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उत्तराखंड आपदा में हज़ारों लोगों की जानें चली गईं, लेकिन आपदा से पहले मौसम विभाग की चेतावनी के बाद भी प्रदेश सरकार ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई. हद तो तब हो गई, जब आपदा के बाद बचाव और राहत कार्यों में भी बदइंतजामी देखने को मिली. अब प्रदेश के मुख्यमंत्री आलाकमान के निशाने पर हैं.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए प्राकृतिक आपदा सियासी आपदा भी बन सकती है. दरअसल, इस भयंकर त्रासदी से निपटने में प्रदेश सरकार का पूरा तंत्र जिस तरह से नाकाम रहा और मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर राज्य प्रशासन का जो नाकारापन सामने आया है, इससे कांग्रेस हाईकमान बेहद खफा हैं. मुख्यमंत्री की मंत्रियों, विधायकों और पार्टी नेताओं से संवादहीनता और अविश्‍वास को देखते हुए राहत कार्यों में तेजी लाने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने पहले वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा के नेतृत्व में दिल्ली से कई नेताओं को देहरादून भेजा. तब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्या समेत कांगे्रस सेवा दल के कई राष्ट्रीय नेताओं को कैंप लगाकर राहत कार्यों में तेजी लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. इसके बाद, राहुल गांधी, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से लेकर प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी तक को राहत कार्यों की समीक्षा करने के लिए उत्तराखंड आना पड़ा. उन्हें कांग्रेस सरकार में शामिल मंत्री और विधायकों से लेकर प्रभावित जनता की नाराज़गी भी खूब झेलनी पड़ी. खासकर, सीएम विरोधी खेमे ने उनके पास शिकायतों की खूब झड़ियां लगाईं.
बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का ज्यादा समय दिल्ली में बीतना, तबाही वाले दिन भी उनका दिल्ली में ही डेरा डाले रहना, प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी द्वारा आपदा प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद सीएम द्वारा हवाई सर्वेक्षण करना, 18 जून को देहरादून में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में केदारनाथ की तबाही को गंभीरता से न लेना और इसके बाद राहत कार्यों की समीक्षा के लिए कई दिनों तक मंत्रिमंडल की बैठक न बुलाना, राहत कार्यों की निगरानी के लिए मंत्रियों, विधायकों को प्रभावित क्षेत्रों में न भेजना, आपदा राहत की ज़िम्मेदारी पहले ही कई मामलों में विवादों में रहे आईएएस अधिकारी राकेश शर्मा को सौंपने, बिछड़े अथवा मृतकों की संख्या की सही जानकारी नहीं मिलना, संपर्क मार्गों से कटे गांवों की सही सूची तक जारी नहीं होने, सरकार के मंत्री, विधायकों की नाराजगी बार-बार सामने आने जैसे कदमों ने कांग्रेस नेतृत्व का सिरदर्द बढ़ा दिया है.
सूत्रों की माने तो कांग्रेस नेतृत्व तक यह बात पहुंचा दी गई है कि तबाही की शुरुआत 16 जून की रात से हुई. इसके पहले 13 और 14 जून से ही पहाड़ों पर लगातार बारिश हो रही थी. मौसम विभाग ने भी भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने का अलर्ट जारी कर दिया था. बावजूद इसके, यात्रा जारी रखी गई. जिससे केदारनाथ, यममुनोत्री, बद्रीनाथ और गंगोत्री समेत चारधाम यात्रा मार्गों पर हजारों लोग पहुंचते रहे. चारधाम यात्रा की राज्य सरकार  निगरानी तक नहीं कर रही थी. सारा दारोमदार बस और टूर ऑपरेटरों के भरोसे था. चारों धाम कितने यात्री जा रहे थे, इसका तो रिकॉर्ड ही नहीं था.
राहत और बचाव कार्यों में लापरवाही के चलते हो रही किरकिरी और हाईकमान की टेढ़ी होती नज़र को भुनाने में अब बहुगुणा के धुरविरोधी माने जाने वाले केंद्रीय मंत्री हरीश रावत और उनके समर्थक भी एक बार फिर गुर्राने लगे हैं. अपनी सरकार के खिलाफ पहले से ही मोर्चा खोल चुके ये नेता आपदा आने के बाद शांत हो गए थे, लेकिन अब राहत और बचाव कार्यों में घोषणाओं के मुताबिक तेजी नहीं आने का मसला उठाते हुए एक बार फिर इस गुट के सांसद, विधायकों ने सीएम के विरोध में झंडा थाम लिया है. कांग्रेस के ही धारचूला विधायक हरीश धामी ने राज्य सरकार पर मनमानी करने का आरोप लगाते हुए तहसील प्रांगण में धरना शुरू कर दिया है, जबकि सर्वाधिक आपदा प्रभावित केदारनाथ क्षेत्र से कांग्रेस की ही दूसरी विधायक शैलारानी रावत प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी और मुख्यमंत्री के सामने ही अपने क्षेत्र की अनदेखी होने पर धरने पर बैठने की चेतावनी दे चुकी हैं. उनका आरोप है कि केदारनाथ क्षेत्र में करीब एक हजार स्थानीय लोग आपदा में मरे. सैकड़ों दुकानें-मकान बहे हैं, लेकिन उनके बार-बार कहने के बावजूद सीएम कोई सुध नहीं ले रहे. स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल भी फंसे लोगों को निकालने में प्रशासन की ढिलाई पर रोश जता चुके हैं. सांसद प्रदीप टम्टा अपने संसदीय क्षेत्र में राहत और बचाव सामग्री नहीं पहुंचाने को लेकर मुखर हैं, जबकि राज्यपाल अजीज कुरैशी भी आपदा से निपटने में बहुगुणा सरकार के इंतजामों पर टिप्पणी कर चुके हैं.
आपदा से निपटने में बहुगुणा सरकार की नाकामी का मसला उनके विरोधी हाईकमान तक लगातार पहुंचा रहे हैं. इन नेताओं ने प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी से मुलाकात करके भी अपनी नाराजगी जाहिर की. हालांकि, शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें फिलहाल संयम बरतने की नसीहत देते हुए भरोसा दिया है कि राहत और बचाव अभियान खत्म होने के बाद इनकी शिकायतों पर सुनवाई होगी. इससे फिलवक्त स्थिति संभली हुई दिख रही है. प्रदेश सरकार के मुखिया की सुस्ती और भाजपा के मुख्यमंत्रियों समेत उत्तराखंड में उनके नेताओं की सक्रियता ने भी कांग्रेस हाईकमान की नींद उड़ा रखी है. शासन-प्रशासन की खस्ताहालत की वजह से आपदा से निपटने के लिए केंद्र से मिली एक हजार करोड़ की राहत राशि का सही उपयोग भी हो सकेगा या नहीं. इसे लेकर भी केंद्रीय नेतृत्व को संशय है. यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोर शोर से उठ रही है कि यह प्राकृतिक आपदा विजय बहुगुणा के लिए सियासी आपदा साबित होगी.

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