अरुण जेटली ने कभी सीधे और कभी टे़ढ़े ढंग से भाजपा के भीतर सफाई अभियान चलाया. इसका परिणाम यह निकला कि आज आडवाणी के बाद भाजपा में नरेंद्र मोदी और फिर अंतिम नेता अरुण जेटली ही दिखाई दे रहे हैं.

भाजपा के बारे में हमें क्यों चिंता करनी चाहिए, यह सवाल है और इसका उत्तर भी बहुत मायने रखता है. भाजपा को देश की जनता ने लोकसभा में विपक्षी दल की ज़िम्मेदारी सौंपी है और उससे अपेक्षा की है कि वह कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन पर लगातार न केवल नज़र रखे, बल्कि हमेशा उन सवालों को उठाए जिनसे आप आदमी की तकली़फों का रिश्ता है. भाजपा इन पर खरी नहीं उतर रही. अटल बिहारी वाजपेयी के ख़ामोश होने के साथ ही भाजपा जनता से अलग दिखाई देने लगी है. अटल जी के सक्रिय रहते भाजपा को लोग सवालों से जूझने वाला दल मानते थे, पर अटल जी की तस्वीरों का जैसा अपमान भाजपा ने किया, वैसा ही अपमान वह जनता की भावनाओं का भी कर रही है. भाजपा को जनता ने यूं ही अपनी नज़रों से नहीं गिरा दिया, उसके कारण हैं. सबसे बड़ा कारण स्वयं लालकृष्ण आडवाणी हैं जिन्होंने अपनी सारी राजनीति अपने इर्द-गिर्द चलाई. नब्बे के बाद उन्होंने भाजपा का कलेवर ही बदल दिया तथा उन सभी को भाजपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया, जो भाजपा के ज़मीनी नेता थे. उन्होंने अपनी एक टीम बनाई, जिसका मुखिया अरुण जेटली को बनाया. अरुण जेटली ने कभी सीधे और कभी टे़ढ़े ढंग से भाजपा के भीतर सफाई अभियान चलाया. इसका परिणाम यह निकला कि आज आडवाणी के बाद भाजपा में नरेंद्र मोदी और फिर अंतिम नेता अरुण जेटली ही दिखाई दे रहे हैं. सुषमा स्वराज शॉक एब्जॉरवर की तरह हैं, जो आडवाणी और अरुण जेटली की आंख का धूप का चश्मा बन गई हैं. जसवंत सिंह के निकाले जाने के पीछे की कहानी जो सामने आई है वह भी मज़ेदार है. लोकसभा चुनावों के आख़िरी दिनों में भाजपा के साथ संघ में भी यह चिंता थी कि यदि लिब्राहन कमीशन ने आडवाणी के ख़िला़फ फैसला दे दिया तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा. दो नामउभरे, पहला मुरली मनोहर जोशी और दूसरा जसवंत सिंह. संघ को लगा कि यदि जोशी का नाम सहयोगी दलों ने न माना तो जसवंत सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा. आडवाणी और उनकी टीम को यह अखर गया. मुरली मनोहर जोशी के ख़िला़फ कुछ करना मुश्किल था. अतः पहले जसवंत सिंह को निबटाने का फैसला लिया गया.

