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अराजकतावादी नक्सलवाद : पुनर्विचार की ज़रूरत
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अराजकतावादी नक्सलवाद : पुनर्विचार की ज़रूरत

नक्सलवादियों की हाल-फिलहाल की गतिविधियों से ऐसा लगता है कि वे अपने उद्देश्यों से भटकते जा रहे हैं. कुछ समय पहले मलकानगिरी के ज़िलाधिकारी का अपहरण कर लिया गया, उड़ीसा में एक विधायक और इटली के दो नागरिकों का अपहरण कर लिया गया. साथ ही कई पुलिस वालों की हत्या की जा रही है, जैसा कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले और छत्तीसगढ़ में देखा जा सकता है. इसके साथ ही पुलिस के साथ मुठभेड़ में नक्सलवाद से जुड़े कई युवक मारे गए, जिनमें कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी भी शामिल थे. नक्सलवादी अपना ही राग अलाप रहे हैं. वे दीवारों पर लिखे हुए संदेशों को पढ़ना नहीं चाहते हैं. वे 1960 के दशक की बात भूल गए हैं. उस समय हज़ारों युवाओं की जानें गई थीं, जो मार्क्स के सिद्धांतों पर चलकर हिंसात्मक तरीक़े से सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रहे थे. लेकिन नक्सलवादियों को वे पुरानी बातें याद नहीं हैं और वे अभी भी वही कर रहे हैं, जो चालीस साल पहले करते थे. गांधी जी का कहना था कि उद्देश्य की पवित्रता से अधिक ज़रूरी है कि उद्देश्य प्राप्ति का साधन पवित्र हो. उन्होंने साधन और साध्य दोनों की पवित्रता की बात कही थी. उनका कहना था कि अगर साधन सही नहीं है तो साध्य अपने आप ग़लत हो जाता है. यही बात नक्सलवादियों को सोचनी चाहिए. वे क्या चाहते हैं, यह तो वही जानें, लेकिन जिस रास्ते का इस्तेमाल वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कर रहे हैं, वह किसी से छुपा नहीं है और कोई उसे सही नहीं कहेगा.

बहुत सारे आलोचकों का कहना है कि भारत इतना बड़ा देश है कि यहां लोकतंत्र सही तरीक़े से चलाया नहीं जा सकता है. यह विविधताओं वाला देश है, जहां विभिन्न जातियों, धर्मों, नस्लों, भाषाओं एवं सामाजिक स्थिति वाले लोग रहते हैं. इसके कारण इनके बीच काफी अंतर्विरोध है, लेकिन आलोचकों की बातों में कोई दम नहीं दिखाई देता. भारत ने अपनी विविधता बनाए रखकर इन अंतर्विरोधों को दूर किया है. देखा जाए तो भारत विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा अपनी विविधता बनाए रखते हुए भी इनके बीच एकता क़ायम रखने में ज़्यादा सफल हुआ है. इसे इन आलोचकों को स्वीकार करने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी. इन्हें इन बातों पर ध्यान देना चाहिए कि भारत ने विश्व के सामने यह साबित कर दिया है कि वह एक परिपक्व देश है और उसका समाज भी काफी मज़बूत है. भारत ने अपने नागरिकों का विकास अपनी नीतियों द्वारा किया है. भारतीय जनता के सहयोग से ही सरकार ने राष्ट्र विरोधी ताक़तों को उनके मक़सद में सफल नहीं होने दिया. इसे तमिलनाडु, पंजाब या उत्तर-पूर्व भारत में सक्रिय अलगाववादी ताक़तों की असफलता के रूप में देखा जा सकता है. इन ताक़तों को लोगों का समर्थन नहीं मिला. लोगों ने सरकार का सहयोग किया और अलगाववादी ताक़तों को मुंह की खानी पड़ी. भारत ने समाज के विभिन्न समुदायों की आवश्यकताओं का ख्याल रखा और उसके अनुसार उनकी सहायता की, जिसका परिणाम हमारे सामने है. कई राज्यों में अलगाववादी ताक़तों को वहां के लोगों का समर्थन नहीं मिला और वे असफल हो गईं. अगर जनता को भारत सरकार पर भरोसा न होता और वह यह समझती कि सरकार उसकी समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दे रही है तो फिर वह अलगाववादी ताक़तों को ही समर्थन देती और भारत की स्थिति पाकिस्तान जैसी हो जाती, जहां आज़ादी के कुछ सालों के बाद ही देश का विभाजन हो गया, लेकिन भारत के लोग इस बात को समझते हैं. उन्हें अपनी सरकार पर भरोसा है, अपने लोकतंत्र पर भरोसा है. हालांकि सरकार की नीतियों से वे पूरी तरह ख़ुश नहीं हैं, लेकिन उनका गुस्सा वर्तमान शासन प्रणाली से नहीं है, बल्कि शासन में भागीदार उन लोगों से है, जो अपने ओहदे का ग़लत फायदा उठा रहे हैं. यही कारण है कि भारत में काम करने वाले अलगाववादी तत्वों को देश के लोगों का समर्थन नहीं मिला और वे अपने नापाक इरादे में कामयाब नहीं हो सके.

