malayaब्राजील के पूर्व समाजवादी राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा भ्रष्टाचार के एक मामले में फंसे हुए हैं. उनके बाद राष्ट्रपति पद संभालने वाली डिल्मा राउसेफ को संसद में महाभियोग का सामना करना है. मामला ऊर्जा मंत्रालय से जुड़ी राष्ट्रीयकृत पेट्रोलियम कंपनी पेट्रोब्रास के नियंत्रण का है. यह मंत्रालय लूला के कार्यकाल में राउसेफ के पास था. राउसेफ पर आरोप है कि उन्होंने पेट्रोब्रास के अधिकारियों को कंपनी से दो बिलियन डॉलर निकालने की अनुमति दी और उन पर कार्रवाई नहीं होने दी. लूला को जांच के दायरे से बाहर रखने के लिए राउसेफ ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. लाखों लोगों ने इसके विरोध में मार्च निकाला. अब अदालत ने यह ़फैसला दिया है कि लूला की नियुक्ति अवैध थी. ब्राजील के व्यापार जगत में खुशी है कि राउसेफ की छुट्टी हो सकती है और अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर आ सकती है.
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की एक बड़ी धनराशि एनपीए (ग़ैर निष्पादित ऋण) की श्रेणी में आ गई है. विजय माल्या (कई अन्य कर्जदारों समेत) 7,000 करोड़ रुपये के अपने बकाया ऋण के कारण सुर्खियों में हैं. हालांकि, मुद्दा उक्त बैंकों के अधिकारियों का आचरण होना चाहिए, जिन्होंने ऋण मंज़ूर करते समय यह जांच नहीं की कि माल्या से जो सिक्योरिटी ली गई है, वह उनकी है या नहीं. ऐसा लगता है कि किसी ने भी उन डमी कंपनियों की जांच करने की कोशिश नहीं की, जो माल्या ने अपने ऋणों का भुगतान अपनी जेब से न करने के लिए खुलवाई थीं. उधर एयर इंडिया को 100 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है, जिसकी भरपाई करदाताओं की जेब से होनी है. हालांकि, देश के अधिकतर करदाताओं के पास इतना पैसा नहीं है कि वे अपने लिए पॉकेट वाले कोट-पैंट बनवा सकें. दरअसल, भारत में भ्रष्टाचार का एक लंबा इतिहास रहा है. इस भ्रष्टाचार में राष्ट्रीयकृत कंपनियों का भरपूर सहयोग रहा है. फिरोज गांधी ने क्रोनी सोशलिज्म की यह बीमारी 1950 के दशक में ही उज़ागर कर दी थी, जब एलआईसी के साथ मुंधरा का सौदा हुआ था. अभी भी भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की निजी क्षेत्र पर नैतिक श्रेष्ठता बरकरार है, जबकि सच्चाई यह है कि इसके द्वारा लंबे समय से करदाताओं का पैसा सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के दोस्तों की जेब में जा रहा है.

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इंदिरा गांधी द्वारा भारत के बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला राजनीतिक था. यह बात इंदिरा गांधी ने आईजी पटेल को बताई थी, जिन्होंने इस बिल का मसौदा तैयार करने में मदद की थी. ज़ाहिर है कि बहाना ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाओं के विस्तार को बनाया गया था. लेकिन जैसा कि हालिया घटनाएं ज़ाहिर करती हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक नई सदी के दूसरे दशक तक भी वित्तीय सेवाओं को समावेशी बनाने में असफल रहे हैं यानी राष्ट्रीयकरण के 40 वर्षों बाद भी उनका मकसद पूरा नहीं हुआ है. दरअसल, बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई बनाने का असल उद्देश्य राजनीतिक दलों, मुख्य रूप से सत्तारूढ़ पार्टी को ऋण दिलाने के लिए था. ये ऐसे ऋण थे, जिनके चुकाए जाने की संभावनाएं बहुत कम थीं. ये ऋण बैंकों के क्लासिक एनपीए थे. यह बात आज से 10 वर्ष पहले एक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के रिटायर्ड चेयरमैन ने मुझे बताई थी.
माल्या प्रकरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का आख़िरी मामला होना चाहिए, जो एनडीए सरकार को प्रेरित करे कि वह बैंकों का प्रबंधन अनुशासित करे. बैंकों को एकीकृत करके फिर से उनका निजीकरण हो. इसके बाद बैंक अपनी अक्षमता के चलते कम से कम ग़रीब किसानों-मज़दूरों पर बोझ तो नहीं डालेंगे. लेकिन अफ़सोस, ऐसा कुछ भी नहीं होगा! अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को करदाताओं का पैसा बर्बाद करने के लिए दंडित करने की बात की जाती है, तो वामपंथी उनकी अक्षमता के बचाव में मोर्चा खोल देंगे. दरअसल, कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में रहे, क्रोनी समाजवाद सुरक्षित रहेगा.
माल्या प्रकरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का आख़िरी मामला होना चाहिए, जो एनडीए सरकार को प्रेरित करे कि वह बैंकों का प्रबंधन अनुशासित करे. बैंकों को एकीकृत करके फिर से उनका निजीकरण हो. इसके बाद बैंक अपनी अक्षमता के चलते कम से कम ग़रीब किसानों-मज़दूरों पर बोझ तो नहीं डालेंगे. लेकिन अफ़सोस, ऐसा कुछ भी नहीं होगा! अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को करदाताओं का पैसा बर्बाद करने के लिए दंडित करने की बात की जाती है, तो वामपंथी उनकी अक्षमता के बचाव में मोर्चा खोल देंगे.

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