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आतंकवादः भगवा, हरा या काला?
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आतंकवादः भगवा, हरा या काला?

क्‍या आतंकवाद पर कोई लेबिल चस्पा किया जा सकता है? क्या आतंकवाद को किसी रंग से जोड़ा जा सकता है, विशेषकर किसी ऐसे रंग से, जो समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हो? इस बहस की शुरुआत हुई केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम के एक वक्तव्य से. शीर्ष पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, हाल में भगवा आतंकवाद का पर्दाफाश हुआ है और इसे पूर्व में हुए कई बम धमाकों के लिए ज़िम्मेदार बताया जा रहा है. मेरी सलाह है कि सतत सतर्क रहें और आतंकवाद से लड़ने की अपनी क्षमता को राज्य एवं केंद्र दोनों स्तरों पर बेहतर बनाते रहें (25 अगस्त, 2010).

जहां तक भगवा आतंकवाद शब्द का सवाल है, जिसका इस्तेमाल चिदंबरम के अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार एवं लेखक कर रहे हैं, हमें इसकी पृष्ठभूमि को समझना होगा. भगवा शब्द पर हिंदू राष्ट्र के पैरोकार अपना कॉपीराइट समझते हैं. ऐसा लगता है, मानों हिंदुत्व के पैरोकारों ने भगवा को पेटेंट करा लिया हो.

गृहमंत्री के इस वक्तव्य पर हिंदूवादी पार्टियों, विशेषकर हिंदू राष्ट्र की पैरोकार भाजपा एवं शिवसेना ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. कांग्रेस भी इस मुद्दे पर दुविधा में नज़र आई. पार्टी के एक प्रवक्ता ने गृहमंत्री के वक्तव्य का समर्थन किया तो दूसरे ने पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हुए कहा कि आतंकवाद का केवल एक ही रंग होता है और वह है काला. भाजपा प्रवक्ता ने चिदंबरम से माफी मांगने के लिए कहा और शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने गृहमंत्री के इस्ती़फे की मांग कर डाली. शिवसेना के बूढ़े शेर बाल ठाकरे ने जानना चाहा कि कश्मीर एवं सिख विरोधी दंगों में दिल्ली में जो ख़ून बहा, उसका रंग क्या था? चिदंबरम के वक्तव्य की पृष्ठभूमि में हैं मालेगांव बम धमाके (सितंबर 2008) में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी दयानंद पांडे एवं अन्य हिंदूवादी कार्यकर्ताओं की संलिप्तता उजागर होने के बाद हुए कई खुलासे, जिनसे यह साफ हो गया कि विभिन्न हिंदूवादी संगठन कई सालों से देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकी हमले करते आ रहे हैं. महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख स्वर्गीय हेमंत करकरे ने सबसे पहले इन भगवा वस्त्रधारियों के काले कारनामों का पर्दाफाश किया. साध्वी प्रज्ञा, स्वामी दयानंद, स्वामी असीमानंद आदि के साथ लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, पूर्व मेजर उपाध्याय एवं कई अन्य लोग हिंदू राष्ट्र की स्थापना के अपने लक्ष्य को पाने के लिए बम बनाते और निर्दोषों का ख़ून बहाते रहे हैं. अभिनव भारत, सनातन संस्था एवं बजरंग दल उन संगठनों में शामिल हैं, जिन्होंने देश में कई स्थानों पर बम विस्फोट किए.

हिंदू राष्ट्र के झंडाबरदारों की बमों में दिलचस्पी जब पहली बार उजागर हुई थी, तब भाजपा-शिवसेना शिविर में हड़कंप मच गया था. शिवसेना के मुखपत्र सामना ने लिखा था, हम इस मामले की जांच कर रहे हेमंत करकरे के मुंह पर थूकते हैं. भाजपा के एक प्रमुख नेता ने करकरे को देशद्रोही बताया था. मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले के दौरान करकरे को मौत के घाट उतार दिया गया. उनकी हत्या रहस्यमय परिस्थितियों में हुई. अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन केंद्रीय मंत्री ए आर अंतुले ने भी कहा कि आतंकवाद के अलावा कुछ और भी करकरे की मौत के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है. मालेगांव खुलासे और करकरे की रहस्यमय मौत के बाद ही भगवा-हिंदू आतंकवाद शब्द प्रचलन में आए. इस आतंकवाद को हिंदू धर्म एवं पवित्र भगवा रंग से जोड़ने के पीछे एक कारण यह भी था कि इस्लामिक-जिहादी आतंकवाद शब्द का लंबे समय से प्रयोग होता आ रहा था. इस शब्द को अमेरिकी मीडिया ने गढ़ा था और धीरे-धीरे इसका व्यापक प्रयोग होने लगा. इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदू आतंकवाद और इस्लामिक आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग अनुचित है. जहां तक जिहादी आतंकवाद शब्द का संबंध है, वह इसलिए ठीक नहीं है, क्योंकि जिहाद का मरने-मारने या ख़ूनख़राबे से कोई लेना-देना नहीं है. जिहाद तो स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाने के आंतरिक संघर्ष का नाम है.

