आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश में सभी दल ज़मीनी कार्यकर्ताओं के संगठनों-प्रकोष्ठों को मज़बूत करने में लगे हैं. पुराने संगठनों को भंग करके उनका पुनर्गठन किया जा रहा है. नई नियुक्तियां की जा रही हैं. दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा ने अपने स्थानीय प्रकोष्ठों के दम पर ही बेहतर प्रदर्शन किया था. सपा को सत्ता मिली तो बसपा कांग्रेस और भाजपा जैसी दुर्गति से बच गई. अब यह बात इन दोनों दलों को भी समझ में आ गई है. भाजपा प्रभारी अमित शाह और कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री रोजाना अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करते हैं और हर दिन के क्रियाकलापों का ब्यौरा लेते हैं.
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सभी राजनीतिक दलों को यह बात बखूबी मालूम है कि दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने के लिए उत्तर प्रदेश किला फतह करना जरूरी है. प्रदेश की अनगिनत जातियों और समुदायों में पैठ के बिना यह संभव नहीं है, यह अंदाजा भी सभी दलों को है. इसके लिए ज़मीनी कार्यकर्ताओं की मज़बूती और उनकी संगठनात्मक क्षमता ही वह चीज है, जो उत्तर प्रदेश में पार्टियों की चुनावी सफलता तय करेगी. यह बात भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह और कांग्रेस प्रभारी मधुसूदन मित्री समेत सभी नेताओं को मालूम है और इसके लिए वे सक्रिय भी हो चुके हैं. पार्टियों के जो संगठन अभी तक मृतप्राय प़डे थे, उन्हें भंग कर उनका पुनगर्ठन किया जा रहा है तो नये संगठन भी बनाए जा रहे हैं. इसी के चलते अमित शाह और मधूसूदन मिस्त्री अपने-अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं से रोजाना संवाद करते हैं और प्रतिदिन का ब्यौरा लेते हैं. अन्य दल भी इसके लिए जोर लगा रहे हैं कि बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज तैयार कर सकें. भाजपा और सपा इसमें बाजी मारती दिख रही हैं.
उप्र के विधानसभा चुनाव 2012 में कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी ने काफी मेहनत की थी. वे काफी भीड़ जुटा रहे थे और आक्रामक तरीके से तत्कालीन बसपा सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाए हुए थे. पूरे प्रदेश में माहौल कांगे्रस समय लगने लगा था. भाजपा नेताओं ने भी चुनाव प्रचार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. सपा के युवा नेता अखिलेश यादव शांत भाव से क्रांति रथ पर सवार पूरे प्रदेश को नाप रहे थे. बसपा नेता मायावती तो जमीनी लड़ाई में माहिर मानी जाती हैं. उनका मजबूत वोट बैंक है. चारों बड़े दल अपने-अपने हिसाब से व्यूह रचना कर रहे थे, लेकिन सपा और बसपा इस मायने में भाजपा-कांग्रेस से अलग थीं. बसपा भाईचारा कमेटियों और सपा अपने कैडरों के भरोसे दांव चल रही थी. सपा के एक दर्जन से अधिक प्रकोष्ठ कंधे से कंधा मिलाकर मुलायम और अखिलेश के साथ ख़डे थे. बसपा भाईचारा कमेटियां बनाकर विभिन्न जातियों में बंटे वोटरों को लुभाने के लिए जोर लगा रही थी.
राजनीतिक दलों के लिए उसके फ्रंटल संगठन आक्सीजन का काम करते हैं. इसी बात को ध्यान में रखकर सपा और बसपा ने विधानसभा चुनाव-2012 की रणनीति बनाई थी, लेकिन यह बात उस समय कांगे्रस और भाजपा नहीं समझ पाए. उन्होंने स्थानीय प्रकोष्ठों को मजबूती से खड़ा करने पर ध्यान नहीं दिया. उनके कई प्रकोष्ठ खाली पड़े रहे. जिस किसी प्रकोष्ठ में नियुक्ति हुई भी, तो वहां गुटबाजी का खेल चलता रहा. कांगे्रस-भाजपा के नेताओं ने अपने करीबी नेताओं को विभिन्न प्रकोष्ठों पर काबिज करा दिया था, जो बिल्कुल बेकार साबित हुए. कांगे्रस और भाजपा का वोटर बूथ तक गया ही नहीं. सपा को जीत हासिल हुई. बसपा को सत्ता विरोधी लहर के कारण हार का मुंह जरूर देखना पड़ा, लेकिन उसकी भाजपा और कांगे्रस जैसी दुगर्ति  नहीं हुई. इस बात का एहसास बाद में राहुल गांधी को हो गया और उसके बाद वे लगातार पार्टी का संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने की ही बात करते दिखे.
