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जो बोलेगा, सो झेलेगा
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जो बोलेगा, सो झेलेगा

हिंदी के मशहूर लेखक एवं नाटककार मुद्राराक्षस बेहद गुस्से में थे. आक्रामक मुद्रा और तीखे स्वरों में लगभग चीखते हुए उन्होंने सवाल किया कि यह देश किसका है, किसके लिए है. हत्यारे, लुटेरे, बलात्कारी, दलाल, तस्कर खुलेआम घूम रहे हैं. मुसलमानों का क़त्लेआम कराने वाला आदमी गुजरात का मुख्यमंत्री है. बाल ठाकरे मुसलमानों की हत्या किए जाने की लगातार अपील करता है और केंद्रीय मंत्री बेशर्म होकर उसके दरवाज़े मत्था टेकने पहुंच जाता है. लेकिन जो इस देश और देश की जनता को बचाने के लिए जुटते हैं, उन्हें देशद्रोही की कतार में खड़ा कर दिया जाता है.

मुद्राराक्षस दुबले-पतले और छोटे क़द के हैं, लेकिन साहित्य और संस्कृति की दुनिया में उतने ही वज़नदार और कद्दावर हैं. विवादास्पद हो जाने की हदों की कतई परवाह नहीं करते और अपनी राय बेबाकी से रखते हैं. उम्र के सातवें दशक में ज़रूर हैं, लेकिन पस्ती से कोसों दूर नज़र आते हैं और फिलहाल अपने ताज़ा नाटक की तैयारी में व्यस्त हैं. तो भी पिछली 13 फरवरी को वह लखनऊ के शहीद स्मारक पर तीन घंटे डटे रहे. बोले कि जो उथल-पुथल नेपाल में हुई, उसे इस देश में भी होना चाहिए. वरना इस देश का कबाड़ा निकल जाएगा. सरकारें अपनी ही जनता के ख़िला़फ खड़ी हो गई हैं. हालात आपातकाल से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो गए हैं. ऐसे में कलमकारों और कलाकारों की बड़ी भूमिका बनती है.

महान फ्रांसीसी लेखक-दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र के शब्दों को दोहराते हुए मुद्राराक्षस ने चुनौती भरे अंदाज़ में  ऐलान किया कि यूं तो हमारे शब्द बुलेट ही हैं, लेकिन हम बुलेट का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. हमें इसलिए लिखना है, ताकि जो लड़ रहे हैं, उनका भरोसा न टूटे.

महान फ्रांसीसी लेखक-दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र के शब्दों को दोहराते हुए मुद्राराक्षस ने चुनौती भरे अंदाज़ में ऐलान किया कि यूं तो हमारे शब्द बुलेट ही हैं, लेकिन हम बुलेट का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. हमें इसलिए लिखना है, ताकि जो लड़ रहे हैं, उनका भरोसा न टूटे. बदलाव का इतिहास रचने के लिए लड़ाई में उतरना ज़रूरी है. जो भी इस लड़ाई में है, हम उसके साथ हैं. इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि उनके हाथों में नारे की तख्ती है या बंदूक़. यह ऐतिहासिक पाप होगा, अगर हम चुप रहे. मुद्राराक्षस ने अपने वक्तव्य का समापन बरसों बाद सुने गए इस नारे के साथ किया-आमार नाम, तोमार नाम, वियतनाम. आमार बाड़ी नक्सलबाड़ी-नक्सलबाड़ी.