नक्सलियों को यह मालूम होना चाहिए कि किसी भी विचारधारा का चरमपंथी रवैया ख़राब होता है. उन्हें इसके लिए इतिहास से सबक लेना चाहिए. इतिहास गवाह है कि चरमपंथ का परिणाम हमेशा नकारात्मक रहा है. 1990 के दशक में साम्यवाद का खात्मा हो गया. फ्रांसिस फुकुयामा ने उसे इतिहास का अंत कहा था. हालांकि कुछ लोग फुकुयामा के इस विचार से सहमत नहीं थे. इसके बाद उदार पूंजीवाद के नेतृत्व में खुले व्यापार की नीति आई, जिसे भी पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता है.

हमने सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए कई योजनाएं चलाईं, जिनके कारण उनका विकास संभव हुआ है. ज़्यादातर योजनाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण एवं रोज़गार से संबंधित हैं. इन योजनाओं के माध्यम से भारत के मध्य वर्ग के लोगों के जीवन स्तर में सुधार भी हुआ है. इसका फायदा उन लोगों को भी हुआ है, जो विकास से दूर थे. हमारे देश में शिक्षा का स्तर बढ़ा है. सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया, जिसके चलते समाज के कमज़ोर लोगों की भागीदारी भी सरकारी नौकरियों में बढ़ी है. साक्षरता दर में लगातार वृद्धि हो रही है. स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो रहा है. लोगों का पोषण स्तर सुधरा है. रोज़गार के साधनों का विस्तार हुआ है. सरकारी योजनाओं का ही नतीजा है कि ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तऱफ होने वाले पलायन में अपेक्षाकृत कमी आई है. मनरेगा जैसी योजना ने गांव के ग़रीब और मेहनतकश लोगों को अपने ही क्षेत्र में रोज़गार की गारंटी दी है. हालांकि इन योजनाओं में भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन लोगों को पता है कि भ्रष्टाचार रोकने का उपाय इसी व्यवस्था के अंदर है, न कि हिंसात्मक तरीक़े का इस्तेमाल कर इसे दूर किया जा सकता है. अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है, लेकिन इसी व्यवस्था के तहत, न कि हिंसात्मक आंदोलन के माध्यम से. कमियां तो हर व्यवस्था में होती हैं, लेकिन जो लोग हमारे देश की व्यवस्था और काम करने के तरीक़ों की आलोचना करते हैं, उन्हें हमारे पड़ोसी देशों के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों की ओर देखना चाहिए. वहां की स्थितियों का जायज़ा लेना चाहिए कि उन देशों में क्या हो रहा है. म्यांमार, अ़फग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं नेपाल जैसे पड़ोसी देशों की स्थिति हमसे काफी बदतर है. यही नहीं, इसके अलावा मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों की ओर भी देखना चाहिए, जहां जनता शासन के विरुद्ध विद्रोह कर रही है. जो लोग भारत की आलोचना करते हैं, वे शायद यह नहीं देख पाते हैं कि भारत जैसे जटिल समाज वाले देश में किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. भारतीय राजनीतिक व्यवस्था ने यह साबित कर दिया है कि किस तरह लोकतंत्र की बहाली की जा सकती है और आगे बढ़ाई जा सकती है, जबकि कई देशों में इसकी त्रुटियां नज़र आ रही हैं. इसके बावजूद भारत के नक्सली अपनी रणनीति में सुधार नहीं कर रहे हैं. वे आज भी मार्क्स के उन्हीं सिद्धांतों पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, जो काफी पुराने और अप्रासंगिक मालूम होते हैं. जिन लोगों के लिए नक्सली सरकार के ख़िला़फ हिंसात्मक लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें ही उनकी विचारधारा की जानकारी नहीं है. नक्सलियों को उनका साथ नहीं मिल पा रहा है. फिर भी उनकी हिंसात्मक कार्रवाई जारी है.

