केंद्र की सत्ता में यूपीए सरकार पिछले दस सालों से आसीन है. आम तौर पर किसी सरकार के कार्यकाल का मूल्यांकन उसकी नीतियों, कार्यक्रमों एवं उपलब्धियों के आधार पर ही किया जाता है, लेकिन केंद्र की कांग्रेस (यूपीए) सरकार के साथ ऐसा नहीं होगा, क्योंकि यह इतिहास की एक ऐसी सरकार के रूप में जानी जाएगी, जिसने लोकतंत्र को लूटतंत्र में बदल दिया. इसका मूल्यांकन घूस, घपलों एवं घोटालों के आधार पर किया जाएगा. दरअसल, ऐसा लगता है कि जनता अब बेबस है और सरकार प्रॉपर्टी डीलर बन चुकी है. यूपीए सरकार का उपहार हैं दस सालों के दौरान हुए दस महाघोटाले.
Hindi-219पिछले दस साल यानी भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे त्रासद समय. इस दौरान ऐसे-ऐसे घोटाले सामने आए, जिनके नाम और दाम अकल्पनीय थे. जल, जंगल, ज़मीन, हवा, पानी, तरंग, आकाश, पाताल यानी सब कुछ लूटा और बेचा गया. आश्चर्य की बात तो यह है कि ग़रीब किसानों के हिस्से के पैसों, पानी, ज़मीनों एवं जानवरों तक की लूट हुई. प्राकृतिक संसाधन रिश्वत और दलाली लेकर कौड़ियों के भाव बेच दिए गए. सांसद, नौकरशाह, मुख्यमंत्री, मंत्री, बेटा-बेटी, भांजा, दामाद, कॉरपोरेट घराने, दलाल, बिचौलिए सभी लूट के इस खेल में शामिल रहे. और तो और, ईमानदार माने जाने वाले प्रधानमंत्री तक पर आरोप लगे. लेकिन संसदीय परंपरा में आई गिरावट का असर तो देखिए, हर घोटाले के बाद सरकार संसद में सीना फुलाए खड़ी रही और विपक्ष रस्मी तौर पर सिवाय शोर-शराबे के और कुछ भी नहीं कर पाया, वह भी स़िर्फ संसद के भीतर. वैसे, घपलों-घोटालों के अलावा, इस सरकार को एक और वजह से याद रखा जाएगा और वह यह कि आज़ादी के बाद पहली बार किसी सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं को मज़ाक बनाकर रख दिया, चाहे वह कैग हो या अदालत. 64 सालों के भारतीय लोकतंत्र और संसदीय परंपराओं का ताना-बाना पिछले दस सालों में तार-तार होता नज़र आया. दरअसल, इन दस सालों के शासन ने व्यवस्था नामक चीज का अस्तित्व ही बिल्कुल समाप्त कर दिया है. विधायिका एवं कार्यपालिका तो मानो लकवाग्रस्त हुई ही, न्यायपालिका का इक़बाल भी कई बार खतरे में पड़ता दिखाई दिया. बहरहाल, एक नज़र डालते हैं, पिछले दस सालों के दौरान हुए दस महाघोटालों पर.
