Now Reading:
अब बदलाव जरूरी है
Full Article 3 minutes read

अब बदलाव जरूरी है

हमारे देश में कई व्यवस्थाएं ऐसी हैं जो बाबा आदम के जमाने से चल रही हैं. वर्तमान में स्थितियां बदल चुकी हैं, इसके हिसाब से व्यवस्था में बदलाव होना ज़रूरी होता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है. अब पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट को ही ले लीजिए.

सिपाही छुट्टी मांगता है तो उसमें तमाम अड़चने आती हैं. ऐसे में उसके दिमाग़ में तमाम बातें आती हैं. वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थों से ऐसे बात करनी चाहिए कि उन्हें मानसिक सांत्वना मिले. विदेशों में कांस्टेबिल जनरल तक से बात कर सकता है. अपने यहां सिपाही को डीआईजी से बात करने के लिए सोचना पड़ता है.

भारतीय गणतंत्र को स्थापित हुए 61 साल हो रहे हैं, लेकिन अब भी अंग्रेजों के जमाने का पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट ही चल रहा है. समय के साथ इसमें ज़रूरी बदलाव न होने से तमाम दुश्वारियां सामने आती हैं. और तो और अधिकांश पुलिस उच्चाधिकारियों का अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार हर जगह अच्छा नहीं रहता. सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक भारत सिंह मानते हैं कि पुलिस पुराने जमाने में जी रही है. दूसरे देशों की पुलिस हमारी पुलिस से बहुत आगे है. मोहम्मदाबाद के रोहिला में रह रहे भारत सिंह से 1861 में बने पुलिस रेग्यूलेशन एक्ट के संबंध में चर्चा हुई तो उन्होंने बदलते वक्त के साथ इसमें आ रही खामियों को ब़खूबी रेखांकित किया. पूर्व आईजी कहते हैं कि पुलिस का जनता के प्रति व्यवहार बहुत सख्त रहता है. आम आदमी खाकी से डरता है. थानों में भले आदमियों खास तौर से महिलाओं के बैठने की जगह नहीं है. क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं होती कि फरियाद लेकर गए पांच-दस लोगों के बैठने की व्यवस्था हो.

रिटायर्ड आईजी कहते हैं कि मामलों की विवेचना जल्द निपटनी चाहिए. पुलिस जांच अधिकारियों के पास प्राय: तमाम विवेचनाएं लंबित रहती हैं. दूसरे पुलिस में भर्ती का तरीक़ा प्रॉपर नहीं है. इसमें भ्रष्टाचार की तमाम शिकायतें आती हैं. इस समय पुलिस परीक्षण में लेफ्ट-राइट (परेड) पर बहुत अधिक समय लगता है. इस समय में कटौती कर क़ानून की जानकारी देने के लिए किया जा सकता है. कई बार कांस्टेबिल को क़ानून की धाराओं की जानकारी नहीं रहती. वह कहते हैं कि कई बार आदमी को यह महसूस होता है कि पुलिस में भर्ती होकर उसने कोई बड़ी ग़लती की है. सिपाही छुट्टी मांगता है तो उसमें तमाम अड़चने आती हैं. ऐसे में उसके दिमाग़ में तमाम बातें आती हैं. वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थों से ऐसे बात करनी चाहिए कि उन्हें मानसिक सांत्वना मिले. विदेशों में कांस्टेबिल जनरल तक से बात कर सकता है. अपने यहां सिपाही को डीआईजी से बात करने के लिए सोचना पड़ता है.

भारत सिंह सितंबर 1947 में कांस्टेबिल से पुलिस में भर्ती हुए. इसके बाद सीओ और एसपी बने. 1969 में वह महानिरीक्षक पद पर पहुंचे. शिमला समझौता के समय उन्हें विशेष ड्यूटी पर भेजा गया था. 1974 में वह सेवानिवृत्त हो गए. 8 फरवरी को 100 वर्ष की आयु पूरी करने जा रहे भारत सिंह सामाजिक जीवन में भी सक्रिय हैं.

पुलिस के आंतरिक सिस्टम में सुधार होना ज़रूरी है. लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं है. अगर सही समय पर बदलाव किए गए होते तो आज इनकी छवि कुछ और होती.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.