पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के हाथ से सत्ता ऐसे फिसल गई जैसे मुट्ठी में से रेत। जिसका सबसे बड़ा कारण अपने ही एक बड़े नेता और 22 विधायकों का विद्रोह है। क्योंकि सत्ता के चाटुकारओं ने कमलनाथ को एक ऐसा चश्मा लगा दिया था जिससे सिर्फ वही दिखाई देता था, जिसे यहां मौकापरस्त लोग दिखाना चाहते थे। कमलनाथ की टीम में ऐसे परदेसी पंछियों की कमी नहीं थी जो सिर्फ सत्ता का सुख भोगने के लिए ही आए थे और सत्ता के जाने के बाद फुर्र हो गए। कांग्रेस की डेढ़ माह की सरकार में कांग्रेस के उस कर्मठ नेता और कार्यकर्ता को दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया जो बरसों से विपक्ष में रहकर सत्ता के कोपभाजन का शिकार हुआ। आज वही कार्यकर्ता एक बार फिर उपचुनाव से उम्मीद लगाए बैठा है कि कुछ अच्छा होगा। कमलनाथ की आंखें खुलेगी और सत्ता के दलालों को दूर कर देंगे, जो पैराशूट से आएं। क्योंकि सिंधिया के जाने के बाद कांग्रेस की मध्यप्रदेश में वैसी ही हालत हो सकती है जैसी उत्तर प्रदेश में है। जिसका सबसे बड़ा कारण प्रदेश के बड़े नेताओं में अब भी गुटबाजी होना है। सिंधिया के जाने के बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का ही बड़ा गुट माना जाता है । अजय सिंह का विरोध करना भी कमलनाथ के लिए घातक साबित हो सकता है, क्योंकि आपसी प्रतिद्वंदिता के चक्रव्यूह में कमलनाथ पूरी तरह फंस चुके हंै। जिससे बाहर निकालना आसान काम नहीं है। वैसे कमलनाथ की गिनती देश के दूरदर्शी और विकास की सोच रखने वाले ऐसे नेताओं में होती है जिनकी जड़ें बहुत मजबूत मानी जाती है। जिसकी झलक कमलनाथ के डेढ़ साल के कार्यकाल में साफ देखने को मिली। जब अतिक्रमण विरोधी मुहिम, शुद्ध के लिए युद्ध जैसी मुहिम चलाई गई। इसका व्यापक असर हुआ और जनता के सामने कमलनाथ की छवि विकास पुरुष की बनती गई । उसी बीच हनीट्रैप कांड में अच्छे-अच्छे  के छक्के छुड़ा दिए पर अब सरकार जाते ही सब गंगा में डुबकी लगाकर पवित्र हो गई और लगभग सारे मामले दब गए हैं। छिंदवाड़ा में कमलनाथ के गायब होने के पोस्टर लगाने के पीछे भी कमलनाथ को सिर्फ छिंदवाड़ा तक सीमित रखना ही है, क्योंकि भोपाल में बैठकर उपचुनाव की रणनीति पर व्यापक तौर पर व्यू रचना की जा रही है। कोरोना के बाद प्रदेश में 24 उपचुनाव के परिणाम ही कमलनाथ का प्रदेश में भविष्य तय करेंगे, जिस की संभावनाएं धूमिल होती दिखाई दे रही है। ऐसे में दिग्विजय सिंह गुट ही प्रदेश में कांग्रेस का सिरमौर रहेगा जिस की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता । कमलनाथ भी इस बात को सत्ता गंवाने के बाद समझ गए तभी तो उन्होंने इशारों ही इशारों में कह दिया कि हम भरोसे में रह गए।

सचिन नाथ