सबसे पहले बात कोयला घोटाले  की. जब चौथी दुनिया ने सबसे पहले बताया कि इस देश में 26 लाख करोड़ रुपये का कोयला महाघोटाला हुआ है, तब शायद सहसा किसी को यक़ीन ही न हुआ हो. चौथी दुनिया में छपी यह रिपोर्ट किसी अनुमान पर आधारित नहीं थी, बल्कि संसद की एक स्थायी समिति की रिपोर्ट पर आधारित थी. बाद में कैग ने अपनी रिपोर्ट दी और बताया कि कैसे कोल ब्लॉक आवंटन में 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है. कैग ने सीधे-सीधे यूपीए सरकार पर सवाल उठाए और बताया कि कोल ब्लॉक आवंटन में सरकार ने मनमानी की है और ऐसे-ऐसे लोगों को कोल ब्लॉक आवंटित कर दिए गए, जिन्हें इस फील्ड का कोई अनुभव ही नहीं था. संसद में पेश कैग की रिपोर्ट में जुलाई 2004 से हुए 142 कोल ब्लॉक आवंटन से 1.86 लाख करोड़ रुपये के नुक़सान का अनुमान लगाया गया. रिपोर्ट में यह कहा गया कि 2004 से 2009 के बीच कोयला खदानों के ठेके देने में न केवल अनियमिताएं बरती गईं, बल्कि बहुत ही कम दामों पर और बिना नीलामी किए ही कोल ब्लॉक आवंटित किए गए. इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस घोटाले में प्रधानमंत्री का नाम भी आया. उन पर यह आरोप था कि जब वह कोयला मंत्रालय संभाल रहे थे, तब भी कोल ब्लॉक आवंटित किए गए. ज़ाहिर है, कोयला मंत्री रहते हुए उनकी भी ज़िम्मेदारी इस घटना को लेकर बनती थी. बहरहाल, जब सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद इस मामले में दिलचस्पी दिखाई और मामले को अपने हाथ में लिया, तब जाकर कार्रवाई शुरू हुई और कुछ कोल ब्लॉक निरस्त किए गए. फिलहाल मामला अदालत में है. अंतिम फैसला आना अभी बाकी ज़रूर है, लेकिन राजनीतिक तौर पर एक फैसला पहले ही हो चुका है कि चाहे जो हो, लेकिन प्रधानमंत्री की इस सबके लिए कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती.
टू-जी स्पेक्ट्रम  घोटाला स्वयं में एक अद्भुत घोटाला है. इसमें क्या बेचा गया और क्या ख़रीदा गया, यह आम आदमी को समझ में नहीं आ सकता. भला कोई सोच सकता है कि हवा में तैरती तरंगों में भी अरबों रुपये का घोटाला हो सकता है! लेकिन अफसोस! ऐसा कारनामा भी केंद्र की यूपीए सरकार और उसके मंत्री ने कर दिखाया. 2008 में कैग की रिपोर्ट आई, जिसके मुताबिक़, संचार मंत्री ए राजा के रहते बिना नीलामी के टू-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में देश को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. 2001 की पुरानी क़ीमत पर ही स्पेक्ट्रम का आवंटन कर दिया गया. नीलामी की जगह पहले आओ-पहले पाओ की नीति अपनाई गई. दरअसल, इस आवंटन में 122 लाइसेंस जारी किए गए थे, जिनमें से 85 लाइसेंस ऐसी कंपनियों को दिए गए थे, जो इसके लिए आवश्यक शर्तें भी पूरी नहीं करती थीं. इस पूरे प्रकरण में संचार मंत्री ए राजा, यूनीटेक के संजय चंद्रा, स्वान के शाहिद बलवा, विनोद गोयनका, रिलायंस एडीएजी के हरि नायर, गौतम दोषी एवं सुरेंद्र पिपारा, डीएमके सांसद कनिमोझी, करीम मोरानी, शरद कुमार और आसिफ बलवा के नाम साजिशकर्ताओं के तौर पर सामने आए. ये सभी गिरफ्तार हुए और जेल में भी रहे. बाद में राजा और कनिमोझी को जमानत भी मिल गई. फिलहाल मामला अदालत में है. हालांकि बाद में ए राजा ने ख़ुद भी कहा और आरटीआई के माध्यम से भी यह जानकारी सामने आई कि टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन में अकेले ए राजा ही दोषी नहीं हैं. आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक़, प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को इस आवंटन के बारे में जानकारी थी और उनसे राय भी ली गई थी. ख़ुद राजा ने भी कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस बारे में बताया जा चुका था. यह एक ऐसा घोटाला था, जिसमें पत्रकारों पर भी आंच आई. कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया का भी इस पूरे प्रकरण में एक अहम रोल रहा, जिन्होंने अपने काम के लिए कई नामी पत्रकारों का इस्तेमाल किया.