पुरानी गलती से सबक लेते हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में कांगे्रस और भाजपा भी सपा-बसपा की तरह अपने फ्रंटल संगठनों को मजबूत करने में जुटे हैं. भाजपा के उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी अमित शाह इस ओर काफी ध्यान दे रहे हैं. भाजपा ने अपने सभी 14 प्रकोष्ठों में अध्यक्षों व संयोजकों की नियुक्ति कर दी है. विभिन्न जातियों के जनाधार वाले नेताओं को भाजपा के विभिन्न मोर्चों और प्रकोष्ठों की जिम्मेदारी सौंपी गई है. प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा की कमान वाराणसी के आशुतोष राय को, महिला मोर्चा की कमान कानपुर की कमलावती को, अल्पसंख्यक मोर्चे की कमान लखनऊ की रूमानी सिद्दीकी को, किसान मोर्चा की कमान मेरठ के विजय पाल तोमर को, अनुसूचित जनजाति मोर्चे की कमान बस्ती के राजेंद्र गौड़ को, अनुसूचित जाति मोर्चे की कमान इलाहाबाद के गौतम चौधरी को सौंप कर पार्टी के भीतर सामंजस्य बैठाने की कोशिश की गई है. भाजपा और उसके यूपी चुनाव प्रभारी अमित शाह को इन संगठनों से काफी उम्मीदें हैं. भाजपा ने कम से कम अपने प्रकोष्ठों में नियुक्तियां तो कर दी, लेकिन कांगे्रस तो यह भी नहीं कर पाई. प्रदेश कांगे्रस के चुनाव प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री इस मामले में अमित शाह से काफी पीछे चल रहे हैं. कांगे्रस में आधा दर्जन से अधिक प्रकोष्ठों के अध्यक्ष पद खाली प़डे हैं.
फ्रंटल संगठनों की मदद से 2012 फतह करने वाली सपा ने चुनाव जीतने के बाद भले उनको भंग कर दिया था, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव की आहट ने उसके कदम तेज कर दिए है. प्रधानमंत्री पद की दावेदरी ठोक रहे मुलायम सिंह यादव की उम्मीदों को पंख लगाने के लिए सपा ने विभिन्न प्रकोष्ठों को भरना शुरू कर दिया है. छांट-छांट कर जुझारू नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है. हाल में ही सपा ने अपने 14 में से 9 के अध्यक्षों की नियुक्ति करके चुनावी सरगर्मी बढ़ा दी है. सपा ने छात्र सभा की जिम्मेदारी मेरठ के अतुल प्रधान, मुलायम सिंह यूथ बिगे्रड की जिम्मेदारी देवरिया के ब्रजेश यादव, महिला सभा की जिम्मेदारी अंबेडकर नगर की सपा नेत्री लीलावती कुशवाहा, व्यापार सभा की मेरठ के गोपाल अग्रवाल, अल्पसंख्यक सभा की पीलीभीत के रियाज अहमद, अधिवक्ता सभा की इलाहाबाद के विधुभूषण सिंह, समाजवादी पिछड़ा वर्ग की फतेहपुर के नरेश चंद्र उत्तम, सैनिक प्रकोष्ठ की इटावा के कर्नल सत्यवीर सिंह यादव, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ की जिम्मेदारी गाजीपुर के काशीनाथ यादव के कंधों पर डाली है. अभी लोहिया वाहिनी, युवजन सभा, शिक्षक सभा, अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ और समाजवादी मजदूर सभा इकाइयां भंग पड़ी हैं. बसपा की स्थिति जरूर अलग है. हाई कोर्ट द्वारा जातीय सम्मेलनों पर रोक लगाए जाने के बात उसकी जातीय रैलियों पर विराम लग गया है. भाईचारा कमेटियां बसपा सुप्रीमो पहले ही भंग कर चुकी थी. इस मामले में कोई बसपा नेता अभी कुछ कहने को तैयार नहीं है. इससे इतर भी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल अपने-अपने नुस्खे आजमा रहे हैं. नेता चुनावी मैदान मारने के लिए जनता को लुभाने, फूट डालने, सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने, जातिवाद का जहर खोलने, प्रलोभन देने, साड़ी-कंबल बांटने, जैसे तमाम हथकंडे अपना रहे हैं. विकास का मुद्दा हाशिये पर चला गया है. दलों में शॉर्टकट अपनाकर जीत हासिल करने का उतावलापन साफ झलक रहा है.

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