नक्सलियों को यह मालूम होना चाहिए कि किसी भी विचारधारा का चरमपंथी रवैया ख़राब होता है. उन्हें इसके लिए इतिहास से सबक लेना चाहिए. इतिहास गवाह है कि चरमपंथ का परिणाम हमेशा नकारात्मक रहा है. 1990 के दशक में साम्यवाद का खात्मा हो गया. फ्रांसिस फुकुयामा ने उसे इतिहास का अंत कहा था. हालांकि कुछ लोग फुकुयामा  के इस विचार से सहमत नहीं थे. इसके बाद उदार पूंजीवाद के नेतृत्व में खुले व्यापार की नीति आई, जिसे भी पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता है. इसका परिणाम आज वैश्विक मंदी के रूप में देखा जा सकता  है. इसी वजह से आज यूरोप के कई देशों जैसे आयरलैंड, इटली, स्पेन, पुर्तगाल एवं ग्रीस की अर्थव्यवस्था ख़त्म होने की कगार पर है. हमारे संविधान में समाजवादी, कल्याणकारी राज्य की बात कही गई है. इस तरह की राजनीतिक व्यवस्था ही समस्याओं का समाधान कर सकती है. पूर्व और पश्चिम के देशों को इससे सबक लेना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा धरातल पर लाई जाए. अगर सरकार अपने नागरिकों का ध्यान नहीं रखेगी, उसकी आवश्यकताओं का ख्याल नहीं रखेगी तो फिर वे उस सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर देंगे और सत्ता परिवर्तन होगा, जैसा कि इजिप्ट, लीबिया और कई अन्य देशों में देखा जा रहा है. सीरिया में भी परिवर्तन के लिए आंदोलन किए जा रहे हैं. सकारात्मक परिवर्तन की हवा चल रही है. म्यांमार में भी इसका असर देखा जा सकता है.

पूरे विश्व के साम्यवादी या मार्क्सवादी इस बात को समझ रहे हैं और समय के अनुसार ख़ुद में सुधार कर रहे हैं. इसे सोवियत संघ और नेपाल में देखा जा सकता है. नेपाल के साम्यवादियों को भी सुधरना और हथियार छोड़कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होना पड़ा. चीन को भी बदलना पड़ा है. चीन को साम्यवादी राज्य नहीं कहा जा सकता है. आज चीन पूंजीवाद के नियमों का पालन कर रहा है. उसका ढांचा जैसा भी हो, लेकिन आख़िरकार उसे भी लोकतंत्र के नाम का सहारा लेना पड़ता है. उसे भी अपनी शासन व्यवस्था को ठोस लोकतंत्र कहना पड़ता है. छद्म मार्क्सवाद एवं लेनिनवाद कुछ पश्चिमी देशों में आर्थिक सुधार के मुद्दे पर ही जिंदा है. यह 1980 के दशक से ही इन देशों में चल रहा है. घोर मार्क्सवादी विचारधारा वाले लोगों ने आज नक्सलवादी विचारधारा अपना रखी है. उन्हें यह समझना चाहिए कि विचारधारा केवल बोलने की वस्तु नहीं है, बल्कि वह व्यवहारिक भी होनी चाहिए. समय की मांग है कि भारत के नक्सलवादी भी इन बातों को समझें और समाज की मुख्य धारा में शामिल होकर सरकार को उसकी नीतियां बदलने के लिए बाध्य करें. इससे सरकारी नीतियां पहले से ज़्यादा असरदार होंगी. अच्छा होगा कि सरकार के विरुद्ध हिंसात्मक आंदोलन करने वाले हज़ारों नक्सलवादी युवा हिंसा त्याग कर संसदीय लोकतंत्र में शामिल हों. संसदीय लोकतंत्र में उन्हें समाज के लिए काम करने के काफी मौक़े मिलेंगे. वे लोकतांत्रिक तरीक़े से समाज के उन लोगों के लिए कहीं ज़्यादा काम कर सकते हैं, जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए वे हिंसात्मक लड़ाई लड़ने की बात करते हैं. लगभग सभी राज्य सरकारों ने नक्सलवाद छोड़ने वाले लोगों के लिए पुनर्वास नीति बनाई है. पश्चिम बंगाल की सरकार ने भी कई रास्ते दिखाए हैं. वहां कई नक्सलवादी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने हथियार डाले और समाज की मुख्य धारा में शामिल हुए. अन्य नक्सलवादियों को भी यह सलाह है कि वे इसका फायदा उठाएं, समाज की मुख्य धारा में शामिल हों, संसदीय लोकतंत्र का हिस्सा बनें और देश के विकास में अपनी भागीदारी बढ़ाएं. अगर वे अपनी विचारधारा की जड़ें नहीं देखते हैं और उसे सही मायने में लागू करने की कोशिश नहीं करते हैं तो वे कुछ नहीं, केवल फिरौती वसूलने वाले बनकर रह जाएंगे.

(लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं, आलेख में व्यक्त उनके विचार नितांत निजी हैं और जिनका सरकार से कोई संबंध नहीं है)

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