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अल्पसंख्यक आयोग के प्रति सरकारों की बेरुख़ी
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अल्पसंख्यक आयोग के प्रति सरकारों की बेरुख़ी

मध्य प्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सभी काम अर्से से रुके पड़े हैं. शिक़ायतें और मामले दर्ज होना सभी कुछ बंद है. शिक़ायतें अगर दर्ज भी हो रही हैं तो उनका निराकरण व़क्त पर नहीं हो पा रहा है. शिक़ायती आवेदनपत्र तो किसी तरह जमा हो जाते हैं, लेकिन उनके निराकरण के लिए बेंच गठित करने और उन पर फैसला लेने का काम फिलवक्त बंद है. स्थिति यह है कि अल्पसंख्यकों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं के प्रस्ताव शासन को भेजने और उनकी समीक्षा का कार्य सूबे में लगभग ठप्प है. एक वजह आयोग का अध्यक्षविहीन होना भी है. आयोग के पिछले अध्यक्ष का कार्यकाल 23 अक्टूबर, 2008 को ख़त्म हो गया था. तबसे लेकर आज तक यह पद खाली पड़ा है. 2 साल होने वाले हैं, लेकिन राज्य की भाजपा सरकार को आयोग की बिल्कुल सुध नहीं है. राज्य अल्पसंख्यक आयोग शायद दूर तक उसकी प्राथमिकताओं में नहीं है.

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के बाद जब देश के विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यक आयोगों का गठन किया तो उसके पीछे एकमात्र मक़सद अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण, उनके साथ हो रही घटनाओं की निष्पक्ष जांच और उनसे जुड़ी सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार आदि था. सरकार अपने मक़सद में बहुत हद तक कामयाब भी रही, लेकिन कई राज्यों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. मौजूदा स्थिति यह है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा बार-बार कहने के बावजूद 13 राज्यों ने अपने यहां अभी तक अल्पसंख्यक आयोग गठित नहीं किया है.

मध्य प्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1996 के मुताबिक़, आयोग के चेयरमैन को ही मीटिंग बुलाने और आवेदनों पर निर्णय करने का अधिकार है. ज़ाहिर है, जब आयोग में चेयरमैन ही नहीं होगा तो कार्रवाई कौन करेगा? अध्यक्ष के अभाव में आयोग पूरी तरह पंगु बनकर रह गया है. नियमित समीक्षा न होने के कारण केंद्र सरकार की योजनाओं का फायदा अल्पसंख्यकों को नहीं मिल पा रहा है, जबकि यह आयोग का ही दायित्व है कि वह सूबे के अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण की पहल करे. मामला स़िर्फ शिक़ायतों की दर्जगी और उनके निराकरण तक ही सीमित नहीं है, बीते तीन सालों में न तो आयोग का वार्षिक प्रतिवेदन बना है और न उसे विधानसभा के पटल पर रखा गया. मालूम हो कि आयोग हर साल 31 मार्च को समाप्त होने वाली अवधि का वार्षिक प्रतिवेदन राज्य सरकार के सामने पेश करता है, जिसे विधानसभा के पटल पर रखा जाता है. प्रतिवेदन में आयोग द्वारा साल भर के दौरान की गई गतिविधियों और कार्यकलापों का ब्योरा होता है. जब सूबे में आयोग किसी भी तरह सक्रिय नहीं है, न कोई गतिविधि, न कोई कार्य तो वार्षिक प्रतिवेदन किसका बनेगा और कैसे बनेगा, यह बात आसानी से समझी जा सकती है. अल्पसंख्यकों के कल्याण के मामले में आज भले ही राज्य का अल्पसंख्यक आयोग पीछे छूट गया हो, पर कभी मध्य प्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग पूरे देश में मॉडल बनकर उभरा था. मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल के दौरान आयोग के आठ सूत्रीय अल्पसंख्यक कल्याण एजेंडे ने देश के अंदर मध्य प्रदेश की एक अलग पहचान बनाई थी. राज्य अल्पसंख्यक आयोग की अनुशंसा पर उस व़क्त राज्य सरकार ने कई अहम फैसले लिए, जो आगे चलकर मील का पत्थर साबित हुए. मसलन मदरसा बोर्ड का गठन, अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के लिए पृथक अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की स्थापना, व़क़्फ संपत्तियों के विवादों के निराकरण के लिए व़क़्फ ट्रिब्यूनल की स्थापना, मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के लिए मदरसा आधुनिकीकरण योजना, जैन समुदाय को राज्य में अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान करना, दंगा पीड़ितों के आश्रितों की शासकीय सेवाओं में भर्ती, अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को नए स्कूल-कॉलेज खोलने के लिए नियमों में छूट, उर्दू भाषा की तऱक्क़ी के लिए उर्दू शिक्षकों के नए पदों को मंजूरी और नियुक्ति. यही नहीं, सेंट्रल व़क़्फएक्ट 1995 को अपने यहां लागू करने के मामले में भी मध्य प्रदेश सबसे अव्वल नंबर पर था.

