indianparliamentपचास के दशक के मध्य में  परीक्षाओं में अकसर इस तरह के सवाल पूछे जाते थे कि भारत एक संघ है जिसका झुकाव एकात्मक (यूनिटरी) व्यवस्था की तरफ है.  टिप्पणी करें. यह उससे भी पहले की बात है जब जवाहर लाल नेहरू ने केरल में जनता द्वारा चुनी गई  कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करके अपना दामन दागदार नहीं किया था. इसके बाद स्थिति लगातार खराब होती चली गई. इंदिरा गांधी ने नियमित रूप से राज्य सरकारों को बर्खास्त किया. अंततः बोम्मई केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामले में हस्तक्षेप किया.

संघवाद (फेडरलिज्म) और लोकतंत्र दो ऐसे स्तंभ हैं जिनकी रक्षा की जानी चाहिए. आर्टिकल-356 की उत्पति 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट से हुई है, जिसके तहत गवर्नर जनरल को सूबों की निर्वाचित सरकारों पर अधिक अधिकार मिले थे. भारत में लोकतंत्र के आने से पहले ही एक्जीक्यूटिव के अधिकार स्थपित हो चुके थे, जो अब तक बरकरार हैं. फर्क केवल इतना है कि राष्ट्रपति अब चुना जाता है और मंत्री परिषद (जो जनता का प्रतिनिधित्व करती है) के मशवरे पर काम करता है.

जैसे संघीय सरकार चुनकर आती है उसी तरह राज्य सरकारें भी चुनकर आती हैं. इन सरकारों की बर्खास्तगी की शर्त विधायिका का अविश्वास और कुशासन (जैसा के पहले के मामलों में होता था) है. पहली शर्त को पूरा करने में दल-बदल क़ानून ने जटिलता पैदा कर दी है. इस क़ानून ने पार्टी के नेता को अधिक ताक़तवर बना दिया है, जिसके कारण सभापति का महत्व बढ़ जाता है. लिहाज़ा, चुनकर आए सदस्यों/विधायकों की पार्टी से असहमति जताने वाले लोकतांत्रिक अधिकारों की कोई हैसियत नहीं है. ऐसे में दो प्रतिस्पर्धी निर्वाचित सरकारों की रस्साकशी शुरू हो जाती है.

जैसे ही आप पार्टी स्तर पर मतभेद ज़ाहिर करते हैं आपकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं. ऐसे मामलों में अत्यधिक शक्तिशाली केंद्र को केवल न्यायपालिका ही रोक सकती है. लेकिन यहां भी निचली और उच्च अदालतें हैं और जैसा कि हमने उत्तराखंड मामले में छोटी खंडपीठ और बड़ी खंडपीठ को देखा. आर्टिकल-356 का झगड़ा संविधान की एक खामी को उजागर करता है. इसमें साफ़ नहीं है कि राज्य सरकार को बर्खास्त करने का आखिरी फैसला किसका होगा.

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आर्टिकल-356 को लागू करने का राष्ट्रपति का फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक करार दिया जा सकता है. (जैसा कि हमने एनजेएसी मामले में देखा कि सुप्रीम कोर्ट खुद से जुड़े मामले में भी संसद के फैसले को रद्द कर सकता है. लिहाजा न्यायपालिका खुद के सुधार को भी रोक सकती है.)

यह समस्या केवल मौजूदा सरकार या पूर्व की सरकारों की नहीं है. यह समस्या इसलिए है क्योंकि भारत आज़ाद रियासतों का संघ नहीं है, जैसा कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में हुआ था. यह एक ऐसी संघीय व्यवस्था है जहां सत्ता ऊपर से नीचे की तरफ आती है.  आज़ादी के बाद इसमें संघीय प्रावधान किए गए थे. संविधान केंद्र को नए राज्य बनाने, उनकी सीमाएं पुनर्निर्धारित करने इत्यादि का अधिकार देता है. जबकि अमेरिका में संघीय सरकार के पास न तो राज्य सरकारों को बर्खास्त करने का अधिकार है और न ही उनकी सीमाओं के पुनर्निर्धारण का. उत्तराखंड मामले में क्या होगा यह तो कुछ समय बाद ही पता चलेगा, लेकिन यह समस्या बरकरार रहेगी कि इस मामले में आखिरी फैसला किसका होगा.

अगर केंद्र सरकार द्वारा राज्य की एक निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया जाता है और न्यायपलिका उसके फैसले को रद्द कर देती है, ऐसे में यह सवाल ज़रूर उठेगा कि ऐसे मामलों में अंतिम फैसला किसका होगा? केंद्र सरकार को केवल संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है. केंद्र में राष्ट्रपति शासन की कोई व्यवस्था नहीं है. लिहाज़ा यह कहा जा सकता है कि केंद्र में लोकतंत्र की सत्ता है जबकि राज्यों में ऐसा नहीं है. आर्टिकल-356 पर बहस अत्यंत आवश्यक है. अगर भारत एक लोकतंत्र है तो यहां का हर एक जन प्रतिनिधि (संासद/विधायक) बराबर है. और यदि भारत संघ है तो केंद्र को राज्यों को बराबरी का सम्मान देना चाहिए.

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