टू-जी स्पेक्ट्रम के बाद एक और घोटाला सामने आया. यह था एस बैंड स्पेक्ट्रम. देश की सबसे महत्वपूर्ण सरकारी संस्था, जिसकी देखरेख की सीधी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री की होती है, यानी यह घोटाला इसरो में सामने आया. एक अनुमान के मुताबिक, इस घोटाले से सरकार को 2 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ. इसरो ने देवास मल्टीमीडिया को कम दामों पर एस बैंड स्पेक्ट्रम देने का समझौता किया था. यह आवंटन भी बिना नीलामी किए ही किया गया. देवास कंपनी इसरो में ही उच्चाधिकारी रहे एम जी चंद्रशेखर की है. इसरो सीधे-सीधे प्रधानमंत्री के अधीन आता है. कैग ने 2005 में हुए इस समझौते की जांच शुरू कर दी है. इसरो की शाखा एंट्रिक्स लिमिटेड ने देवास मल्टीमीडिया के साथ क़रीब 600 करोड़ रुपये में स्पेक्ट्रम आवंटन का समझौता किया था. इस क़रार के ज़रिए एस बैंड का आवंटन पहली बार निजी क्षेत्र के लिए किया गया था. इसके लिए न केवल इसरो के नियमों की अनदेखी की गई, बल्कि इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय भी संदेह के घेरे में आया. भारतीय राजनीति में जब बोफोर्स घोटाला सामने आया था, तब कोहराम मच गया था. आज की नज़र से देखें, तो वह महज़ 65 करोड़ रुपये की दलाली का मामला था, लेकिन उस घोटाले की गूंज आज भी भारतीय राजनीति में रह-रहकर सुनाई देती रहती है. आज के घोटालों में तो गबन की रकम के आगे इतने शून्य लग चुके हैं कि आम आदमी शायद ही उसे गिन पाए.
यूपीए सरकार द्वारा लगातार किए जा रहे घोटालों में से एक है राष्ट्रमंडल खेल घोटाला. एक अनुमान के मुताबिक़, यह घोटाला क़रीब 80 हज़ार करोड़ रुपये का है. इसमें सीडब्ल्यूजी के अध्यक्ष एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश कलमाड़ी और उनके सहयोगियों के नाम सामने आए. साथ ही इसमें दिल्ली की कांग्रेस सरकार की भागीदारी भी सामने आई. इस खेल के लिए ऐसी-ऐसी ख़रीदारी हुई, जिसे सुनकर कोई भी दंग रह जाएगा. कैग की रिपोर्ट के  मुताबिक़, 52 हज़ार करोड़ रुपये की इस योजना में ज़बरदस्त धांधली की गई थी. खेल में लूट का खेल यहीं पर नहीं रुकता. एक और खेल घोटाला है, आईपीएल घोटाला. जेंटलमैन का खेल माने जाने वाले क्रिकेट में भी घोटालों का एक नया सिलसिला चल पड़ा है. इंडियन प्रीमियर लीग असल में फिक्सिंग लीग बन गया है. आईपीएल-3 के  दौरान इस खेल से जुड़े विवाद सामने आए, जिसमें केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को अपने पद से जाना पड़ा. आईपीएल प्रमुख ललित मोदी को पद तो छोड़ना ही पड़ा, साथ ही वह अब भी देश से बाहर रहने के लिए मजबूर हैं. मामले की जांच अभी भी चल रही है. इस खेल में काला धन लगे होने की बात सामने आई. कोच्चि की टीम पर मालिकाना हक का विवाद इतना गहराया कि केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को इस्ती़फा तक देना पड़ा और इस मामले में उनकी मित्र एवं अब पत्नी सुनंदा पुष्कर भी सवालों के घेरे में आ गईं. आईपीएल में क़रीब 1500 करोड़ रुपये से भी अधिक के घोटाले की आशंका है.
