अमिताभ बच्चन को अभी और अपमान सहने पड़ सकते हैं. एक व्यक्ति के नाते उनकी व्यथा को कोई समझना नहीं चाहता. कोई से हमारा मतलब आम जनता से नहीं, बल्कि खास लोगों से है. ये खास लोग कांग्रेस से रिश्ता रखते हैं और किसी हद तक जा सकते हैं, क्योंकि इन्हें लगता है कि इनकी हरकतों से सोनिया गांधी और राहुल गांधी खुश होकर इन्हें शाबाशी देंगे. हम नहीं जानते कि सचमुच सोनिया गांधी और राहुल गांधी खुश हो रहे हैं, पर अगर दोनों में राजनैतिक समझ या सामाजिक समझ है तो उन्हें खुश नहीं होना चाहिए. अमिताभ बच्चन और राजीव गांधी की दोस्ती को उन्हें याद रखना चाहिए, तेजी बच्चन और इंदिरा जी की मित्रता उन्हें भूलनी नहीं चाहिए. सोनिया गांधी की शादी तो अमिताभ बच्चन के पिता के घर से ही हुई थी तथा वह वहां शादी से पहले महीने भर तक रही थीं.

अमिताभ बच्चन को समझना चाहिए कि ये राजनीतिज्ञ बेरहम होते हैं, जिन्हें अपने ही सम्मान की चिंता नहीं तो वे उनके सम्मान की चिंता क्या करेंगे. अमिताभ बच्चन की इज़्ज़त इन राजनेताओं से बहुत ज़्यादा है.