जहां तक भगवा आतंकवाद शब्द का सवाल है, जिसका इस्तेमाल चिदंबरम के अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार एवं लेखक कर रहे हैं, हमें इसकी पृष्ठभूमि को समझना होगा. भगवा शब्द पर हिंदू राष्ट्र के पैरोकार अपना कॉपीराइट समझते हैं. ऐसा लगता है, मानों हिंदुत्व के पैरोकारों ने भगवा को पेटेंट करा लिया हो. हम सब जानते हैं कि हिंदुत्व दरअसल कोई धर्म नहीं, धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति है. हिंदुत्व शब्द के जनक सावरकर थे. उनके अनुसार, हिंदुत्व में हिंदू धर्म, आर्य नस्ल, वैदिक संस्कृति एवं सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक का भूभाग आदि यानी इन सबका समावेश है. हिंदुत्व की तुलना उस राजनैतिक इस्लाम से की जा सकती है, जो मुस्लिम लीग का वैचारिक आधार था. मुस्लिम लीग का झंडा हरे रंग का था, जबकि हिंदू महासभा ने अपने लिए भगवा झंडा चुना था. आरएसएस ने 1925 में अपनी स्थापना के साथ ही हिंदुत्व को हिंदू राष्ट्र के अपने लक्ष्य को पाने का हथियार बना लिया था. भारतीय तिरंगे की जगह उसने भी भगवा झंडे को अपनाया.

हिंदू परंपरा में भगवा रंग त्याग, बलिदान एवं समर्पण का प्रतीक माना जाता है, परंतु संघ ने इस रंग पर अपना अधिकार घोषित कर दिया. उसने भगवा रंग का इस्तेमाल अपने उन राजनैतिक लक्ष्यों को पाने के लिए किया, जो राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्यों से न स़िर्फ अलग थे, बल्कि उनके विरोधी भी थे. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन बहुवादी, धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध था. अपना हरा झंडा फहराते हुए मुस्लिम लीग इस्लामिक राष्ट्र मांग रही थी, जबकि भगवा झंडे के तले इकट्ठा संघी हिंदू राष्ट्र का नारा बुलंद कर रहे थे. मुस्लिम लीग एवं आरएसएस दोनों ही भारत को पीछे ले जाना चाहते थे, उस युग में, जिसमें प्रजातंत्र एवं मानवाधिकार की अवधारणाएं ही नहीं थीं. उस युग में, जिसमें महिलाओं एवं दलितों को ऊंची जातियों के पुरुषों की प्रभुता को स्वीकार करना होता था. 1980 के दशक में संघ परिवार ने राम मंदिर आंदोलन शुरू किया. इस आंदोलन में धार्मिक शब्दावली एवं धार्मिक प्रतीकों का राजनैतिक हितसाधन के लिए खुलकर इस्तेमाल किया गया. संघ परिवार के एजेंडे में भारत पर मनु स्मृति के क़ानूनों को लादना शामिल है. संघ परिवार यह मानता है कि प्राचीन भारत की सामाजिक व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ थी. आश्चर्य नहीं कि स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व पर आधारित हमारे संविधान के निर्माता डॉ. अंबेडकर ने मनु स्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया. संघ और उसके साथियों ने 1980 एवं 1990 के दशकों में भगवा झंडे का भरपूर इस्तेमाल किया. राम मंदिर और हिंदू राष्ट्र के समर्थन में देश भर में लगाए गए स्टीकरों की पृष्ठभूमि में भगवा रंग था. संघ के पास भगवा वस्त्रधारी साधु-साध्वियों की छोटी-मोटी सेना है, जिसे वह ज़रूरत पड़ने पर तैनात करता रहता है. ये साधु सेना खुलकर कहती रही है कि हिंदू धर्म ग्रंथ संविधान के ऊपर हैं और आस्था से जुड़े मुद्दे अदालती फैसलों से नहीं तय हो सकते.

कुल मिलाकर धार्मिक भावनाओं से जुड़े भगवा रंग का संघ परिवार ने अपनी राजनीति में इतना अधिक इस्तेमाल किया कि भगवा रंग एक प्रकार से उसकी रीतियों-नीतियों का प्रतीक बन गया. एनडीए शासनकाल में स्कूली पाठ्‌य पुस्तकों और शिक्षा पद्धति का सांप्रदायिकीकरण करने के मुरली मनोहर जोशी के अभियान को शिक्षा के भगवाकरण की संज्ञा दी गई थी. यह निहायत अफसोस की बात है कि त्याग का प्रतीक यह पवित्र रंग एक राजनैतिक विचारधारा की पहचान बन गया है. चिदंबरम के हालिया बयान को भगवा रंग और संघ परिवार की राजनीति के आपसी जुड़ाव की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. हमारी आज की दुनिया में केवल एक महाशक्ति है और इस महाशक्ति ने तेल एवं दुनिया के अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़ा जमाने के अपने कुटिल अभियान को धर्म का जामा पहना दिया है. इसी उद्देश्य से सभ्यताओं के टकराव की बात कही जा रही है और इसी उद्देश्य से इस्लाम एवं मुसलमानों का दानवीकरण किया जा रहा है. भारत में भी इस्लाम को हौव्वा बना दिया गया है. अब समय आ गया है कि हम धर्मों की पवित्रता की रक्षा करें और धार्मिक प्रतीकों, रंगों एवं शब्दावली के राजनीति में इस्तेमाल का विरोध करें.

(लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक हैं)

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