fbpx
Now Reading:
एक पेड़ लगाएं मुफ्त पढ़ाई, ड्रेस और बस्ते पाएं…
Full Article 5 minutes read

एक पेड़ लगाएं मुफ्त पढ़ाई, ड्रेस और बस्ते पाएं…

shikshakutirछात्रों की फीस के बारे में आपने कई बातें सुनी होंगी. कहीं फीस हजारों में ली जा रही है तो तो कहीं लाखों में. लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में एक स्कूल ऐसा है भी है, जहां अभिभावकों से फीस पैसे में नहीं ली जाती, बल्कि उनसे अपने बच्चे के नाम पर एक पौधे की देखरेख कराई जाती है. यह स्कूल छत्तीसगढ़ के मैनपाट के रास्ते पर अंबिकापुर से 20 किलोमीटर दूर बरगईं गांव में है. बच्चों के नाम पर ये 25 पौधे बाड़ियों, बगीचों, तालाब के किनारे और पहाड़ की तलहटी पर एक साल से लहलहा रहे हैं.

कुछ पौधे अभिभावकों की लापरवाही से नष्ट हो गए, लेकिन जब इसे लेकर स्कूल प्रंबधन ने सख्त रवैया अपनाया तो अभिभावकों ने दूसरे पौधे लगाए और गंभीरता से देख-रेख शुरू की. फीस का दूसरा हिस्सा है छोटे-मोटे काम के लिए अभिभावकों से चार-छह महीनों में छोटा-मोटा श्रमदान कराना. अभिभावकों ने श्रमदान करके स्कूल के बगल में खेत के एक हिस्से को पाटकर बच्चों के लिए खेल का मैदान बनाया, स्कूल के सामने स्पीड ब्रेकर बनाए.

इस स्कूल की खासियत सिर्फ उसकी फीस नहीं, बल्कि कई दूसरी बातों में यह अनोखा है. शिक्षा कुटीर नाम से केजी वन का यह स्कूल जुलाई से खुला है. इसमें 4 और 5 साल के 26 बच्चे पढ़ रहे हैं. स्कूल चलाने वाली संस्था के प्रमेन्द्र चौबे का कहना है कि छह महीने में यहां के बच्चे ककहारा, अल्फाबेट, 1 से 100 तक गिनती बोलना और लिखना सीख चुके हैं. ये देखकर बड़ा अच्छा लगता है कि जिनके माता-पिता साइन तक नहीं कर सकते, वे अंग्रेजी में बड़ों का अभिवादन करते हैं, प्रार्थना करते हैं और बाहर जाने के लिए मे आई गो टू वॉशरुम बोलते हैं.

दिलचस्प बात है कि ये बैगलैस स्कूल है. बच्चों का बैग, उनकी किताबें और कॉपियां सब स्कूल में जमा करा लिया जाता है. यह अंचल का पहला बैगलैस स्कूल है.
पढ़ाई के स्तर को सुधारने के लिए सामान्य तौर पर बच्चों पर सख्ती करके उन्हें और पढ़ाया जाता है, लेकिन यहां पढ़ाई का बोझ कम होने से बच्चे ज़्यादा सीख रहे हैं. स्कूल हफ्ते में केवल पांच दिन ही खुलता है.

स्कूल की शिक्षिका असीमा बड़ा ने बताया कि पहले बच्चों का बैग स्कूल में रखा गया तो बच्चे रोते थे और घर में पढ़ने की ज़िद करते थे. तब बच्चों को स्लेट-पेंसिल घर ले जाने दिया गया और हैरानी की बात है कि बच्चे खुद घरों में खेल के रूप में पढ़ाई करने लगे. इस संस्था से रायपुर, बिलासपुर और अंबिकापुर के युवा जुड़े हैं, जो स्थानीय स्तर पर मदद जुटाकर इसे चला रहे हैं. संस्था के सचिव मनीष सोनी का कहना है कि मिशनरी जैसी संस्थाएं भी अति गरीब परिवारों को फ्री में शिक्षा नहीं देतीं, बल्कि विद्यालय को उनके अंचल तक पहुंचा देती हैं.

फ्री में एजुकेशन कम से कम यहां केवल सरकारी स्कूल में मिलती है. लेकिन वहां पढ़ाई का स्तर बेहद खराब है. वहां से निकलने वाले बच्चे बाकी स्कूल के बच्चों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते. यही सोचकर हमने बरगईं में विद्यालय खोला. यहां बच्चों को फ्री में शिक्षा नहीं, बल्कि ड्रेस, किताबें, स्लेट-पेंसिल, जूते सारी चीज़ें मुफ्त में मुहैया कराईं. इसके लिए शहर के लोगों से दान कराया और इसके हिसाब-किताब का तरीका बेदह पारदर्शी रखा गया है.

स्कूल की एक बेवसाइट (www.shikshakutir.org) और फेसबुक का पेज है, जिनके माध्यम से स्कूल की गतिविधियां सार्वजनिक की जाती हैं. वेबसाइट पर ही सभी दानदाताओं की जानकारी और खर्चे का ब्यौरा मुहैया है. बच्चों को पढ़ाने के लिए आसपास की ही दो शिक्षिकाएं निःशुल्क सेवा दे रही हैं. वे केवल आने-जाने का खर्च स्कूल से ले रहीं हैं. इन शिक्षिकाओं को हर तीन महीने में प्रशिक्षित शिक्षकों से प्रशिक्षण दिलाई जाती है, जिसमें उन्हें आगामी तीन महीने तक क्या और कैसे पढ़ाना है, प्रशिक्षण व स्कूल के बाकी कार्यों के लिए एक अन्य महिला शिक्षिका अपनी सेवाएं निःशुल्क दे रही हैं.

स्कूल का गांव में जबरदस्त रिस्पॉन्स है. लोगों ने दूसरे स्कूलों से नाम कटवाकर अपने बच्चों को दाखिला दिलाया है, लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी का अनुपात 20 से ज्यादा न रखने और जगह की कमी की वजह से 26 बच्चों को ही रखा गया है. स्कूल चलाने वाले अलग-अलग शहरों में हैं, इसलिए वो स्कूल के संबंध में फैसले व्हाट्सअप जैसी सोशल नेटवर्किंग एप्प से संवाद करके लेते हैं.

बाद में प्रबंधकारिणी की बैठक में इस पर औपचारिकता की मुहर लगाई जाती है. सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंदोपाध्याय युवाओं द्वारा इस कोशिश को आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की संज्ञा देते हैं. उनका कहना है कि राष्ट्रप्रेम दिखाने की बजाय इस तरह रचनात्मक रूप में सामने आता है तो यकीनन ये आध्यात्मिक राष्ट्रवाद है. उनका मानना है कि आदिवासी अंचल में शिक्षा के क्षेत्र में युवाओं की दस्तक बेदह रचनात्मक है.प

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.