पूर्वी चंपारण में क्यों ज़रूरी है सीआरपीएफ कैंप की तैनाती? इस कैंप को यहां से हटाने के सरकारी फैसले का क्यों विरोध कर रहे हैं लोग? पेश है चौथी दुनिया की रिपोर्ट…

page6crpfबिहार के पूर्वी चंपारण का मधुबन थाना क्षेत्र. 23 जून, 2005. यहां दिन के उजाले में अचानक सैकड़ों माओवादी हमला बोलते हैं. एक साथ बैंक, थाना और राजद के तत्कालीन सांसद सीताराम सिंह का घर उनका निशाना बनते हैं. पुलिस वहां पहुंचती है और दोनों तऱफ से सैकड़ों राउंड गोलियां भी चलती हैं. दो दर्जन से ज़्यादा लाशें गिरती हैं, जिनमें नक्सली से लेकर पुलिस और आम आदमी तक शामिल हैं. यह नक्सली हमला उस वक्त की राष्ट्रीय घटना थी और बिहार में पिछले कई सालों में हुआ सबसे बड़ा नक्सली हमला था. इस घटना को आठ साल बीत चुके हैं. इस दौरान चंपारण सहित पूरे उत्तर बिहार में माओवादियों की पैठ और गहरी होती चली गई. आलम यह हो गया कि इन क्षेत्रों में सरकारी काम कराने के लिए अफसरों से लेकर ठेकेदारों तक को माओवादियों की शर्तें माननी पड़ती थीं और अभी भी कमोबेश माननी पड़ती हैं. लेवी तक दिए जाने की खबरें आती रहती हैं. अकेले पूर्वी चंपारण जिला मुख्यालय मोतीहारी की जेल में दर्जनों हार्डकोर नक्सली बंद हैं.

भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से इस बटालियन को हटाकर छत्तीसगढ़ ले जाने का आदेश दे दिया गया है. सरकार का तर्क है कि वहां सीआरपीएफ बल की ज़्यादा संख्या की ज़रूरत है. उत्तर बिहार के  मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, सीतामढ़ी और शिवहर क्षेत्र में नक्सलियों का अच्छा-खासा असर है. जाहिर है, इन इलाकों को संभालने के लिए सीआरपीएफ कैंप का बना रहना ज़रूरी है.

बहरहाल, 2003 में पूर्वी चंपारण में सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 153वीं बटालियन तैनात की गई थी. इस तैनाती के बाद भले ही नक्सलवाद की समस्या का खात्मा न हुआ हो, लेकिन उस पर अंकुश ज़रूर लगा. हालांकि छिटपुट नक्सली घटनाएं फिर भी होती रहीं. जिस तरह से यह इलाका नेपाल से सटा हुआ है और नेपाली माओवादियों से इनके संपर्क हैं, चंपारण के इलाके में फिर से वैसी कोई बड़ी घटना नहीं घटी, जैसी 2005 में घटी थी. लेकिन न जाने वह कौन सी सरकारी या राजनीतिक मजबूरी है, जिसकी वजह से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 153वीं बटालियन को यहां से हटाने का फरमान केंद्र सरकार ने सुना दिया है. भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से इस बटालियन को हटाकर छत्तीसगढ़ ले जाने का आदेश दे दिया गया है. सरकार का तर्क है कि वहां सीआरपीएफ बल की ज़्यादा संख्या की ज़रूरत है. उत्तर बिहार के  मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, सीतामढ़ी और शिवहर क्षेत्र में नक्सलियों का अच्छा-खासा असर है. जाहिर है, इन इलाकों को संभालने के लिए सीआरपीएफ कैंप का बना रहना ज़रूरी है.

यह नक्सली हमला उस वक्त की राष्ट्रीय घटना थी और बिहार में पिछले कई सालों में हुआ सबसे बड़ा नक्सली हमला था. इस घटना को आठ साल बीत चुके हैं. इस दौरान चंपारण सहित पूरे उत्तर बिहार में माओवादियों की पैठ और गहरी होती चली गई.

ग़ौरतलब है कि पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने भी पत्र लिखकर राज्य सरकार को सूचित किया है कि यहां से सीआरपीएफ कैंप हटाने के निर्णय पर विचार किए जाने की ज़रूरत है. इस पत्र में सा़फ-सा़फ लिखा हुआ है कि नक्सलियों की गतिविधियों के कारण जिले में विकास कार्य पहले धीमी गति से चल रहे थे, लेकिन सीआरपीएफ कैंप तैनात किए जाने के बाद विकास कार्यों में तेजी आ गई है. जिलाधिकारी ने लिखा है कि 153वीं बटालियन द्वारा जिले के फेनहारा, मधुबन, पताही, तेतरिया, पकड़ीदयाल, चिरैया, ढाका, घोड़ासाहन क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया. सीआरपीएफ एवं जिला पुलिस द्वारा साथ मिलकर काम करने से नक्सली गतिविधियों पर अंकुश लगा. कई हार्डकोर नक्सली गिरफ्तार हुए, तो कई मुठभेड़ में मारे गए. ऐसे में, इस क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों पर अंकुश लगाए रखने के लिए इस बटालियन की प्रतिनियुक्ति जारी रखने की ज़रूरत है. बावजूद इसके, अगर राज्य सरकार जनता की मांग को अनसुना कर देती है और इस मांग को पुरजोर तरीके से केंद्र सरकार के समक्ष नहीं रखती है, तो इसे क्या कहा जाएगा?

फैसले का विरोध

चंपारण के लोगों ने सरकार के इस निर्णय का विरोध करना शुरू कर दिया है. पिछले दिनों शहर में आम लोगों ने इस निणर्र्य के विरोध में प्रदर्शन से लेकर ट्रेन तक रोक कर अपना विरोध जताया. लोगों ने एनएच-28 को जामकर सीआरपीएफ को उत्तर बिहार से हटाए जाने के निर्णय का विरोध किया. उन्होंने कहा कि माओवादी इसलिए कोई बड़ी वारदात नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि यहां पर सीआरपीएफ कैंप है और जब इस कैंप को ही हटा लिया जाएगा, तब क्या होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. यहां के लोग चाहते हैं कि गृह मंत्रालय अपने निर्णय पर फिर से विचार करे और उसे खारिज करे. पूर्वी चंपारण के समाजसेवी प्रभुनाथ तिवारी और आनंद प्रकाश इस मसले पर गृह सचिव आर के सिंह से मिलकर इस मांग को रख चुके हैं कि चंपारण से सीआरपीएफ कैंप न हटाया जाए. उन्होंने जिले के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, व्यवसायी संघ, ठेकेदारों की संस्था, विभिन्न पंचायतों के मुखियाओं, ग्रामीण बैंकों के प्रबंधकों एवं राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों की ओर से लिखे गए अनुरोध पत्र भी गृह सचिव आर के सिंह को सौंपे, जिनमें सीआरपीएफ कैंप न हटाने की मांग की गई है. अब यह राज्य सरकार के प्रयास और केंद्र सरकार की मंशा पर निर्भर करता है कि वे इस संबंध में जनता की भावना के अनुरूप फैसला लेती हैं या फिर अपनी मनमर्जी चलाती हैं.

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