यह दृश्य था सीमा आज़ाद की गिरफ़्तारी के ख़िला़फ मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की उत्तर प्रदेश इकाई द्वारा आयोजित धरने का. यह आयोजन ख़ुद में एक वक्तव्य था कि राज्य के दमन के ख़िला़फ राजधानी के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं सामाजिक कार्यकर्ता एकजुट हैं और लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं. आयोजन में चर्चित सीमा आज़ाद इलाहाबाद की हैं और पीयूसीएल की सक्रिय कार्यकर्ता रही हैं. ज़्यादातर अख़बारों को जनता के हित-अधिकारों से जुड़े सवालों पर ग़ौर करने की फुर्सत नहीं मिलती. ऐसे में सीमा आज़ाद ने लेखन को अपना हथियार बनाया. सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक हलचलों की चीरफाड़ करने के लिए दस्तक नाम से लघु पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और जिसके ज़रिए वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के ख़िला़फ मोर्चा खोला. हिंदुस्तान का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर की औद्योगिक दुर्दशा और उसके लिए ज़िम्मेदार सरकारी नीतियों को लेकर पुस्तिका तैयार की. राज्य सरकार की गंगा एक्सप्रेस वे नामक उस महत्वाकांक्षी परियोजना के ख़िला़फ भी पुस्तिका लिखी, जिसके पूरा होने की क़ीमत हज़ारों-हज़ार लोगों को विस्थापन से चुकानी होगी. और, अभी हाल में उन्होंने ऑपरेशन ग्रीन हंट को लेकर आए चुनिंदा लेखों का संकलन-संपादन करने का संगीन गुनाह कर डाला था.

वह पुस्तक मेले में भाग लेने के लिए नई दिल्ली गई थीं और छह फरवरी को इलाहाबाद लौट रही थीं कि बीच रास्ते में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. उनके पति विश्वविजय भी धर दबोचे गए. पुलिस ने छात्रों के बीच काम कर रहे विश्वविजय को सीपीआई माओवादियों का राज्य सरगना और सीमा आज़ाद को इस प्रतिबंधित संगठन की सक्रिय कार्यकर्ता के तौर पर पेश कर दिया. कहा गया कि दोनों प्रदेश में माओवाद की ज़मीन तैयार करने में जुटे थे. इसके ठीक दूसरे दिन कानपुर की ग़रीब बस्तियों में लोगों को जगाने और एकजुट करने में लगे आठ युवकों को भी पुलिस ने माओवादी का ठप्पा लगाकर गिरफ़्तार कर लिया. इनमें से एक वंशीधर सिंह चिंतक जेएनयू से डॉक्ट्रेट की उपाधि हासिल कर चुके हैं और अपने उपनाम को सार्थक करते हुए तमाम सवालों और मुद्दों पर बहस छेड़ने का काम करते रहे हैं.

बहरहाल, सीमा आज़ाद की गिरफ़्तारी माओवादियों को उखाड़ फेंकने के नाम पर प्रदेश में की गई पहली कार्रवाई है. मतलब कि अब उत्तर प्रदेश की सरकार भी लोकतांत्रिक और मानव अधिकारों की आवाज़ों को रौंदने के लिए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सरकार द्वारा आज़माए जा रहे नुस्ख़े पर अमल करने का मन बना चुकी है. उसे चिंता नहीं कि राज्य में अपराधियों का सिक्का चलने लगा है. चिंता हो भी तो कैसे, ख़ुद सत्तारूढ़ पार्टी अपराधियों की पनाहगाह में तब्दील हो गई है. जो बसपा में आए, दूध का धुला हो जाए. याद नहीं कि पिछले लोकसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी को ग़रीबों का मसीहा करार देते हुए मुख्यमंत्री जी की जीभ तनिक नहीं लड़खड़ाई थी. हालांकि कौन नहीं जानता कि उसकी पहचान मा़फिया की है.

संयोग से मुख्यमंत्री मायावती महिला भी हैं और दलित भी. सर्वजन हिताय दूर की कौड़ी है, यहां तो बहुजन हिताय की ही ख़ैर नहीं. क्या संयोग है कि उनके राज में दलितों और ख़ासकर दलित महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ देने का कीर्तिमान स्थापित किया है. संयोग यह भी है कि मुख्यमंत्री को ख़ुद को दलित की बेटी कहने-कहलाने में गर्व महसूस होता है. और, यह भी संयोग है कि भले ही राज्य के तमाम गांव आज भी ढिबरी-लालटेन के युग में जी रहे हों और मिट्टी के तेल की किल्लत इसमें भी बाधक हो, लेकिन उनके जन्मदिन पर राजधानी नीली रोशनी में नहा उठती है और वैभव का साम्राज्य खिल उठता है. गोया राजशाही वापस लौटआई हो.

