आज हर कोई न्यायपालिका के उत्तरदायित्व की बात कर रहा है. यानी न्यायपालिका से जुड़े हर एक तंत्र को उत्तरदायी कैसे बनाया जा सके. जज इंक्वायरी एक्ट विधेयक में संशोधन की बात चल रही है, जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक परिषद गठित करने की बात है,  जो आरोपों के घेरे में आए जजों के ख़िला़फ जांच कर सके. सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर रही है. इसमें कोई शक नहीं है कि जजों की जवाबदेही तय करने और उसे बढ़ाने की ज़रूरत है, क्योंकि जजों और ख़ासकर उच्च न्यायालयों में बैठे जजों की ईमानदारी को लेकर आम आदमी के मन में सवाल पैदा हो रहे हैं. यह बात सुप्रीमकोर्ट की एक बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू एवं ज्ञान सुधा मिश्रा थे, के एक कथन से और भी पुख्ता होती है. इन दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा था कि सिंगल बेंच द्वारा दिए गए कुछ अतार्किक और चौंका देने वाले निर्णयों से इस देश के आम आदमी का विश्वास भीतर तक हिल गया है.

ऑर्डर लिखते हुए जस्टिस काटजू कहते हैं कि हैमलेट में शेक्सपीयर ने लिखा है कि डेनमार्क के राजतंत्र में कुछ सड़ रहा है और यही बात इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बारे में कही जा सकती है कि वहां कुछ सड़ रहा है. बेंच ने आगे कहा, हमें ऐसा कहते हुए दु:ख हो रहा है, लेकिन यह सच है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कुछ ख़ास जजों की ईमानदारी को लेकर शिक़ायतें आ रही हैं.

ऑर्डर लिखते हुए जस्टिस काटजू कहते हैं कि हैमलेट में शेक्सपीयर ने लिखा है कि डेनमार्क के राजतंत्र में कुछ सड़ रहा है और यही बात इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बारे में कही जा सकती है कि वहां कुछ सड़ रहा है. बेंच ने आगे कहा, हमें ऐसा कहते हुए दु:ख हो रहा है, लेकिन यह सच है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कुछ ख़ास जजों की ईमानदारी को लेकर शिक़ायतें आ रही हैं. कुछ जजों के नाते-रिश्तेदार उसी अदालत में प्रैक्टिस कर रहे हैं और शुरू के ही कुछ सालों में इन जजों के बेटे या संबंधी करोड़पति बन जाते हैं, अच्छा-ख़ासा बैंक बैलेंस बना लेते हैं, उनके पास महंगी कारें आ जाती हैं, वे आलीशान घर बना लेते हैं और एक विलासितापूर्ण ज़िंदगी जी रहे हैं. अब वे दिन गए, जब किसी जज का रिश्तेदार या बेटा अपने संबंधों का फायदा नहीं उठा पाता था और उसे भी अन्य वकीलों की तरह ही संघर्ष करना पड़ता था.

पीएफ घोटाले में फंसे जजों की जांच चल रही है और दिनाकरन पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया भी जारी है. प्रशांत भूषण को हालांकि सुप्रीमकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन के ख़िला़फ एक टिप्पणी के लिए अवमानना का मामला झेलना पड़ रहा है, लेकिन उन्हें अपने पिता वरिष्ठ वकील एवं पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण का समर्थन मिल रहा है. प्रशांत भूषण अपने उस कथन पर क़ायम हैं, जो के जी बालाकृष्णन के कुछ संबंधियों से जुड़ा था. यह मामला भी शक पैदा करता है. प्रशांत भूषण द्वारा लगाए गए आरोपों का समर्थन जस्टिस अय्यर ने भी किया है. उक्त चंद उदाहरण ही पूरी स्थिति को समझने के लिए काफी हैं. हालांकि ऐसे मामले अभी और भी हो सकते हैं, जो अब तक छुपे हो सकते हैं. लेकिन इसकी वजह से आम आदमी का हित ख़तरे में पड़ गया है और कहीं ख़त्म होता नज़र आ रहा है. आम आदमी एक मुक्त और साफ-सुथरी न्यायपालिका की अपेक्षा तो रखता ही है, साथ ही यह भी चाहता है कि न्याय मिलने की प्रक्रिया और तेज हो.

आज तीन मिलियन से ज़्यादा मामले उच्च न्यायालयों में लंबित हैं. साथ ही निचली अदालतों में क़रीब 26.3 मिलियन मामले लंबित हैं. जहां तक सुप्रीम कोर्ट की बात है, यहां भी 31 दिसंबर, 2010 तक के आंकड़ों के मुताबिक़, लगभग 54,562 मामले लंबित हैं, जिनमें से 35,283 मामले एक साल से ज़्यादा समय से लंबित हैं. उक्त आंकड़े आम आदमी का न्यायपालिका में विश्वास कम करने का काम कर रहे हैं. दो नए मामलों ने आम आदमी की निराशा को और बढ़ा दिया है. एक मामले में जहां रॉ के एक पूर्व महिला अधिकारी ने ख़ुद को कोर्ट रूम में बंद करके ख़ूब शोरगुल मचाया. हालांकि उसकी इस हरकत को मनोवैज्ञानिक विकार से जोड़कर देखा गया और उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया गया, लेकिन असल बात यह थी कि वह अपने मामले में न्याय मिलने में हो रही देरी से निराश हो गई है. एक अन्य मामले में एक याचिकाकर्ता ने बांबे हाईकोर्ट को 20 हज़ार रुपये का चेक भेजकर बदले में 60 मिनट की सुनवाई का व़क्त मांगा. इस मामले में डिवीज़न बेंच ने उससे लिखित में क्षमा मांगने को कहा. पुणे के अनिल तिलोतेकर ने यह चेक भेजा था और सुनवाई के लिए जल्दी समय मांगते हुए उसने पत्र भी लिखे थे और ईमेल भी भेजा था.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं)

Leave a comment

Your email address will not be published.