bharat-mataपैंसठ वर्ष पहले भारत नियति से साक्षात्कार (ट्रिस्ट विद डेस्टिनी) करने के लिए स्वतंत्र हुआ. एक नव स्वतंत्र राष्ट्र का सांप्रदायिक दंगों, लाखों शरणार्थियों को बसाने, कश्मीर में युद्ध, देशी रियासतों के एकीकरण, अंग्रेजी शासन द्वारा विरासत में मिली लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और लंबे समय तक चली आज़ादी की लड़ाई के दौरान लोगों से किए गए वादे पूरे करने की आशाओं-आकांक्षाओं जैसी कई गंभीर चुनौतियों से सामना हुआ. विभाजन की पीड़ा और दो सौ वर्षों की दासता के बोझ के बावजूद भारत अपने भविष्य एवं उसकी अनिश्चितताओं की ओर बड़ी आशा और विश्वास के साथ देख रहा था. घोर ग़रीबी में जीवनयापन कर रही और सदियों से भेदभाव का शिकार रही 33 करोड़ आबादी वाले देश की शासन व्यवस्था संभालने वाले लोगों के सामने ऐसी चुनौतियां थीं, जो किसी भी नए शासक वर्ग को धराशायी कर देतीं. हमारे महान नेता अपनी दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति (जो उनमें जेल की सजा काटते वक्त आई थी) के बल पर एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे, जो पूरी दुनिया की आंखों में आंखें डालकर बात कर सके.

आज़ादी के पहले पहर में वे किसी भी तरह की शासन पद्धति का चुनाव कर सकते थे. लोग उनके किसी भी निर्णय के साथ होते, क्योंकि लोगों को उन पर यकीन था. आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, लेकिन जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. बीआर अंबेडकर एवं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेताओं ने भविष्य के मद्देनज़र एक ऐसे संविधान का निर्माण करने का निर्णय लिया, जो संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, एक जवाबदेह कार्यपालिका और स्वतंत्र प्रेस की ओर ले जाता हो. सबसे साहसी निर्णय उन्होंने वयस्क मताधिकार देने का लिया. हर भारतीय, चाहे वह अमीर हो या ग़रीब, शिक्षित हो या अशिक्षित, प्रभावशाली हो या शोषित यानी किसी भी जाति-धर्म, वर्ग-क्षेत्र-लिंग का हो, को मतदान का अधिकार दिया गया. उन्होंने पश्चिमी देशों के व्यंग्य को नज़रअंदाज़ करते हुए देश के सुदूर इलाकों में रहने वाले लोगों पर भी विश्वास जताया कि उनमें इतनी समझ है कि वे अपने शासक का चुनाव कर सकें.

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नया नेतृत्व एक ऐसे राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) का गठन करना चाहता था, जो लोकतांत्रिक हो, अपने नागरिकों के लिए न्यायसंगत हो और इतना शक्तिशाली भी कि किसी भी स्थिति में उसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश भी फिर से अधीन न कर सके. उन्होंने ग़रीबी, अशिक्षा एवं ग़ैर बराबरी के ़िखला़फ लड़ाई और बड़ी परियोजनाओं, औद्योगिक प्लांटों एवं बांधों पर सोच-विचार किया. इस राह में विभिन्न बाधाओं के बावजूद उन्होंने कुछ दूरी ज़रूर तय की. वे दिन अलग थे. उस दौर के नेताओं में कुछ अलग बात थी, उनके लक्ष्य बड़े थे. उन्हें स्वयं और जनता पर यकीन था. बदले में जनता ने भी उन पर विश्वास करते हुए उनके सपने और अरमान अपने मान लिए. वह समय बेहद रोमांचक था. एक तरह से कहा जाए, तो हाल में स्वतंत्र हुए एक देश द्वारा इतिहास रचा जा रहा था. यह 21वीं सदी की शुरुआत है और यह समय बिल्कुल अलग है. इस नई सदी में देश में इतिहास रचने की भावना का अभाव दिखाई पड़ रहा है. ऐसा लग रहा है कि राष्ट्र भविष्य की फ़िक्र के बजाय अपने भीतर की चिंताओं में उलझा हुआ है.