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के बाद जब देश के विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यक आयोगों का गठन किया तो उसके पीछे एकमात्र मक़सद अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण, उनके साथ हो रही घटनाओं की निष्पक्ष जांच और उनसे जुड़ी सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार आदि था. सरकार अपने मक़सद में बहुत हद तक कामयाब भी रही, लेकिन कई राज्यों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. मौजूदा स्थिति यह है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा बार-बार कहने के बावजूद 13 राज्यों ने अपने यहां अभी तक अल्पसंख्यक आयोग गठित नहीं किया है. इनमें गुजरात, उड़ीसा और हरियाणा अव्वल नंबर पर है. जबकि गुजरात और उड़ीसा दो ऐसे राज्य हैं, जहां बीते एक दशक के दौरान अल्पसंख्यकों को काफी उत्पीड़न झेलना पड़ा, मगर अफसोस की बात यह है कि इस मामले में मोदी और नवीन पटनायक सरकारें कोई क़दम नहीं उठा रही हैं. महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मणिपुर जैसे राज्यों ने अपने यहां अल्पसंख्यक आयोग तो गठित कर लिए, लेकिन उन्हें संवैधानिक अधिकारों से लैस नहीं किया. ज़ाहिर है, बिना संवैधानिक अधिकारों के उक्त आयोग महज़ सजावटी दरबार बनकर रह गए हैं.

हालांकि अल्पसंख्यक आयोग के ज़िम्मे अल्पसंख्यकों के ख़िला़फ किसी भेदभाव की वजह से पैदा होने वाली समस्याओं का अध्ययन, उन्हें दूर करने के लिए उपायों की स़िफारिश, राज्य सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपायों की स़िफारिश, उनके सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास से संबंधित विषयों का अध्ययन, अनुसंधान और विश्लेषण करना आदि महत्वपूर्ण कार्य हैं, लेकिन आयोग में अल्पसंख्यकों से संबद्ध सभी समस्याएं-मामले आते रहते हैं. इंसा़फ की आस में लोग अल्पसंख्यक आयोग के दरवाजे पर दस्तक देते रहते हैं. ज़ाहिर है, ऐसे में आयोग के अभाव में अल्पसंख्यकों को उपयुक्त फोरम में अपनी बात कहने का मौक़ा नहीं मिलता. मध्य प्रदेश में अध्यक्ष का पद खाली पड़ा है, इससे आयोग की समूची कार्यप्रणाली प्रभावित है. महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मणिपुर में राज्य अल्पसंख्यक आयोग अधिकार विहीन हैं. नतीजतन इनका गठन जिन उद्देश्यों के लिए किया गया था, वे पूरे नहीं हो पा रहे हैं. अब आख़िरी उम्मीद केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री से बंधती है कि वे इस मामले में जल्द से जल्द हस्तक्षेप करें, वरना इन राज्यों में अल्पसंख्यक आयोग के प्रति सरकारों की बेरुख़ी बदस्तूर जारी रहेगी.

(लेखक अल्पसंख्यक मामलों के जानकार हैं)

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