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हच, वोडाफ़ोन और कपिल सिब्बल : क्या यह सिर्फ भ्रष्टाचार है ?
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हच, वोडाफ़ोन और कपिल सिब्बल : क्या यह सिर्फ भ्रष्टाचार है ?

कपिल सिब्बल चाहते हैं कि वोडाफोन जैसी बड़ी कंपनी को कर माफ़ी दी जाए. यह पैसा इस देश की जनता का है, उसे सरकारी ख़ज़ाने में जाना चाहिए, उसे क्यों वे एक कंपनी द्वारा हड़पने देना चाहते हैं? इसमें उनका क्या हित है?

Kya yeh sirf brhstachar hai

यह स़िर्फभ्रष्टाचार नहीं है. यह भ्रष्टाचार से कहीं बड़ी बात है. एक ही दिन में, केंद्र सरकार के दो मंत्री इस्तीफ़ा दे देते हैं. रेल मंत्री पर उसके रिश्तेदार द्वारा रिश्‍वत लेकर रेलवे के एक अधिकारी को प्रमोशन दिलाने और क़ानून मंत्री पर सीबीआई रिपोर्ट को प्रभावित करने का आरोप है. बावजूद इसके, केंद्र सरकार का एक और मंत्री नए मंत्रालय का प्रभार मिलते ही 24 घंटे के अंदर ऐसा काम करता है, जिसकी उम्मीद लोकतंत्र में नहीं की जाती. मामला कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल का है. क़ानून मंत्री अश्‍विनी कुमार के इस्ती़फे के बाद कपिल सिब्बल को क़ानून मंत्रालय का प्रभार मिलता है. क़ानून मंत्रालय का प्रभार मिलने के 24 घंटे के भीतर ही कपिल सिब्बल एक ऐसा काम करते हैं, जिसे मानने से भारतीय संसद और ख़ुद यूपीए सरकार तक ने मना कर दिया था. दरअसल, क़ानून मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे कपिल सिब्बल पर आम आदमी पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया है कि कपिल सिब्बल ने क़ानून मंत्री का कार्यभार संभालते ही वोडा-हचिसन कर मामले में आउट ऑफ कोर्ट (अदालत से बाहर मामले को सुलझाने की कोशिश) समझौता करवाने की कोशिश की. आरोप तो यहां तक लगाया गया कि कपिल सिब्बल और उक्त कंपनी के बीच दो हज़ार करोड़ रुपये का सौदा हुआ है. दरअसल, उक्त कंपनी के ऊपर क़रीब 11 हज़ार करोड़ रुपये का कर बाक़ी है, जिसे उस कंपनी को सरकार के पास जमा कराना है. लेकिन कंपनी यह कर नहीं जमा कराना चाहती है. वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का दावा है कि उनके पास सिब्बल के ख़िलाफ़ कई सबूत और दस्तावेज़ हैं, जो कपिल सिब्बल के ऊपर सवाल खड़े करते हैं. यह भी आरोप लगा है कि चूंकि सिब्बल के बेटे अमित सिब्बल उक्त कंपनी के वकील थे, इसलिए भी सिब्बल ने इस मामले में दिलचस्पी दिखाई और इस तरह का काम किया. इस पूरी घटना में पी चिदंबरम और अटर्नी जनरल ग़ुलाम ई वाहनवती पर भी आरोप लगे हैं. आरोपों के मुताबिक़, अश्‍विनी कुमार के क़ानून मंत्री रहते वाहनवती भी आउट ऑफ कोर्ट समझौते के ख़िलाफ़ थे, लेकिन जैसे ही क़ानून मंत्रालय का प्रभार कपिल सिब्बल को मिला, उन्होंने अपनी राय बदल दी. उन्होंने सिब्बल से वोडाफोन से समझौते की सिफ़ारिश की और सिब्बल भी मान गए. अब सवाल यह है कि अचानक, रातोंरात यह सब कुछ कैसे बदल गया. ध्यान देने की बात यह है कि इस कर विवाद को लेकर सरकार के  साथ वोडाफोन का विवाद काफ़ी पुराना है. सरकार वोडाफोन को इस मामले में माफ़ी देने के पक्ष में नहीं है. वोडाफोन ने हचिसन इंडिया में हॉन्गकॉन्ग की हचिसन वामपोआ की हिस्सेदारी ख़रीदी थी. वोडाफोन इस समझौते के तहत देय कर से मुकर रहा था. मामला अदालत में गया. इस मामले में जनवरी 2012 में उसे सुप्रीम कोर्ट में जीत हासिल हुई. लेकिन सरकार ने कर क़ानून में बदलाव कर दिया. तब वोडाफोन ने समझौते की कोशिश की.

आखिर क्यों कपिल सिब्बल चाहते है की वोडाफ़ोन जैसी बड़ी कंपनी को कर माफ़ी दी जाये ? इसमें उनका क्या हित है ? आखिर यह पैसा इस देश की जनता का है, उसे सरकारी खजाने मे जाना चाहिए, उसे क्यों वे एक कंपनी द्वारा हड़पने देना चाहते है ?

चूंकि, पहले अटॉर्नी जनरल ने भी अपनी राय दी थी कि इस मामले में समझौता नहीं हो सकता, लेकिन जब कपिल सिब्बल ने क़ानून मंत्री बनते ही फिर से अटॉर्नी जनरल की राय मांगी, तो वे समझौते के लिए सहमत हो गए. सवाल यह है कि जिस मामले में सरकार का रुख़ पहले ही साफ़ हो चुका है कि कर माफ़ी नहीं दी जा सकती, उस मामले में सरकार के ही एक मंत्री का इस तरह का व्यवहार क्या साबित करता है? आख़िर क्यों कपिल सिब्बल चाहते हैं कि वोडाफोन जैसी बड़ी कंपनी को कर माफ़ी दी जाए? इसमें उनका क्या हित है? आख़िर यह पैसा इस देश की जनता का है, उसे सरकारी ख़ज़ाने में जाना चाहिए, उसे क्यों वे एक कंपनी द्वारा हड़पने देना चाहते हैं? जिस देश के करोड़ों ग़रीब लोग अपने हिस्से की कमाई से सरकार को टैक्स देते हैं, वहां एक कॉरपोरेट हाउस को हज़ारों करोड़ के टैक्स की छूट देने के लिए एक केंद्रीय मंत्री सिफ़ारिश करता है, तो इसे क्या कहा जाना चाहिए?

1 comment

  • shashishekhar

    यह तो भाई – भतिजावाद बाप – बैटावाद है । यहां सब ऐसे ही चल रहा हैं ले दे के सत्ता मिलते ही खुद को लोग यहा भगवान समझ लेते हैं । और कानून को भी आंख दिखाने लगते हैं ।

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