एक समय सरपंच ग्राम पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता था, लेकिन बिहार में इस पद की अहमियत कम होने लगी है. लगभग ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देखा था, वह साकार होने वाला है. का़फी अरसे बाद बिहार में पंचायतों के चुनाव हुए और हज़ारों जनप्रतिनिधि भी जीते, लेकिन इस जीत में अंततः गांव हार गया. मौजूदा समय में बिहार की ग्राम पंचायतें पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी हैं और इस भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहे हैं निरंकुश मुखिया. सुशासन की दुहाई देकर दूसरी बार सत्ता संभालने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन सबके बावजूद ख़ामोश हैं. अगर उनकी चुप्पी टूटती भी है तो वह दो-चार घोषणाएं कर अपनी ़फर्ज़ अदायगी कर लेते हैं. मिसाल के तौर पर पिछले साल मुख्यमंत्री ने पंचायतों में मची लूट रोकने के लिए लोकप्रहरी नियुक्त करने का वादा किया था, लेकिन अभी तक कहीं कोई नियुक्ति होने की ख़बर नहीं है. इसे मुख्यमंत्री की लाचारी कहें या सब्ज़बाग़ दिखाने की उनकी आदत.

ग्राम कचहरी का असल मक़सद ग्रामीणों को गांव में ही न्याय दिलाना था, लेकिन आम लोगों को न्याय मिलना तो दूर आज बिहार की हज़ारों ग्राम कचहरियां अपने लिए ही न्याय मांग रही हैं. वर्ष 2006 में हुए त्रि-स्तरीय ग्राम पंचायत के चुनाव में सरपंच पद के लिए भी चुनाव हुए थे. एक उम्मीद के साथ लोग सरपंच बने, लेकिन धीरे-धीरे इस पद से उनका मोहभंग होने लगा. वित्तीय अधिकार विहीन, सीमित न्यायिक अधिकार और ग्राम कचहरी के लिए एक अदद भवन का न होना, बिहार में ग्राम न्यायालय के साथ एक क्रूर मज़ाक़ ही कहा जा सकता है.

पिछले साल जब पंचायत के चुनाव हुए तो सरपंच पद के लिए मुखिया पद की तुलना में कम लोगों ने उम्मीदवारी के नामांकन भरे. जहां मुखिया के एक पद के लिए औसतन दस लोगों ने नामांकन किया, वहीं सरपंच पद के लिए महज़ चार लोगों ने ही नामांकन दाख़िल किए. इससे यह बात साबित हो जाती है कि मुखिया बनने के लिए यहां कितनी मारामारी है. राज्य चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में मुखिया पद के लिए 79,423 लोगों ने चुनाव लड़ा, वहीं सरपंच पद के लिए 36,560 उम्मीदवार ही चुनावी मैदान में उतरे. इसकी वजह सा़फ है कि सरपंचों के पास कोई भी वित्तीय अधिकार नहीं है, जबकि मुखियाओं का विकास योजनाओं पर संपूर्ण नियंत्रण है, जिनसे मोटी कमाई होती है. राज्य में एक कहावत अमूमन कही जाती है कि केंद्र में पीएम, स्टेट में सीएम, डिस्ट्रिक में डीएम और पंचायत में मुखिया ही पावरफुल हैं. गांव की बैठकों में कही जाने वाली ये बातें बिहार में अक्षरशः सत्य साबित हो रही हैं.

प्रदेश में संभवतः बहुत कम ऐसी पंचायतें होंगी, जहां मुखियाओं पर ग़लत तरीक़े से धन उगाही करने और भ्रष्टाचार के आरोप न लगे हों. हालांकि कई दाग़ी मुखिया गिरफ्तार भी हुए हैं, जिन्होंने शिक्षक भर्ती, मनरेगा, इंदिरा आवास, वृद्धापेंशन जैसी योजनाओं में जमकर लूट मचाई. भोजपुर निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता सूरज प्रकाश पांडे ने चौथी दुनिया से बातचीत में कहा कि कबीर अंत्येष्टि योजना के तहत बीपीएल परिवारों को दाह संस्कार के लिए मिलने वाली राशि में भी मुखिया कमीशन लेते हैं. इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है. पढ़े-लिखे लोग जब सुनते हैं कि दूसरे राज्यों के पंचायत प्रतिनिधियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के हाथों पुरस्कार मिलता है, लेकिन उसमें बिहार के पंचायत प्रतिनिधि के नाम शामिल न होने पर उन्हें बेहद तकली़फ होती है. बिहारवासियों को ऐसी सुखद अनुभूति तभी मिलेगी, जब उनके पंचायत प्रतिनिधि भी स्वार्थ और लालच से ऊपर उठकर ग्रामीण विकास के लिए समर्पित होंगे. बिहार में सरपंच के पास अर्द्ध न्यायिक शक्तियां हैं. वहीं पंच की तो कोई ख़ास पूछ भी नहीं है. यही वजह रही कि कई पंचायतों में का़फी संख्या में पंच निर्विरोध चुन लिए गए. हालांकि यह लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई के लिए अच्छा संकेत नहीं है. अगर हालात ऐसे ही बने रहे और सरपंचों की उपेक्षा इसी तरह होती रही तो इसमें कोई संदेह नहीं कि अगले चुनाव में का़फी तादाद में सरपंच भी निर्विरोध चुन लिए जाएं.