कोयला, तरंग, खेल आदि की बात तो रहने ही दीजिए. सरकार की संवेदनहीनता देखिए कि उसने देश के ग़रीब किसानों के हिस्से में भी सेंध लगाने से गुरेज नहीं किया और नतीजा हमारे सामने है, किसान कर्ज माफी घोटाला. कांग्रेस के वर्तमान उपाध्यक्ष एवं उत्तराधिकारी राहुल गांधी की पहल पर शुरू की गई किसान क़र्ज़ माफी योजना की रकम भी घोटालेबाज़ों ने हड़प ली. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक़, किसान क़र्ज़ माफी योजना के लिए जारी 52 हज़ार करोड़ रुपये की रकम में ज़बरदस्त अनियमितताएं सामने आई हैं. क़र्ज़ माफी के लिए न तो असल ज़रूरतमंदों की ठीक से पहचान की गई और न ही पात्र लोगों को इस योजना का फायदा मिला. उल्टे अपात्र लोगों को ़फायदा पहुंचाया गया. कैग के मुताबिक़, 9 राज्यों में क़रीब 13 फीसद सही खातों को लाभ नहीं मिला और जिन 80,277 खातों को ़फायदा मिला, उनमें 8.5 फीसद इसके लायक़ नहीं थे. 22 फीसद मामलों में योजना को सही ढंग से लागू नहीं किया गया. 34 फीसद मामलों में किसानों को क़र्ज़ माफी का प्रमाणपत्र ही नहीं दिया गया. एक ओर जहां विदर्भ में आज भी ऐतिहासिक सूखा पड़ा हुआ है, वहीं इस राज्य में सिंचाई परियोजना में हज़ारों करोड़ रुपये का घोटाला, यानी महाराष्ट्र सिंचाई घोटाला सामने आ चुका है. उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को इस्ती़फा देना पड़ा और फिर नाटकीय ढंग से उनकी वापसी भी हो गई. राज्य सरकार की वार्षिक आर्थिक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले दस सालों में राज्य के सिंचित क्षेत्र में महज़ 0.1 फीसद वृद्धि हुई. जबकि इस दौरान प्रधानमंत्री ने विदर्भ के किसानों के लिए एक विशेष पैकेज दिया था, जिसमें सिंचाई परियोजनाएं प्रमुख थीं. पिछले दस सालों में महाराष्ट्र में सिंचाई की मद में 70,000 करोड़ रुपये ख़र्च हुए. बावजूद इसके, महज़ 0.1 फीसद सिंचित भूमि और विदर्भ का मौजूदा सूखा यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वे 70 हज़ार करोड़ रुपये भी घोटालेबाज़ों की जेब में ही गए. पिछले दस सालों में सिंचाई के लिए दिए गए पानी में से क़रीब 189.6 करोड़ घनमीटर पानी ग़ैर-सिंचाई कार्यों के लिए दे दिया गया. राज्य सरकार द्वारा जारी श्वेतपत्र के अनुसार, इस पानी से 2.85 लाख हेक्टेयर खेत की सिंचाई हो सकती थी. ज़ाहिर है, यह पानी उद्योगों को दे दिया गया. इसमें मुख्य रूप से विदर्भ के हिस्से का पानी भी शामिल है, जो उद्योग जगत के हिस्से में चला गया. नतीजा, आज हम सब देख रहे हैं कि विदर्भ के किसानों की हालत क्या है. महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार और उसके कद्दावर नेताओं को इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं है कि आ़िखर विदर्भ के किसानों का क्या होगा. उल्टे शर्म की बात तो यह है कि शरद पवार के भतीजे एवं राज्य के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार इस मसले पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं कि अगर नहर में पानी नहीं है, तो क्या मैं उसमें पेशाब करके पानी ले आऊं.
