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संप्रग  यानी यूपीए सरकार ने 9 साल पूरे कर लिए. इन 9 सालों में सरकार ने क्या-क्या किया, इसे लेकर उसने एक रिपोटर्र् कार्ड भी प्रस्तुत किया. यह सब ठीक है और यह एक नियमित अभ्यास भी है, जो हर सरकार करती है. सरकार का यह काम ही है कि वह लोगों को बताए कि उसने अपने कार्यकाल में कब क्या किया, लेकिन इन नौ सालों में पहले पांच साल यूपीए सरकार के लिए अहम रहे. उसी दौरान उसने नए क़ानून और नई योजनाएं बनाईं, वह चाहे सूचना का अधिकार अधिनियम हो या नरेगा योजना या फिर न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल. लेकिन यहां एक सवाल ज़रूर उठता है कि यूपीए-2 ने बाद के चार सालों में क्या किया? इन चार वर्षों में यूपीए के पास दिखाने के लिए क्या बचा? कुछ नहीं. पहले पांच साल के विपरीत, बाद के चार सालों में तो स़िर्फ और स़िर्फ तथाकथित घोटाले ही सामने आए हैं.
इस रिपोर्ट कार्ड और उत्सव का उद्देश्य क्या है, इसे किसी के द्वारा भी समझा जा सकता है. ग़ौरतलब है कि एक वृद्धाश्रम या एक अनाथालय भी एक संस्थान के तौर पर कई सालों तक चलता है. यह सरकार भी नौ सालों तक चली. कैसे चली, यह बहस का विषय है. लेकिन यहां सवाल सरकार के लंबे समय तक चलने का नहीं है, बल्कि मूल सवाल यह है कि सरकार ने इतने लंबे समय तक क्या किया? जाहिर है, सरकार के पास अपनी उपलब्धि दिखाने एवं बताने के लिए घपलों-घोटालों के अलावा और क्या बचा है?
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है, जो संसद से जुड़ा है. पिछले कुछ सालों से ऐसी स्थिति बना दी जाती है, जिससे संसद अपना कार्य नहीं कर पाती, यानी कुल मिलाकर देखें, तो संसद को कार्य ही नहीं करने दिया जाता. संसद का उद्देश्य क्या है, अर्थ क्या है? इसका शाब्दिक अर्थ है, क़ानून पारित करने वाली एक संस्था. लेकिन संसद का एक और बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है, जैसा कि पश्‍चिमी देशों में, जहां लोकतंत्र लाया गया था, वहां के मुताबिक़ संसद बहस के लिए सक्षम हो, वह जनता के मन की बात सामने रख सके और उस पर चर्चा कर सके. और अगर ऐसा नहीं होगा, तो फिर जनता के भीतर गुस्सा पनपेगा, जो भयानक रूप भी ले सकता है. इसलिए यह ज़रूरी है कि जिस जनता ने आपको अपनी बात संसद के भीतर रखने के लिए चुनकर भेजा है, आप वह काम करें, यानी जनता के मूड, मांग और विचार को संसद में रखें, उस पर बहस-चर्चा करें और फिर क़ानून बनाएं. लेकिन ऐसा लगता है कि जानबूझ कर संसद को अपना काम नहीं करने दिया जाता है. दरअसल, ऐसी स्थितियां पैदा कर दी जाती हैं, ताकि संसद चले ही नहीं. विपक्ष का काम है, जनता के मुद्दे को उठाना और सरकार का काम है जवाब देना. अगर सरकार चुप रहती है और फिर संसद बाधित होती है, तो इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? अगर सरकार एक उपयुक्त जवाब नहीं देगी, तो एक उपयुक्त समाधान कहां से आएगा? अगर सरकार विपक्ष का सामना करने में सक्षम नहीं है, तो फिर क्या होगा?
दरअसल, यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह संसद को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था करे. उसे संवेदनशील होना चाहिए. अगर वह संवेदनशील नहीं है, तो फिर विपक्ष ज़िम्मेदार नहीं हो सकता. अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए ही इन लोगों को जनता चुनकर भेजती है. लोगों के लिए चिंता के कई विषय हैं, जैसे मुद्रास्फीति, भ्रष्टाचार और क़ानून-व्यवस्था की समस्या. आख़िर इन सब पर संसद के भीतर बहस क्यों नहीं होती है? सरकार यह क्यों नहीं बताती है कि उसने क्या क़दम उठाए हैं और क्या कार्रवाई की है. संसद को अपना काम करने से रोककर आप संसद का अपमान कर रहे हैं. अब वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री ख़ुद इन सारे मसलों को देखें और एक उचित समाधान निकालें.

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