राजनैतिक अलगाव तो पति-पत्नी के बीच भी होता है, भाई-बहनों के बीच भी. लेकिन अगर उनमें आपसी रिश्ते की वह डोर भी टूट जाए, जिसकी वजह से बातचीत होती है या सामाजिक अवसरों पर मिलना होता है तो इसे स़िर्फ और स़िर्फ बदक़िस्मती ही कहा जा सकता है. अमिताभ बच्चन और सोनिया गांधी आपस में क्यों इतने दूर हुए, किसी को नहीं पता. पर दूर हुए तो ठीक, दुश्मन क्यों हुए? अमिताभ बच्चन को राजीव गांधी ने हेमवती नंदन बहुगुणा के खिला़फ इलाहाबाद से चुनाव लड़वाया था. हेमवती नंदन बहुगुण का राजनीति में कद बहुत बड़ा था, लेकिन अमिताभ बच्चन को वोट इलाहाबाद के बच्चों ने दिलवा दिया. उन्होंने अपने मां-बाप की उंगली पकड़ कहा कि इस बार उनके कहने से वोट दे दो. ज़्यादातर ने अपने बच्चों की इच्छा पूरी की. बहुगुणा जी चुनाव हार गए. अमिताभ संसद में थे और उन्हें राजीव गांधी के सबसे विश्वस्त साथी के रूप में देखा जा रहा था. जब वी पी सिंह ने आर्थिक अपराध के खिला़फ वित्त मंत्री के नाते अभियान चलाया तो सारे शिकार पैसे वाले अमिताभ के पास गए. माना जाने लगा कि अमिताभ बच्चन उन्हें बचाने की स़िफारिश राजीव गांधी से कर रहे हैं. इसी बीच बोफोर्स खुला. वी पी सिंह ने पहला हमला अमिताभ पर किया तथा ऐसा माहौल बनने लगा कि बोफोर्स का पैसा अमिताभ के भाई अजिताभ ने रखा है या उसका इंतजाम कर रहे हैं. सबूत किसी बात का नहीं था, पर लोगों ने इसे सच मानना शुरू कर दिया.
अमिताभ बच्चन बुनियादी तौर पर राजनैतिक चमड़ी के नहीं हैं. उन्होंने राजीव गांधी की इच्छा के विपरीत लोकसभा से इस्ती़फा दे दिया और अपने को इस विवाद से अलग रखने की कोशिश की. यहां अरुण नेहरू ने राजीव को समझाया कि कहीं दोस्त ऐसे होते हैं, जो परेशानी में साथ छोड़ दें. राजीव गांधी को भी बुरा लगा. सोनिया गांधी को शायद अरुण नेहरू की बात ज़्यादा सही लगी होगी, जिसे वह आज तक याद रखे हैं. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उन दिनों बहुत छोटे थे. उन्हें वही बात आज याद होगी, जो उन्हें उनकी मां ने बताई होगी, क्योंकि अरुण नेहरू का कोई रिश्ता अब गांधी परिवार से है नहीं.
इन सबसे अलग अमिताभ बच्चन ने अपना स्थान सिनेमा में बहुत ऊंचा बनाया. उनके अभिनय को हिंदुस्तान में बहुत पसंद किया गया. जहां भी भारत के लोग दुनिया में हैं, अमिताभ बच्चन उनके हीरो हैं. उन्हें दुनिया ने स्टार ऑफ मिलेनियम कहा है. अमिताभ व्यक्तिगत ज़िंदगी में कैसे बोलते हैं नहीं पता, पर जब वह सार्वजनिक जगहों पर होते हैं तो उनकी भाषा शालीन और गर्व रहित होती है. साठ से ज़्यादा की उम्र के बावजूद वह जहां होते हैं, सबसे ज़्यादा आकर्षित करते हैं. आज भी जहां जाते हैं, भीड़ उन्हें देखने के लिए इकट्ठी हो जाती है. मुंबई में जाने वाले यात्री आज भी उनके घर के बाहर शाम के समय इकट्ठा हो जाते हैं, ताकि अमिताभ बच्चन की एक झलक उन्हें मिल जाए. ऐसा अवसर किसी दूसरे कलाकार को नियति ने हिंदुस्तान में तो कम से कम नहीं दिया है.
अमिताभ बच्चन जब परेशानी में थे, उनका बाल-बाल क़र्ज़ में डूब गया था तथा उनका बंगला नीलाम होने वाला था. उस समय अमर सिंह ने उनकी मदद की तथा सुब्रत राय सहारा से उन्हें बीस करोड़ रुपये दिलवाए. यह अमिताभ बच्चन के जीवन का सबसे भावुक समय था, जब सबने उनका साथ छोड़ दिया था. उन्होंने उस मदद को हमेशा याद रखा और अमर सिंह का साथ देना प्रारंभ किया. अमर सिंह समाजवादी पार्टी के ज़रिए राजनीति में तेज़ी से कदम बढ़ा रहे थे, पर अमिताभ बच्चन ने उनसे सा़फ कह दिया कि वह राजनीति में नहीं जाएंगे, न किसी सभा में और न ही किसी राजनैतिक समारोह में. अमिताभ ने अपने इस रु़ख को आज तक कायम रखा, हालांकि उन पर बहुत दबाव पड़ा कि वह राजनैतिक सभाओं में जाएं.
अमिताभ से उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार ने कहा कि विज्ञापन में वह आएं. अमिताभ बच्चन सरकारी विज्ञापनों में आए, लेकिन पार्टी के विज्ञापनों में नहीं आए. अमिताभ ने कभी सोनिया गांधी के परिवार पर हमला नहीं किया. अमिताभ ने जया बच्चन को भी हमेशा हमलावर न होने की सलाह दी. जया बच्चन को राज्यसभा में जाने का अमिताभ बच्चन ने कभी खुशी से समर्थन नहीं किया, क्योंकि वह जानते थे कि राजनीति उनके परिवार के लिए नहीं है.
अमिताभ बच्चन ने गुजरात पर्यटन के ब्रांड एंबेसडर बनने की स्वीकृति क्या दी, तू़फान आ गया. वह अहमदाबाद गए थे नरेंद्र मोदी को अपनी फिल्म पा दिखाने, क्योंकि उन्हें वह फिल्म टैक्स फ्री करानी थी. उनसे प्रस्ताव किया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. अमिताभ बच्चन सा़फ थे कि उन्हें राजनैतिक समारोह में मोदी के साथ शामिल नहीं होना है. पर अमिताभ बच्चन के अमर सिंह से रिश्तों पर खार खाए बैठे कांग्रेस के छुटभइये नेताओं को हमले का मौक़ा मिल गया.
इसके बाद आया मुंबई में वरली सी लिंक के दूसरे पुल के उद्घाटन का मौक़ा. इसमें उन्हें शरद पवार की पार्टी के मंत्री और कॉरपोरेशन के अध्यक्ष ने निमंत्रित किया. अमिताभ आए. मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण भी आए. दोनों अच्छी तरह मिले. मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह को बुरा लगा, क्योंकि उन्हें इस समारोह में नहीं बुलाया गया था. उन्होंने अमिताभ बच्चन को बुलाए जाने का सार्वजनिक विरोध कर दिया. राजनीति कांग्रेस के भीतर थी, निशाना ज़बरदस्ती अमिताभ बच्चन पर साधा गया.
दिल्ली में सेव अर्थ कैंपेन में अभिषेक बच्चन को बुलाया गया था, शीला दीक्षित हंसती-मुस्कराती नज़र आती थीं, पर मुंबई की घटना के बाद अभिषेक बच्चन की तस्वीरें ही हटा दी गईं. अचानक अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन देश में सबसे पापी इंसान क़रार दे दिए गए. इस सारी कवायद में अमिताभ बच्चन का दोष है कहां? अमिताभ बच्चन को समझना चाहिए कि ये राजनीतिज्ञ बेरहम होते हैं, जिन्हें अपने ही सम्मान की चिंता नहीं तो वे उनके सम्मान की चिंता क्या करेंगे. अमिताभ बच्चन की इज़्ज़त इन राजनेताओं से बहुत ज़्यादा है. अच्छा हो कि अमिताभ बच्चन राजनेताओं से जुड़े समारोह में न जाया करें. हम यह सलाह इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि अमिताभ बच्चन ने विश्व सिनेमा में भारत का गौरवशाली प्रतिनिधित्व किया है. उन्हें दुनिया भर के हिंदुस्तानियों का प्यार मिला है.
ज़िंदगी के इस मोड़ पर उन्हें आगे बढ़ने की जरूरत है, न कि छिछोरे विवादों में उलझने की. भाजपा उनके पक्ष में बयान दे रही है. अमिताभ बच्चन को समझ में आ रहा होगा कि भाजपा उनका सम्मान नहीं, अपमान कराना चाह रही है. भाजपा और कांग्रेस से एक छोटा अनुरोध है कि आप अमिताभ बच्चन का सम्मान नहीं कर सकते तो कम से कम अपमान तो मत कीजिए. अमिताभ बच्चन का अपमान करने से अमिताभ बच्चन का कम बिगड़ेगा, उनका चेहरा ज़्यादा बिगड़ेगा, जो उनके अपमान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेगा. अमिताभ बच्चन को अमिताभ बच्चन बने रहने दीजिए.

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