नाक में दम कर रहे सवालों से आजिज आकर कोई दो माह पहले केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने ऑपरेशन ग्रीन हंट के नामकरण को मीडिया की कल्पना का कमाल बताकर असली सवालों से पीछा छुड़ाने की फिज़ूल कोशिश की थी. नाम जो भी दिया जाए या उसे बेनाम रखा जाए, आख़िर तो ताक़त की सरकारी नुमाइश घोषित तौर पर माओवादियों का सफाया अभियान है. और, जैसा कि माओवादी नेता भी कह चुके हैं कि अघोषित तौर पर यह दरअसल कॉरपोरेट जगत की राह में रोड़ा बन रहे आदिवासियों को उनकी ज़मीन से खदेड़ देने का अभियान है. भले ही प्रधानमंत्री न जाने कितनी बार माओवादियों को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता चुके हों, लेकिन उन्हें यह भी मानना पड़ा कि आदिवासियों के साथ अब तक किए गए सौतेले बर्ताव ने माओवाद को हवा देने में सबसे बड़ी भूमिका अदा की है. चिदंबरम साहब भी थोड़ा पलटे कि अगर माओवादी युद्ध विराम करें, तो वह 72 घंटे के भीतर कंपनियों के साथ अब तक किए गए करारों को स्थगित करने और उस पर दोबारा विचार करने के लिए तैयार हैं. यह सरकारी क़बूलनामा है कि माओवाद विरोधी अभियान या माओवादी उभार आख़िर क्यों हो रहा है. योजना आयोग द्वारा गठित विशेष कार्यदल की रिपोर्ट भी तो इसी सच का बयान है.

ऑपरेशन ग्रीन हंट माओवाद प्रभावित पांच राज्यों पर केंद्रित है, लेकिन उसकी सबसे ज़्यादा तपिश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले में महसूस की गई. ऑपरेशन ग्रीन हंट की आहट से बहुत पहले साढ़े छह सौ से अधिक गांव वीरान कर दिए गए. आदिवासियों को सबक सिखाने के लिए उन पर हत्या, बलात्कार, लूट, आगजनी जैसे घिनौने और वहशी तरीक़े आज़माए गए. लोकतांत्रिक और मानव अधिकारों के पक्ष में उठी-जुटी आवाज़ों को ख़ौ़फ और दहशत की चाबुक से हड़काया और खदेड़ा गया. ज़िले को सत्ता की निरंकुश ताक़त की आज़माइश की प्रयोगशाला में बदल दिया गया. इसके लिए देश की सबसे बड़ी अदालत तक के आदेशों की ऐसी-तैसी कर दी गई.

तमिलनाडु के सलेम ज़िले के पीयूष सेठिया पर्यावरणीय कार्यकर्ता और खेती के परंपरागत तरीक़ों के पैरोकार के तौर पर जाने जाते हैं. दंतेवाड़ा की ख़बरों ने उन्हें विचलित कर दिया. दु:ख और क्षोभ ने उन्हें सलेम से पी चिदंबरम के निर्वाचन क्षेत्र सिवागांगई तक की साइकिल यात्रा का कार्यक्रम करने को मजबूर कर दिया. यात्रा की शुरुआत गुजरी 26 जनवरी से होनी थी. इस तारीख़ का ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व है. इस बहाने इरादा यह सवाल उठाने का था कि आज़ाद भारत में गणतंत्र आख़िर किस हालत और हैसियत में है और कि इस उल्टे हालात में इस राष्ट्रीय पर्व का मनाया जाना कितना जायज़ है.

लेकिन अभी यात्रा बस शुरू होने वाली थी कि उन्हें अपने सहयात्री के साथ घेर लिया गया. उनकी एक नहीं सुनी गई. यात्रा के लिए तैयार किया गया परचा आपत्तिजनक माना गया और उन्हें देशद्रोह के इल्ज़ाम में गिरफ़्तार कर लिया गया. परचे में कहा गया था कि गणतंत्र इसलिए है, ताकि सरकार लोकतंत्र की इज़्ज़त और हिफाज़त के लिए अपनी कटिबद्धता दोहरा सके. लेकिन दंतेवाड़ा के आदिवासियों के लिए इसकी कोई गारंटी नहीं. जनता के संविधान प्रदत्त अधिकार कहां हैं? क्या भारत सरकार का मक़सद केवल टाटा, इस्सर और वेदांता जैसी कंपनियों को आदिवासियों की ज़मीन सौंपना भर है? ऐसे समय में जब किसान आत्महत्या के ज़रिए अपनी समस्याएं उठा रहे हैं, उनसे उनकी ज़मीन छीनकर उसे धनवानों के हवाले किया जा रहा है. क्या विकास का यही चेहरा है? इसके ख़िला़फ हम आवाज़ उठाते रहेंगे. परचे में भारत सरकार से तत्काल युद्ध रोकने की भी मांग की गई थी.