यूपीए सरकार ने सुरक्षा संबंधी मामलों में भी घोटालों का एक नया रिकॉर्ड बनाया है. मसलन, एनटीआरओ घोटाला. एनटीआरओ, यानी नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन. यह एक गोपनीय सरकारी संस्था है. इसमें भी एक ख़रीदारी को लेकर क़रीब 1000 करोड़ रुपये की अनियमितता का मामला सामने आया. यह घोटाला एक सुरक्षा सौदे में हुआ था. सरकार ने एनटीआरओ के  लिए 8 हज़ार करोड़ रुपये का बजट बनाया था, जिसके ऑडिट का अधिकार किसी को भी नहीं था. और जब एनटीआरओ का ऑडिट कराया गया, तब पता चला कि उसमें 1000 करोड़ रुपये का घोटाला हो चुका है. यह घोटाला अनमैन्ड एरियल व्हेकिल की ख़रीद में हुआ था. एनटीआरओ ने मानव रहित वायुयान ख़रीदने के लिए 2006 में इजरायल से एक सौदा किया था. उक्त सारे वायुयान बिना परीक्षण के ही ख़रीद लिए गए थे और जब उनका भारत में टेस्ट हुआ, तो वे फेल हो गए. देश के सुरक्षा तंत्र में भी घोटाला इस बात का संकेत है कि इस सरकार को देश की सुरक्षा की भी चिंता नहीं है.
स्कॉर्पियन पनडुब्बी एवं टाट्रा ट्रक सौदे में दलाली यह बताती है कि इस देश में होने वाला कोई भी रक्षा सौदा दलालों के बिना नहीं होता, यानी इस देश की सुरक्षा दलालों के भरोसे ही चल रही है. पिछले साल कुछ दस्तावेज सामने आए, जिनके मुताबिक़, वर्ष 2000 और 2004 में क़रीब 2000 करोड़ रुपये के दो समझौते अमेरिकी नागरिक एलन एवं अभिषेक वर्मा के बीच हुए. कथित तौर पर यह पैसा अभिषेक वर्मा का था, जिसके प्रबंधन की ज़िम्मेदारी एलन की थी. एलन अमेरिका में अटॉर्नी है. 2010 में दोनों के बीच मनमुटाव हो गया, तो अभिषेक वर्मा ने एलन को पैसे वापस करने के लिए नोटिस भेजा. जब एलन ने कोई जवाब नहीं दिया, तो अभिषेक वर्मा ने अमेरिका में ही एलन के खिलाफ केस दर्ज कराया. सवाल यह है कि अभिषेक वर्मा के पास 2000 करोड़ रुपये आखिर आए कहां से? इतनी बड़ी रकम का स्रोत क्या है? क्या अभिषेक वर्मा ने इसकी जानकारी किसी टैक्स अथॉरिटी को दी है? स्कॉर्पियन सौदे में जो दस्तावेज़ सामने आए हैं, उनसे सा़फ होता है कि अभिषेक वर्मा 4 प्रतिशत दलाली की मांग कर रहा था. रक्षा सौदे की दलाली में अभिषेक वर्मा का क़द इतना बड़ा है कि दुनिया भर में किसी भी रक्षा सामग्री बेचने वाली कंपनी को मदद की ज़रूरत होती है, तो वह अभिषेक वर्मा को ही ढूंढती है, चाहे अगस्ता वेस्टलैंड को हेलिकॉप्टर सौदे में मदद चाहिए या जर्मन कंपनी आरएडी का नाम ब्लैक लिस्ट से हटवाना हो या फिर इजरायली टेलिकॉम कंपनी ईसीआई को एंटी डंपिंग शुल्क वापस कराना हो. इन सारे ग़ैर-क़ानूनी कामों के लिए कंपनियां अभिषेक वर्मा को ही तलाशती हैं. नेवी वार रूम लीक मामले में कई ई-मेल सामने आए हैं, जिनमें स्कॉर्पियन डील के 18 हज़ार करोड़ रुपये में से 4 फीसद कमीशन की बात सामने आई है. थेल्स कंपनी के सामने अभिषेक वर्मा ने ख़ुद को कांग्रेस का प्रतिनिधि बताया था. इसके अलावा, टाट्रा ट्रक की ख़रीदारी में तो कई पूर्व सैन्य अधिकारियों की भी संलिप्तता सामने आई. सीबीआई ने कई रिटायर्ड वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों से पूछताछ भी की.