आज भारत दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. उसके पास दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना है. वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में मिली सफलताओं के चलते वह दुनिया के चुनिंदा परमाणु हथियार संपन्न देशों में शामिल है. आगामी एक-दो वर्षों में भारत चांद पर क़दम रखने जा रहा है और अगले पांच वर्षों में मंगल ग्रह पर भारतीय दल भेजने की तैयारी चल रही है. इन प्रभावशाली उपलब्धियों के बावजूद इस देश में एक व्यापक निराशा का वातावरण बन रहा है. अधिकांश नागरिकों द्वारा देश के भविष्य को लेकर चिंता या शंका ज़ाहिर की जा रही है, जो बताती है कि देश भर में अपरिभाष्य गुस्सा व्याप्त है. इस गुस्से की वजह से भारत के सामने इनवर्ड लुकिंग कंट्री (अपनी ही समस्याओं में उलझे रहने वाला देश) बनने का खतरा उत्पन्न हो गया है. इसी वजह से वह अब तक दुनिया के सामने कोई बड़ी पहल करने और अपना उचित स्थान हासिल करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा है. एक ऐसा शख्स, जो अपनी आंतरिक चिंताओं से ग्रस्त हो, अपनी परेशानियों से निकलने का रास्ता नहीं तलाश सकता. यही तथ्य राष्ट्रों पर भी लागू होता है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा. देश की रचनात्मक ऊर्जा बर्बाद हो रही है और उसकी जगह क्षयकारी नकारात्मकता ने ले ली है, जो मौजूदा राजनीतिक वातावरण के चलते पैदा हो रही है.

विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. बीआर अंबेडकर एवं अन्य बड़े नेताओं की धारणा भिन्न थी, विचार भिन्न थे, लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तिगत विचार कभी देश पर हावी नहीं होने दिए. जिस भावना के साथ उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, उसे देश ने भी पसंद किया और उन्हें निर्णय लेने का एक नैतिक अधिकार दे दिया, जिसका आज के संपूर्ण राजनीतिक परिदृश्य में अभाव दिखता है. देश में स़िर्फ नेतृत्व की गुणवत्ता में ही गिरावट नहीं आई, बल्कि यह गिरावट देश के संचालन के लिए संविधान में परिकल्पित प्रमुख संस्थाओं यानी संसद, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के कामकाज में भी आई है. आज़ादी के बाद अच्छी शुरुआत करते हुए उक्त संस्थाओं ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान किया था. तब लोग उक्त संस्थाओं का सम्मान करते थे, लेकिन समय के साथ उनकी कार्यप्रणाली त्रुटिपूर्ण होती चली गई. इस वजह से लोगों का उनसे विश्वास उठ गया. लोगों के बीच सम्मान हृास होने की वजह से लोकतंत्र की गुणवत्ता और शासन के मानकों का भी क्षय हो रहा है.

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संस्थागत गिरावट का सबसे खराब उदाहरण संसद स्वयं है. संविधान ने संसद को बहुत-सी ज़िम्मेदारियां एवं अधिकार दिए थे, इसलिए लोग उससे डरते थे और उसका सम्मान भी करते थे. लेकिन, आज वह लोगों के उपहास का विषय बन गई है. कई सांसदों के बर्ताव के चलते संसद लोगों के तिरस्कार की वस्तु बन गई है. एक समय था, जब सभी राजनीतिक दल अपने सर्वश्रेष्ठ नेताओं को संसद भेजते थे. जवाहर लाल नेहरू स्वयं संसद की बहस सुनते थे और कई बार बहस के बीच में सरकार की नीतियां और निर्णय स्पष्ट करते थे. उस दौर में गोविंद वल्लभ पंत, जगजीवन राम, डॉ. बीआर अंबेडकर जैसे सक्षम सांसद सत्ता पक्ष के साथ होते थे, वहीं सीपीआई के हीरेन मुखर्जी, भूपेश गुप्ता एवं इंद्रजीत गुप्ता, भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी, स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी एवं नारायण दांडेकर, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नाथ पाई एवं एचवी कॉमथ, सोशलिस्ट पार्टी के राम मनोहर लोहिया एवं मधु लिमये, सीपीआई (एम) के एके गोपालन और आचार्य कृपलानी (जो किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं थे) आदि ने मिलकर संसद की बहसों में तीखे तर्कों, तीक्ष्ण आलोचनाओं, तानों, हास्य, बुद्धि-विवेक और ज़िम्मेदारी की भावना से जान डाल दी थी. आज की पीढ़ी के सांसदों में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता.

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