एक तऱफ पी चिदंबरम माओवादियों को बातचीत के लिए न्यौता दे रहे हैं और दूसरी तऱफ माओवादियों के ख़िला़फ युद्ध का बिगुल भी तेज़ करते जा रहे हैं. यह तो दोमुंहापन है. बातचीत का राग अलापो और साथ ही जो सवाल उठाने की ज़ुर्रत करे, उसे माओवादी बताकर मार गिराओ या फर्ज़ी मुक़दमों में फंसाओ या फिर जेल की हवा खिलाओ. ख़ैर, शुक्र है कि पीयूष सेठिया गुजरी 15 फरवरी को जमानत पर रिहा कर दिए गए.

लेकिन उत्तराखंड के प्रशांत राही ख़ुशकिस्मत नहीं रहे. वह दिसंबर 2007 से जेल में हैं. कभी वह अंग्रेजी दैनिक द स्टेट्‌समैन के राज्य प्रतिनिधि थे. वह बदलाव के पक्षधर थे और उन समुदायों को मज़बूत और उद्वेलित करना चाहते थे, जो दु:ख-मुसीबतों के मारे हैं और जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं. इस तड़प ने उन्हें पेशेवर पत्रकारिता के पेशे से मुक्ति दिलाने और ग़रीब-गुरबों से सीधे जुड़ने की राह दिखाई. वह उत्तराखंड को अलग राज्य बनाए जाने के संघर्ष से जुड़े और टिहरी बांध के ख़िला़फ भी खड़े हुए. इसके अलावा जहां भी जुल्म के ख़िला़फ आवाज़ उठी, वह उसके साथ नज़र आए. उनकी बुलेटिननुमा पत्रिका समाजवादी समालोचना अलग से सरकारी महकमों की आंख की किरकिरी बनी हुई थी.

50 साल की उम्र पार कर रहे प्रशांत राही को ऊधम सिंह नगर से पुलिस ने 17 दिसंबर 2007 को अपनी हिरासत में लिया था. उनकी इकलौती बेटी शिखा राही हिंदी फिल्म उद्योग से जुड़ी हैं और तारे जमीं पर जैसी फिल्मों की सहायक निर्देशक रही हैं. वह बताती हैं कि पकड़े जाने के अगले दिन उनके पिता को हरिद्वार ले जाया गया. उन्हें बेतरह पीटा गया. धमकी दी गई कि उनकी गुदा में मिट्टी कातेल भी पंप किया जा सकता है और यहां तक कि उन्हें बेटी के साथ बलात्कार करने के लिए भी मजबूर किया जा सकता है.

पुलिस का इरादा प्रशांत राही को जंगल में मार गिरा देने का था. मौक़े की तलाश थी कि यह साजिश सतह पर आ गई और आख़िरकार पांच दिन बाद जंगल से उनकी गिरफ़्तारी दिखा दी गई. कहानी गढ़ी गई कि वह माओवादियों को हथियारों का प्रशिक्षण देने का काम कर रहे थे, तभी पुलिस ने धावा बोला और उन्हें धर दबोचा. प्रशांत राही को इसलिए दबोचा गया कि वह ज़मीन, शराब और बिल्डर मा़फिया की राह का बड़ा अड़ंगा बन गए थे. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस त्रिगुट को पुलिस का पूरा साथ और समर्थन हासिल था. प्रसंगवश, तक़रीबन दो दशक पहले पिथौरागढ़ के जुझारू पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या इसलिए की गई थी कि वह लगातार शराब और लीसा के तस्करों के साथ पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत की पोल खोल रहे थे.

माओवादियों को उखाड़ फेंकने की आड़ में इंसा़फ और जम्हूरियत के पैरोकारों पर निशाना साधे जाने के किस्सों की सूची बहुत लंबी है. उन पर चर्चा किसी और अंक में.

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