घपलों-घोटालों का यह अंतहीन सिलसिला न जाने कब थमेगा. एक के बाद एक हो रहे घोटालों की कड़ी में अभी हाल ही में कांग्रेसी नेता एवं रेल मंत्री पवन बंसल का नाम सामने आया है. रेलवे बोर्ड सदस्य के प्रमोशन के लिए पवन बंसल के भांजे को 90 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए सीबीआई ने रंगे हाथों पकड़ा. पहले तो बंसल ने भांजे से संबंध न होने की बात कही, लेकिन जैसे-जैसे केस आगे बढ़ा, तो पता चला कि भांजे विजय सिंगला और मंत्री जी के बीच बहुत गहरा संबंध है.
रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाने के लिए दस करोड़ रुपये की डील हुई थी और पेशगी के तौर पर 90 लाख रुपये लेते वक्त सिंगला सीबीआई की गिरफ्त में आ गया. फिलहाल मामले की जांच चल रही है. बहरहाल, यूपीए सरकार के दस सालों का लेखा-जोखा यही बताता है कि इस देश में अब लोक कल्याणकारी सरकार की जगह दलालों, घूसखोरों एवं बिचौलियों ने ले ली है. क़ानून देश की आम जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए नहीं, बल्कि कॉरपोरेट हाउसेज की तिजोरियां भरने के लिए बनाए जा रहे हैं. चाहे वह क़ानून जल, जंगल, ज़मीन से जुड़ा हो या आकाश या पाताल से. सरकार खुद प्रॉपर्टी डीलर बन चुकी है और जनता बेबस, लाचार और असहाय बनी हुई है.
और भी हैं महाघोटाले…
इस घोटाले की गूंज अभी देश में सुनाई नहीं दे रही है, लेकिन यह घोटाला अब तक के सारे घोटालों का रिकॅार्ड तोड़ देगा. यह घोटाला कम से कम 48 लाख करोड़ रुपये का है. यह थोरियम घोटाला  है. भारत में थोरियम का सबसे बड़ा भंडार है. दक्षिण भारत के समुद्री किनारों पर थोरियम फैला हुआ है. दुनिया के दूसरे देशों में थोरियम पत्थरों में पाया जाता है, लेकिन स़िर्फ हमारे देश में ही  यह साधारण बालू में मिलता है. इसका खनन एवं इसे जमा करना आसान है और यह सस्ता भी है. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने आज थोरियम लूटने की खुली छूट दे रखी है. समुद्र तटों से निजी कंपनियों द्वारा थोरियम की लूट हो रही है. 30 नवंबर, 2011 को कोडीकुनेल सुरेश ने लोकसभा में प्रधानमंत्री से सवाल पूछा. सवाल यह था कि देश से जो मोनाजाइट निर्यात किया जा रहा है, क्या उसमें किसी क़ानून का कोई उल्लंघन हुआ है या नहीं? इस पर पीएमओ के मिनिस्टर ऑफ स्टेट वी नारायणसामी ने जवाब दिया कि मोनाजाइट को छोड़कर समुद्र तट की बालू, जिसमें कुछ खनिज हैं, का निर्यात किया जा रहा है, क्योंकि मोनाजाइट और थोरियम के निर्यात के लिए लाइसेंस दिया जाता है और अब तक किसी कंपनी को इसे निर्यात करने के लिए लाइसेंस नहीं दिया गया है. डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी ने 6 जनवरी, 2006 को कई दूसरे खनिजों को अपनी सूची (एसओ-61-ई) से हटा दिया और निजी कंपनियों को उन्हें निर्यात करने की छूट दे दी. लेकिन क्या सरकार को यह पता है कि देश से मोनाजाइट का निर्यात हो रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 2004 में जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी, तबसे अब तक 2.1 मिलियन टन मोनाजाइट भारत से ग़ायब कर दिया गया है. मोनाजाइट उड़ीसा, तमिलनाडु और केरल के समुद्र तटों पर मौजूद बालू में पाया जाता है. मोनाजाइट में क़रीब दस फीसद थोरियम होता है. इसका मतलब यह कि क़रीब 1,95,000 टन थोरियम गायब कर दिया गया.
