ा समाज शामिल हुआ था, इसलिए जब वह आंदोलन जाति में तब्दील हुआ तो लिंगायत ही कर्नाटक की सबसे बड़ी संख्या वाली जाति हो गई. इसे बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह देश के किसी एक राज्य या एक हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समूचे देश में चल रहा है. ऐसा भी नहीं है कि जाति केवल हिंदू समुदाय तक सीमित है, बल्कि भारत में  जितने भी धर्म, मजहब या संप्रदाय हैं, सभी में जाति-व्यवस्था व्याप्त है. हमारे देश में पिछले कई सौ सालों से लोग अपना मजहब बदल रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद उनकी जाति नहीं बदलती. भक्तिकाल के हमारे संतों ने जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ भी आंदोलन खड़ा किया था. जाति व्यवस्था भी भक्ति आंदोलन के भीतर खड़ी थी. भक्ति तो एक आंदोलन के तौर पर स्थापित हो गई, लेकिन जाति को मिटाने के मामले में यह विफल ही रहा.

उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की परिणति के तौर पर कई पंथ निकले, लेकिन उन पंथों ने जाति को समाप्त नहीं किया. सिख पंथ भी भक्ति आंदोलन की ही उपज है. गुरुनानक साहिब ने जब इस सिख पंथ की शुरुआत की थी, तो उसके पीछे जातिगत भेदभाव को दूर करना उनका एक बहुत बड़ा मक़सद था. उन्होंने जाति को कमज़ोर करने के लिए क्या कुछ नहीं किया, लेकिन आज ख़ुद सिख समुदाय में अनेक जातियां हैं. जैन धर्म को मानने वाले लोग भी जातियों में बंटे हुए हैं.

बहरहाल, यह पूर्वपीठिका बताना इसलिए आवश्यक था, क्योंकि कर्नाटक की राजनीति इसी जातीय व्यवस्था से तय होती है. यही वजह है कि कर्नाटक में कोई भी राष्ट्रीय पार्टी राष्ट्रीय न होकर क्षेत्रीय हो जाती है, क्योंकि उनको इन्हीं जातीय मुद्दों के बीच अपने राजनीतिक दांवपेच चलने होते हैं. देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का यहां पर क्षेत्रीयकरण हो चुका है. दोनों पार्टियां स्थानीय जातीय समीकरणों के जाल में अजीब तरह से उलझी हुईं हैं. इन पार्टियों के संगठनों में बहुसंख्यक समुदायों की पकड़ मजबूत बनाने की जंग तेज हो चली है. इस जंग में यह पार्टियां खेमों में बंटी हुई दिखने लगी हैं. वास्तव में यही कर्नाटक की राजनीति का असली ट्रेंड है. यहां दो बहुसंख्यक ब्राह्मण समुदाय लिंगायत और वोक्कालिगा का हमेशा सामना होता रहा है. राज्य की सा़ढे छह करोड़ की आबादी में से 17 प्रतिशत लिंगायत और 16 प्रतिशत वोक्कालिगा हैं. इनके बीच का राजनीतिक बंटवारा क्या है, पहले इसे समझते हैं. लिंगायत कर्नाटक का सबसे बड़ा जातीय समूह है. इनका प्रभाव मुख्यत: उत्तर कर्नाटक में ज्यादा है. लिंगायत शैव संप्रदाय को मानने वाले हैं. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा इसी समुदाय के हैं. 2008 में जब भाजपा पहली बार दक्षिण भारत के किसी राज्य यानी कर्नाटक में सत्ता में आई तो उन्होंने हिंदुत्व के आधार पर इस जातीय समुदाय में सेंध लगाई. हालांकि अब यहां मामला थोड़ा-सा उल्टा हो गया है, क्योंकि येदियुरप्पा ने बीजेपी छोड़कर कर्नाटक जनता पार्टी के नाम से नई पार्टी बना ली. हालांकि, राजनीतिक गलियारों में लगाए जा रहे कयास पर गौर करें तो येदियुरप्पा एक बार फिर भाजपा के दामन थामने वाले हैं.

