देश के लिए यह काफी सुखद है कि आखिरकार प्रधानमंत्री ने अपनी चुप्पी तोड़ी. ससंद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री ने अपनी बात रखी. वह बहुत ही विनम्र, गंभीर और सम्मानित व्यक्ति हैं और अपने तर्कों से विपक्ष को लाजवाब करने की योग्यता रखते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वे अपनी बात रखने के लिए इसी तरह से सामने आएं.

देश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है. और यह संकट कई रूपों में है. इस संकट से उबरने के लिए सरकार की कोशिशें बहुत ही धीमी हैं और देर से हो रही हैं. हालांकि वित्तमंत्री ने सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है. साथ ही विदेश पैसा भेजने पर भी कुछ पाबंदियां लगा दी है, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होने वाला है. जरूरत है कि आयात में कमी लाई जाए और इसके लिए सख्त कदम उठाए जाएं. साथ ही कुछ समय के लिए या यूं कहें कि 31 मार्च, 2014 तक सोने के आयात पर पूरी तरह बाबंदी लगा देनी चाहिए. इसके अलावा गैरजरूरी इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, जैसे मोबाइल फोन, जिनके आयात में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है, के आयात पर भी 31 मार्च, 2014 तक पाबंदी लगा दी जानी चाहिए. यदि मार्च तक ये कदम उठाए जाते हैं, तब चालू वित्तीय घाटा भी नियंत्रण में आ जाएगा. साथ ही रुपये के कमजोर होने की वजह से बाजार में जो भय और अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है, वह भी नियंत्रण में आ जाएगा.
निःसंदेह इन कदमों का विरोध विश्‍व व्यापार संगठन और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में होगा, लेकिन मेरा मानना है कि यदि कोई देश संकट का सामना कर रहा हो, तब परिस्थितियों को और गंभीर बनाने से बेहतर है कि उस देश को कुछ छूट दी जानी चाहिए. मैं नहीं जानता कि वित्त मंत्री के सलाहकार कौन लोग हैं. वित्त मंत्री स्वयं भी नव उदारवादी विचारधारा के साथ चलते हैं. वह खुद की स्थिति की गंभीरता को समझते हैं. फिर ऐसे में भला आप अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कैसे होने दे सकते हैं. मैं आशा करता हूं कि इस मसले पर वह जल्द ही तेजी के साथ कुछ आवश्यक कदम उठाएंगे. दूसरी तरफ, अंततः संसद सुचारु ढंग से चलने लगी, यह एक अच्छी खबर रही. संसद में खाद्य सुरक्षा बिल पास हो गया. निश्‍चित तौर पर सरकार के लिए यह बड़ी जिम्मेदारी का विषय है, जिसका वायदा उन्होंने देश की 67 प्रतिशत जनता से किया है कि वे उन्हें  खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराएंगे, लेकिन बड़ा सवाल तो यह है कि खाद्यान्न के लिए पैसा कहां से आएगा. उसका वितरण और भंडारण कैसे होगा?
इस योजना में खर्च होने वाले धन की अनुमानित लागत 1.25 लाख करोड़ से 3 लाख करोड़ रुपये के बीच आएगी. हालांकि सब बातें कुछ वर्षों के बाद ही सामने आएंगी, लेकिन सरकार जो कुछ भी करने जा रही है, उसके लिए गंभीरता से निरीक्षण करने की जरूरत है कि यह क्रियान्वित कैसे होगा. सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पहले से ही कई राज्यों में सही ढंग से लागू नहीं हो पा रही है. यद्यपि तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में खाद्य सुरक्षा बिल में प्रदान की गई खाद्य सुरक्षा से बेहतर खाद्य सुरक्षा योजनाएं लागू हैं. इस बिल को प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित करने के लिए सरकार को एक ऐसी मशीनरी बनानी होगी, जो इसकी निगरानी गंभीरता से करे और इसे सही ढंग से लागू करने के लिए काम करे.
हमेशा की तरह इस बार भी खाद्य सुरक्षा बिल के संसद में प्रस्तुत होने से पहले गतिरोध बना हुआ था और इस बार मसला था कोयला घोटाले से जुड़ी फाइलों का मंत्रालय से गायब हो जाना. यह बड़ी ही बेवकूफी भरी सफाई है कि फाइलें मंत्रालय से गायब हो गईं. वास्तव में फाइलें सोच-समझ कर गायब की गईं. सभी को यह मालूम है कि कोल ब्लॉक का आबंटन बिना किसी कार्यवाही के, बिना टेंडर निकाले और बिना किसी मानक के आधार पर कर दिया गया था. इसलिए अगर फाइलें मिल जाती हैं तो ऐसे कई मंत्री, पूर्व मंत्री और पूंजीपति कठघरे में खड़े होंगे, जिन्होंने कोल ब्लॉक आबंटन में होने वाली अनियमितता का फायदा उठाया है.
इस आबंटन में एक कंपनी ऐसी भी है, जो कभी भी कोयले के व्यापार में नहीं थी, लेकिन उस कंपनी के नाम पर भी कोयले की खदान आबंटित की गई. और इस आबंटन के लिए कंपनी ने एक राष्ट्रीयकृत बैंक से हजारों करोड़ रुपये उधार भी लिए. अब, जब इस पूरे प्रकरण में होने वाली अनियमितताओं का खुलासा हो रहा है तो भला बैंक कैसे अपना पैसा वापस हासिल कर पाएगा? चूंकि यह मामला उच्चतम न्यायलय और सीबीआई के पास है, इसलिए फाइलों को अन्य विभागों में उपलब्ध सभी दस्तावेजों के आधार पर पुनः बनाने की कोशिश करना आवश्यक है. सीएजी का कहना है कि उनके पास सारे दस्तावेज उपलब्ध हैं, लेकिन किसी ने भी इस संबंध में उनसे जानकारी नहीं ली है.
एक बार फिर मैं प्रधानमंत्री से केवल निवेदन ही कर सकता हूं, वह भी इसलिए, क्योंकि उस दौरान कोयला मंत्रालय उनके पास था. हालांकि प्रधानमंत्री हर एक फाइल को नहीं देख सकते हैं, लेकिन उन्हें सच के साथ सामने आना चाहिए. उस समय जो कोई भी उनके कार्यालय का राज्यमंत्री अथवा सचिव रहा हो, जिन्होंने इस तरह नियम के विरुद्ध काम करने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप लाखों करोड़ रुपये का सरकार को नुकसान हुआ, यह लाखों करोड़ रुपया सरकार के खाते में वापस आना चाहिए.
देश के लिए यह काफी सुखद है कि आखिरकार प्रधानमंत्री ने अपनी चुप्पी तोड़ी. ससंद के दोनों सदनों में प्रधानमंत्री ने अपनी बात रखी. वह बहुत ही विनम्र, गंभीर और सम्मानित व्यक्ति हैं और अपने तर्कों से विपक्ष को लाजवाब करने की योग्यता रखते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वे अपनी बात रखने के लिए इसी तरह से सामने आएं. मुझे लगता है कि ज्यादा पारदर्शिता बरतने से कांग्रेस पार्टी और प्रधानमंत्री, दोनों को मदद मिलेगी.

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