यह घोटाला रिलायंस  और केजी बेसिन  से जुड़ा हुआ है. सरकार पर रिलायंस को फायदा पहुंचाने का आरोप है. आरोप का आधार सीएजी रिपोर्ट है. सरकार पर आरोप यह है कि उसने जान-बूझकर रिलायंस को ़फायदा पहुंचाया और इससे देश को बहुत बड़ा आर्थिक नुक़सान हुआ. यह नुक़सान 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से भी बड़ा है. रिलायंस कंपनी पर सरकार ने दरियादिली का इज़हार कुछ ऐसे किया कि कृष्णा-गोदावरी बेसिन की गैस की क़ीमत तय करने के लिए सचिवों का एक समूह बना. पिछले कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर इसके अध्यक्ष बनाए गए. आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की तीन चिट्ठियों को आधार बनाया गया था. रेड्डी का सुझाव था कि सरकारी कंपनी एनटीपीसी  से रिलायंस को 2.97 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू गैस मिलती थी. यह दर वैश्विक प्रतिस्पर्धा के ज़रिए तय की गई थी, इसलिए इसे ही बाज़ार दर माना जाए. इस समूह ने यह भी कहा कि गैस की क़ीमत अगर एक डॉलर भी बढ़ती है, तो रासायनिक खाद सेक्टर का ख़र्च बढ़ेगा, जिससे सरकार पर कई हज़ार करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी का बोझ आएगा, पर मंत्री समूह ने इन सारी दलीलों को खारिज कर गैस की क़ीमत 4.2 डॉलर तय की. इस तरह रिलायंस को ़फायदा पहुंचाया गया. सरकार को कितना नुक़सान हुआ, इसका आकलन करने में सीएजी ने हाथ खड़े कर दिए हैं. सीएजी का कहना है कि नुक़सान का आंकड़ा इतना बड़ा होगा कि उसका हिसाब लगाना मुश्किल है.
एक और घोटाला है मनरेगा  का. अभी हाल में कैग ने अपनी रिपोर्ट दी है. यह क़रीब 13 हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला बताया जा रहा है. कैग ने बताया है कि इस योजना के क्रियान्वयन में ज़बरदस्त धांधली की गई है. यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा आज लूट का सबसे बड़ा अड्डा बन चुकी है. 2252 करोड़ रुपये की अवैध योजनाएं मनरेगा के तहत शुरू कर दी गईं. 8 लाख निर्माण कार्य निर्धारित समय में पूरे नहीं किए जा सके. कैग के मुताबिक़, 6574 करोड़ रुपये से ऐसे काम हुए, जिनसे कोई बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हो सका. उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में इस योजना की हालत ख़राब है. ज़रूरतमंदों के जॉब कार्ड तक नहीं बन पाए. बहरहाल, कांग्रेस जिस योजना को अपना फ्लैगशिप कार्यक्रम बताती है, वह दरअसल ग़रीबी हटाने की जगह भ्रष्टाचार बढ़ाने का ज़रिया बन चुकी है.

Adv from Sponsors

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here