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जल, जंगल और जमीन बचाने की मुहिम
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जल, जंगल और जमीन बचाने की मुहिम

राज्य के 250 स्वयंसेवी संगठनों ने एक नई जल नीति बनाकर निशंक सरकार को उसका मसौदा सौंप दिया है. संगठनों का कहना है कि अगर सरकार पहाड़ के पानी को बचाना चाहती है तो उसे जल, जंगल एवं ज़मीन के संदर्भ में जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप नीति बनानी और लागू करनी होगी. मालूम हो कि राज्य गठन के साथ ही जल नीति घोषित करने की मांग उठने लगी थी. यह उम्मीद की गई थी कि वर्ष 2002 तक सरकार अन्य कार्यों के साथ ही जल नीति भी तैयार कर लेगी, लेकिन आज दस वर्ष बीत जाने के बावजूद सरकार जल नीति बनाने और उसे मंजूरी देने से लगातार कतरा रही है. राज्य की अपनी जल नीति न होने के कारण सरकार हाइड्रो प्रोजेक्ट के बहाने नदियों का मनमाने तरीक़े से दोहन कर रही है. केंद्र सरकार ने 2002 में ही राष्ट्रीय जल नीति लागू कर देश के विभिन्न राज्यों से अगले दो वर्ष के अंदर अपनी जल नीति तैयार करने के लिए कहा था, जिस पर उत्तराखंड ने आज तक अमल नहीं किया. निशंक सरकार पर हाइड्रो पावर के वितरण में गंभीर अनियमितता बरतने एवं भ्रष्टाचार का आरोप पहले से ही लगा हुआ है.

राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि यह सरकार आए दिन अनाड़ियों को पावर प्रोजेक्ट लगाने का काम सौंप रही है, जिससे राज्य में छोटी-बड़ी नदियां बंधक बनती जा रही हैं. जोशीमठ के आगे विष्णु प्रयाग में जेपी समूह द्वारा पावर प्रोजेक्ट लगाने से पूरे इलाक़े में पहाड़ धंसने और पानी का संकट पैदा हो रहा है.

राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि यह सरकार आए दिन अनाड़ियों को पावर प्रोजेक्ट लगाने का काम सौंप रही है, जिससे राज्य में छोटी-बड़ी नदियां बंधक बनती जा रही हैं. जोशीमठ के आगे विष्णु प्रयाग में जेपी समूह द्वारा पावर प्रोजेक्ट लगाने से पूरे इलाक़े में पहाड़ धंसने और पानी का संकट पैदा हो रहा है. यही स्थिति कमोबेश पूरे पहाड़ में है. इसलिए जनता अब एक स्वर में मांग कर रही है कि उसे हाइड्रो पावर नहीं, जल नीति चाहिए. यह बात सरकार भी समझती है कि हिमालयी राज्यों की आजीविका जल, जंगल और ज़मीन पर ही निर्भर हैं. पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इस दिशा में तत्परता से काम करे तो जलवायु परिवर्तन एवं जल संकट जैसी चुनौतियों से निपटा जा सकता है, लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार पूरे विवेक और ईमानदारी के साथ राज्य में जल नीति तैयार करे.

सूबे के पर्यावरण विशेषज्ञ सरकार द्वारा बांध बनाने एवं पावर प्रोजेक्ट के बहाने नदियों के जल की सौदेबाज़ी से ख़़फा हैं. उनका मानना है कि इन हिमालयी नदियों के रास्ते बदल कर इन्हें सुरंगों से गुज़ारना इनके प्रति जनास्था एवं महत्व के साथ खिलवाड़ करने जैसा है. जानकारों का मानना है कि सरकार गंगा जैसी नदी को केवल अपनी आमदनी के साधन के रूप में देख रही है. उसे बचाने एवं पावन बनाए रखने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है. पर्यावरणविदों का मानना है कि करोड़ों लोगों की आस्था की प्रतीक गंगा के नाम पर सूबे की सरकार केवल राजनीति कर रही है. बीते जमाने की अभिनेत्री हेमामालिनी को गंगा का ब्रांड एंबेसडर बनाना उसकी अज्ञानता का प्रमाण है. गंगा को तो स्वयं विश्व भर के लोग नमन करते हैं. पर्यावरण विशेषज्ञों गंगा से प्रार्थना की है कि वह निशंक सरकार को सद्बुद्धि दें.स्वयंसेवी संगठनों की मुहिम का मकसद नदियों के साथ-साथ उनके मूलस्रोत हिमालय को भी बचाना है, ताकि राजनेता अपनी जागीर समझ कर इसकी सौदेबाज़ी न कर सकें.

केंद्रीय मंत्री हरीश रावत ने निशंक सरकार के स्पर्श गंगा कार्यक्रम को राज्य की जनता के साथ धोखा बताते हुए कहा कि यह देश की पहली सरकार है, जो गंगा के साथ खिलवाड़ कर रही है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने जनता की गाढ़ी कमाई के 18 लाख रुपये नाच-गाने में ख़र्च कर दिए. कांग्रेस इसे मुद्दा बनाने के मूड में है. पार्टी का कहना है कि गंगा के नाम पर राज्य सरकार की किसी भी ग़लत नीति को अब जनता बर्दाश्त नहीं करेगी. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद ने कहा कि गंगा के साथ धोखा करने की छूट नहीं दी जाएगी. गंगा के सवाल पर पूरा संत समाज एक है. यह समझते हुए ही सरकार को कोई निर्णय लेना चाहिए.

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