ग्रामसभा की बैठक या मुखिया दरबार

जिस तरह संसदीय लोकतंत्र में संसद और विधानसभा की भूमिका है, उसी तरह लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई ग्राम पंचायत में ग्राम सभा की अहमियत है, लेकिन बिहार के अधिकतर पंचायतों में ग्राम सभा महज़ काग़ज़ों पर ही संचालित हो रहे हैं. कितनी धनराशि किस मद में आती है और उसे कहां ख़र्च किया जाता है, ग्रामीणों को इसकी जानकारी नहीं है. कहने को तो तमाम फैसले ग्राम सभा की बैठकों में तय होते हैं, लेकिन जब ग्राम सभा ही कुछ लालची मुखिया, पंचायत सेवक और दबंग लोगों के हाथों की कठपुतली बन जाए तो इस सूरत में यह कैसे उम्मीद करें कि गांव का विकास सही मायनों में होगा. बिहार पंचायती राज एक्ट 2006 के मुताबिक़,  ग्राम सभा की बैठक नियमित बुलानी चाहिए, लेकिन इस नियम का पालन भी नहीं हो रहा है. नतीजतन मुखिया अपने चहेतों के साथ मिलकर अपने मनमाफिक काम करते हैं. पंचायतों में मची इस लूट को रोकने में ग्रामीण आबादी चाहे तो अहम भूमिका निभा सकती है. इसके लिए जनता तो अपने गांव में एक ईमानदार प्रतिनिधियों को चुनना होगा, जो नियमित रूप से ग्राम सभा की बैठक कराए. पंचायत से जुड़े सभी फैसले ग्राम सभा की खुली बैठक में करे. कोउ नृप हो हमें का हानि इस मानसिकता का त्याग ग्रामीणों को करना होगा, तभी एक बेहतर माहौल बनेगा और गांव का संपूर्ण विकास होगा.

ग्राम कचहरी को अपना भवन नसीब नहीं

वर्ष 2006 में जब पंचायत के चुनाव हुए थे, उस व़क्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ग्राम-कचहरी को सशक्त बनाने को लेकर कई घोषणाएं की थीं. ग्राम कचहरी को लेकर नीतीश कुमार ने मीडिया के ज़रिये का़फी सु़र्खियां बटोरीं, क्योंकि बिहार देश का ऐसा पहला सूबा बना जहां ग्राम न्यायालय का सपना साकार हुआ. कई साल बीत गए, लेकिन बिहार में ग्राम कचहरी को अपना भवन आज तक नसीब नहीं हो सका. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 50 लाख रुपये की लागत से हर पंचायत में दो-मंज़िला पंचायत सरकार भवन बनाने की घोषणा की, लेकिन हक़ीक़त की धरातल पर यह योजना अभी तक उतर नहीं पाया है. यही वजह है कि भवन के अभाव में ग्राम-कचहरी या तो स्कूल के बरामदे, खुले मैदान या फिर किसी पेड़ के नीचे लगाए जा रहे हैं.

मुखियाओं की पहली पसंद सोलर लाइट

अगर आप बिहार जाएं तो आपको हर गांव में जगह-जगह लोहे के खंभे पर टिकी सोलर लाइट दिख जाएगी. पहली नज़र में आप यह सोचकर बेहद खुश होंगे कि अंधेरे में डूबे रहने वाले बिहार के गांव की तस्वीर बदल गई है, लेकिन शाम ढलते ही हो सकता है आपकी यह सोच बदल जाए, क्योंकि यहां जो सोलर लाइटें लगी हैं, उनमें ज़्यादातर ख़राब हैं. कुछ चोरी हो गई हैं और बहुत सारे खंभे अब गाय-भैंस और बकरी बांधने के काम आ रहे हैं. दरअसल, ग्रामीण विकास के तहत मिलने वाली धनराशि में एक बड़ा हिस्सा हमारे माननीय मुखिया ने सोलर लाइट लगाने के नाम पर ख़र्च किया. पूरे राज्य में हज़ारों की संख्या में सोलर लाइटें लगाई गईं. इसे आप सोलर क्रांति भी कह सकते हैं, लेकिन इस सोलर लाइट क्रांति के अर्थशास्त्र को समझना बेहद ज़रूरी है. दरअसल सोलर लाइटें लगाने से गांव भले ही रौशन न हुआ हो, लेकिन मुखिया जी का घर ज़रूर रौशन हो गया. जिस योजना में बंपर कमीशन मिले तो भला कौन मुखिया इसे ठुकराना चाहेगा. इस काली कमाई में केवल मुखिया ही शामिल नहीं हैं, बल्कि ब्लॉक में बैठे बीडीओ और पंचायत सचिव भी मालामाल हो गए.पंचायत में मुखिया के अधीन शिक्षक नियोजन, सोलर लाइटें लगाने की योजना, मनरेगा, इंदिरा आंवास, वृद्धा पेंशन, बाढ़-सूखा से बर्बाद हुई फसल के मुआवज़े की राशि, कबीर अंत्येष्टि योजना की राशि, छात्रवृत्ति की राशि का वितरण करने समेत ग्रामीण विकास से जुड़ी कई योजनाएं हैं. इन सभी योजनाओं में किस तरह ग़ैर बराबरी कर उसमें अनियमितता बरती जाती है, यह किसी से छुपा नहीं है. इसे काली कमाई का ही असर कहें कि जो मुखिया कल तक पैदल, साईकिल या रिक्शा से चलते थे, वे अब बोलेरो और स्कॉर्पियो जैसी महंगी गाड़ी से चलने लगे हैं. साथ में जब उनके सिपहसलार हाथ में राइफल लिए चलते हैं तो मुखिया का वास्तविक रुतबा देखते ही बनता है. यह हमारी व्यवस्था का एक शर्मनाक पहलू है, जब मुखिया जनता के धन पर ऐशो-आराम और सामंती आचरण के साथ जी रहा है, वहीं आम आदमी बुनियादी सुविधाओं तक को तरस रहा है.

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