लिंगायत के बाद कर्नाटक दूसरा बड़ा जातीय समूह है वोक्कालिगा. वोक्कालिगा दक्षिणी कर्नाटक का सबसे बड़ा समुदाय है और इनकी पहचान बड़े जमींदारों के तौर पर है. क्षेत्रीय पार्टी जनता दल सेक्युलर पर इनकी पकड़ मजबूत है. पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं. वोक्कालिगा समुदाय राजनीतिक रूप से कांग्रेस और जनता दल सेक्लुयर के बीच बंटा हुआ है. हालांकि, बीजेपी अपनी इस छवि को तोड़ते हुए कि वह केवल लिंगायत समुदाय पर निर्भर है, वोक्कालिगा समुदाय में भी सेंध लगा रही है. तीसरा जातीय समुदाय है कुरुबा. कर्नाटक में स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इन्हें चरवाहा माना जाता है. ये पूरे कर्नाटक में फैले हुए हैं. हालांकि, राजनीतिक तौर पर इन्हें बहुत ताकतवार तो कभी नहीं माना गया है, लेकिन चूंकि राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इसी समुदाय से हैं, इसलिए मौजूदा समय में इनकी ताकत बढ़ी है. सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री बनने के बाद एकबारगी यह दिखने लगा है कि शायद कर्नाटक जातिगत राजनीति के दौर से निकलकर नई अवधारणाएं गढ़ेगा. इस चुनावों में लिंगायत जाति के पचास विधायक जीतकर आए हैं, जिनमें से 29 कांग्रेस के हैं. बीजेपी में केवल दस विधायक लिंगायत समुदाय से हैं. बीएस येदियुरप्पा की पार्टी के केवल 6 विधायक चुने गए हैं. वोक्कालिगा जाति के 53 विधायक हैं, जिनमें से बीस कांग्रेस के पास हैं. अपने आपको वोक्कालिगा नेता बताने वाले देवगौ़डा की पार्टी में केवल 18 विधायक वोक्कालिगा हैं. अनुसूचित जाति के 35 विधायकों में से 17 कांग्रेस में हैं. अनुसूचित जनजाति के 19 विधायकों में से 11 कांग्रेस में हैं. ओबीसी विधायकों की संख्या 36 है, जिनमें से 27 कांग्रेस में हैं, 11 मुसलमान जीतकर आए हैं, जिनमें से 9 कांग्रेस में हैं. ईसाई, जैन और वैश्य समुदाय के सभी विधायक कांग्रेस के साथ हैं. इस तरह से किसी ख़ास जाति का नेता बनने की राजनीति करने वालों को कर्नाटक की जनता ने कोई महत्व नहीं दिया है. इसकी पहल करते हुए सिद्धारमैया ने जाति को प्राथमिकता देने की मुख्यमंत्रियों की रिवायत से साफ़ मना कर दिया है. उन्होंने अपनी जाति के किसी भी आदमी को अपने निजी स्टाफ में जगह नहीं देने की घोषणा कर दी है. अपने मंत्रियों को भी उन्होंने सलाह दी है की जाति के शिकंजे से बाहर आने की कोशिश करें, लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है. दूसरे पहलू पर गौर कीजिए तो राजनीतिक प्रबंधन के स्तर पर आकर सिद्धारमैया भी जातियों दायरे में ही फंस जाते हैं. उन्होंने अहिन्दा की राजनीति को अपनी जीत की धुरी बनाया है. अ यानी अल्पसंख्यक, हिन्दुलिगा यानी ओबीसी और दा यानी दलित. इन तीनों वर्गों के नेता के रूप में अगर उनको मान्यता मिल गई तो कर्नाटक में जीत के लिए लिंगायत या वोक्कालिगा होने की जो परंपरा है, वह ख़त्म हो जाएगी.

जाति के आधार पर कर्नाटक का सबसे प्रभावशाली वर्ग है लिंगायतों का, लेकिन गौरतलब यह है कि जो लिंगायत आज जाति में तब्दील हो गई है, वह किसी जमाने में एक पंथ था. लिंगायत कर्नाटक में जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ शुरू हुआ आंदोलन था. जाति-व्यवस्था को मिटाने के लिए दार्शनिक बसवन्ना ने 12वीं सदी में एक पंथ का निर्माण किया, जिसमें सभी जातियों के लोगों को शामिल किया गया.

बड़ा सवाल यह है कि इन सब के बीच में विकास और दूसरे सामाजिक मुद्दे कहां हैं? कर्नाटक की जितनी पहचान आईटी इंडस्ट्री को लेकर है, उससे कहीं ज्यादा राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर हो रही है. हालांकि, वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया राज्य के दो बार उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं. उस दौरान उन्होंने जो वित्तीय सुधार अपनाए, उनके लिए उनको काफी सराहना भी मिली. उन्होंने 2010 में बेल्लारी में खनन माफिया और भाजपा के पूर्व मंत्रियों रेड्डी बंधुओं की चुनौती के बावजूद कांग्रेस की ओर से सफल पदयात्रा आयोजित की. यही नहीं, आज तक उन पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा है, लेकिन कर्नाटक में राजनीतिक स्तर पर जो सबसे बड़ी मुश्किल है, वह है एक सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था. यह कमी राज्य लंबे अर्से से महसूस कर रहा है. इससे जुड़ी जो दूसरी बड़ी मुश्किल है, वह है खनन माफियाओं का सरकार पर हावी होना. इसके दोहरे संकट हैं. पहला तो खनन माफिया सरकार की चाबी के तौर पर होते हैं, इसलिए समूचे देश में खनन माफियाओं और उनके सिस्टम को राज्य सरकारों से ही ग्रीन सिग्नल मिला हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ आम जनता इनसे त्रस्त है. इसलिए ऐसे में किसी भी सरकार के लिए इस व्यवस्था से निपट पाना मुश्किल होता है.

राज्य में बिजली की भारी किल्लत है, जिसका असर खेती समेत अन्य उत्पादक कार्यों पर पड़ रहा है. राज्य में कृषि विकास दर बेहद कमजोर है. इसकी एक बड़ी वजह बिजली और पानी की किल्लत है. जहां पानी था, वहां लोग बिजली की कमी के चलते बोरवेल नहीं चला सके. हालांकि, भाजपा शासनकाल में राज्य में अनेक ताप बिजली घर स्थापित किए गए थे, जिनका परिचालन अभी आरंभ नहीं हुआ है. इसके पीछे भी एक राजनीतिक चुनौती है. अगर मौजूदा कांग्रेस सरकार इन बिजली घरों को शुरू कराती है तो विपक्षी दल इसका श्रेय लेने को तैयार बैठा है और अगर नहीं शुरू कराती तो विपक्षी दल इस बात की राजनीति करेंगे कि जिन विकास योजनाओं को राज्य को हमने सौंपा, सरकार उन्हें भी पूरा नहीं कर पा रही है.

बहरहाल, किसी दौर में रामकृष्ण हेगड़े जैसे नेताओं के साथ पंचायती राज का कर्नाटक मॉडल स्थापित करने वाला यह राज्य इस समय राजनीतिक अव्यस्था से जूझ रहा है, सही है, लेकिन देश की राजनीति में इस राज्य की महत्ता और इसकी चर्चा हमेशा ही लोकप्रिय रही है.

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