जसवंत सिंह ने राजनाथ सिंह को एक ख़त लिखा और हार के कारणों पर विचार करने की मांग की. भाजपा डर गई कि यदि ऐसा हुआ तो पांच लोगों को पद से हटना पड़ेगा. वैसे भाजपा में आडवाणी और राजनाथ सिंह के दो गुट माने जाते हैं. राजनाथ सिंह को दर्द था कि अध्यक्ष रहने के बाद भी किसी ने उनका नाम प्रधानमंत्री पद के योग्य क्यों नहीं समझा, क्यों जसवंत सिंह का नाम सामने आया. यहां जसवंत सिंह, आडवाणी और राजनाथ के निशाने पर आ गए.जैसे जसवंत सिंह की किताब बाज़ार में आई, रणनीति बन गई. शिमला में चिंतन बैठक होने वाली थी. जसवंत सिंह समेत सभी लोग पहुंच गए थे. सुबह नाश्ते पर नरेंद्र मोदी ने राजनाथ सिंह को संबोधित कर कहा कि वे आज ही गुजरात वापस चले जाएंगे, क्योंकि जसवंत सिंह की किताब में सरदार पटेल के ज़िक्र की वजह से दंगे हो सकते हैं. नरेंद्र मोदी के पास कोई जानकारी नहीं थी, न ही उनकी खुफिया पुलिस ने उन्हें कोई संदेश भेजा था. दरअसल उन्होंने तो अपने चाणक्य साथी की रणनीति का पहला बम फोड़ा था. अब बारी राजनाथ सिंह की थी.उन्होंने कहा कि बैठक से पहले पार्लियामेंटरी बोर्ड की मीटिंग करते हैं. सभी तैयार बैठे थे. राजनाथ सिंह ने कहा कि नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि किताब पर कोई फैसला हो, अन्यथा वे चिंतन बैठक में शामिल नहीं होंगे. वापस चल जाएंगे, क्योंकि गुजरात में पटेल समुदाय दंगा कर सकता है. किताब पर क्या फैसला होता, जसवंत सिंह पर फैसला हो गया. उन्हें दल से निकालने की बात तय हो गई. बैठक में शामिल आडवाणी जी बिल्कुल ख़ामोश रहे. फैसले के दो माह बाद बोले कि वे फैसले से सहमत नहीं थे. कैसे नेता हैं आडवाणी जी, बैठक में बोलते नहीं, निकालने का फैसला हो जाने देते हैं. देश में हुई प्रतिक्रिया को देखते हुए बाद में कहते हैं कि वे सहमत नहीं थे. देश ने भाजपा को बहुमत नहीं दिया और न आडवाणी जी प्रधानमंत्री बन पाए.भाजपा के अंतर्विरोधों और अंतःकलह से घबराकर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने तीन बार संघ के एक समय दिमाग़ कहे जाने वाले गोविंदाचार्य को मिलने के लिए बुलाया. लंबी-लंबी बातचीत हुई, विश्लेषण हुए, भाजपा को कैसे ठीक किया जाए इस पर बात हुई. संघ के अंदरूनी लोगों ने बताया कि मोहन भागवत ने गोविंदाचार्य से भाजपा का ज़िम्मा लेने का अनौपचारिक प्रस्ताव रखा. इसका मतलब कि वे जानना चाहते थे कि यदि गोविंदाचार्य को भाजपा का अध्यक्ष बनाया जाए तो क्या वे इसे स्वीकार करेंगे? संघ सूत्र बताते हैं कि गोविंदाचार्य ने मोहन भागवत से क्षमा मांग ली है, लेकिन मोहन भागवत चाहते हैं कि या तो गोविंदाचार्य या उन जैसा कोई दूसरा भाजपा का अध्यक्ष बने ताकि भाजपा गगन बिहारी नेताओं के चंगुल से  निकल सके.आज भाजपा पर लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, अनंत कुमार और सुषमा स्वराज का राज चल रहा है. वेंकैय्या नायडू और राजनाथ सिंह प्यादे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को भाजपा के आसमान से मिटाने में यही टीम ज़िम्मेदार है. इतना ही नहीं, भाजपा कार्यकर्ता खुले आम कह रहे हैं कि इस टीम के रहते हुए भाजपा का दिल्ली की सत्ता में आना नामुमकिन है. कार्यकर्ताओं से यह पूछने पर कि फिर दूसरी टीम कौन हो, वे चुप हो जाते हैं और कहते हैं कि इन लोगों ने किसी और को पार्टी में रहने कहां दिया है. भाजपा में आग सुलग रही है और कुछ लोगों को जलाने के लिए बढ़ रही है. देखना है कि कौन जलता है और कौन बचता है. पर इस सारी उठा पटक में सबसे ज़्यादा ठगे गए वे लोग हैं जिन्होंने भाजपा को वोट दिया और भरोसा किया कि वह विपक्षी दल की भूमिका निभाएगी. क्या भाजपा विपक्षी दल की भूमिका निभाने लायक़ भी नहीं बची है?  इंतज़ार करते हैं कि भाजपा इसका कब जवाब देती है.

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