महागठबंधन टूटने के बाद जदयू में बगावत का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. शरद यादव का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि इधर पार्टी के दो बड़े दलित चेहरे श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी ने बगावती तेवर दिखलाने शुरू कर दिए. दलितों के उत्थान के मामले को आधार बनाकर इन दोनों नेताओं ने अपनी सियासी लाइन भी करीब-करीब साफ कर दी है. जैसी कि उम्मीद थी जदयू ने इन दोनों नेताओं के बयानों को काफी गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई के संकेत दिए हैं. प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा है कि इन दोनों नेताओं को पद की लालसा थी. इच्छा पूरी नहीं होती है तो वह किसी दूसरे रूप में बाहर आ जाती है. जदयू इस मामले को गंभीरता से देख रहा है. अगर मामला पार्टी के खिलाफ जाएगा तो इन दोनों पर कार्रवाई होगी. जदयू अध्यक्ष ने कहा कि श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी को पार्टी फोरम पर बात रखनी चाहिए थी. दोनों नेताओं की निजी नाराजगी हो सकती है, लेकिन वे नीतीश कुमार की कार्यशैली के कायल रहे हैं. गौरतलब है कि श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी ने दलितों के साथ भेदभाव का मुद्दा उठाया है.

इन नेताओं का आरोप है कि सत्ता में बैठे नेेता दलितों के उत्थान के प्रति गंभीर नहीं हैं. आरक्षण से लेकर उनके सामाजिक और राजनीतिक सरोकार तक को दबाया जा रहा है. इसके अलावे ऑफ द रिकॉर्ड ये दोनों नेता बहुत सी ऐसी बातें कर रहे हैं जिससे यह आभास मिल रहा है कि जदयू के मौजूदा रवैये से वे खुश नहीं हैं और आगे कुछ नया करने का मन बना रहे हैं. सूत्र बताते हैं कि दो विकल्पों पर विचार हो रहा है. पहला यह कि आरोपों का सिलसिला जारी रखा जाए और शरद यादव के खेमे में शामिल हो जाया जाए. दूसरा रास्ता लालू प्रसाद के घर पर जाकर खत्म होता है. नीतीश कुमार को जानने और समझने वाले यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि जदयू में अब श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी की राह बहुत मुश्किल है. इसलिए वैकल्पिक रास्ता चुनना इन दोनों नेताओं की मजबूरी है. जानकार बताते हैं और जैसा कि वशिष्ठ बाबू ने इशारे ही इशारे में कहा कि मंत्री पद की लालसा थी जो धूमिल हो गई तो तेवर बदलने लगे. इसके अलावा अशोक चौधरी की नीतीश कुमार से बढ़ती नजदीकियों ने श्याम रजक और उदय नारायण के सारे समीकरणों को तार-तार कर दिया. सबसे पहला मामला जमुई लोकसभा सीट का है. श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी दोनों ही जमुई से चुनाव लड़ चुके हैं. नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल हो जाने से जमुई का मामला पेचीदा हो गया है.

यह सीट अभी लोजपा की सीटिंग है. यहां से रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान सांसद हैं. पिछली बार उदय नारायण चौधरी यहां से जदयू के उम्मीदवार थे और उन्होेंने काफी कड़ा मुकाबला किया था. उम्मीद थी कि इस बार फिर उदय नारायण चौधरी या श्याम रजक जमुई से चुनावी जंग में उतरेंगे, लेकिन जदयू और भाजपा के साथ आ जाने से पूरा खेल ही बदल गया. जमुई लोजपा की सीटिंग सीट है इसलिए इसमें फेरबदल की गुंजाइश नहीं के बराबर है, भले ही उम्मीदवार को लेकर अटकलें तेज हों. चिराग यहां से लड़ सकते हैं और नहीं भी लड़ सकते हैं, यह फैसला पूरी तरह उन्हें ही लेना है. लेकिन यह तय है कि यहां से लोजपा का प्रत्याशी ही चुनाव लड़ेगा. यही वजह रही कि महागठबंधन टूटने के बाद श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी को अपना बना बनाया खेल बिगड़ता दिखलाई पड़ने लगा. इसके बाद जिस तरह से अशोक चौधरी नीतीश कुमार के करीब आ गए, उससे भविष्य की राजनीति को लेकर भी श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी घबरा गए. उन्हें लगा कि अगर दलित के नाम पर नीतीश कुमार ने कुछ दिया भी तो पहला हक अब अशोक चौधरी को ही मिलेगा और उनका नंबर बाद में आएगा. पार्टी लाइन को दरकिनार कर अशोक चौधरी ने जब श्याम रजक के बयान की आलोचना कर डाली, तो रही सही कसर भी दूर हो गई.

उल्लेखनीय है कि चुनाव हारने के बाद भी उदय नारायण चौधरी का जमुई बराबर आना-जाना बना रहा और वहां के लोगों से वे मिलते-जुलते रहे हैं. उनकी सारी तैयारी चुनाव को लेकर ही थी. जदयू में श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी के अलावे जमुई में कोई उम्मीदवार भी नहीं था. इन दोनों नेताओं को ऐसा लग रहा था कि चूंकि नीतीश कुमार ने उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी इसलिए लोकसभा टिकट में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. लेकिन बिहार का सियासी चक्का ऐसा घूमा कि सारे समीकरण ही बदल गए. एनडीए की ओर से नो वेंकेंसी हो जाने के बाद इन नेताओं को आभास हो गया कि अब रास्ता बदलने में ही भलाई है इसलिए दलित उत्थान को ढाल बनाकर बयानों के तीर चलाने का काम शुरू कर दिया गया. जमुई को लेकर इन नेताओं को लग रहा है कि अगर लालू गठबंधन से टिकट मिल जाता है तो यह सीट निकाली जा सकती है. इनके लिए अच्छी बात यह है कि जमुई लोकसभा के लिए राजद के पास भी श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी के कद का कोई नेता नहीं है. इन दोनों नेताओं की नजर इस जिले के राजनीति को प्रभावित करने वाले नरेंद्र सिंह पर भी टिकी हुई है. नरेंद्र सिंह फिलहाल हाशिये पर हैं. अभी किसी भी गठबंधन में नरेंद्र सिंह सक्रिय नहीं हैं, बस केवल सही समय का इंतजार कर रहे हैं.

श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी को ऐसा लगता है कि नरेंद्र सिंह को अपने पाले में करके जमुई में राजनीतिक लड़ाई को आगे बढ़ाया जा सकता है. इससे पहले कि नरेंद्र सिंह को एनडीए लपके, उससे पहले ही श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी चाहते हैं कि नरेंद्र सिंह से बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाकर एक मजबूत राजनीतिक किलेबंदी की जाए, ताकि लोजपा की राह जमुई में आसान नहीं होने पाए. लालू प्रसाद ने जिस तरह से श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी के बयानों का स्वागत किया उससे एक मजबूत राजनीतिक संदेश गया है. उदय नारायण चौधरी ने तो ताल ठोक कर जदयू के प्रदेश अध्यक्ष को कार्रवाई के लिए ललकार दिया. लालू प्रसाद को भी रामविलास पासवान से अपना पुराना हिसाब चुकता करना है और इसके लिए जमुई से बेहतर मैदान उनको नहीं मिलने वाला है. अगर नरेंद्र सिंह को ये दोनों नेता अपने पाले में करने में सफल हो जाते हैं तो जमुई की लड़ाई काफी कांटे की हो जाएगी. अब नरेंद्र सिंह क्या करेंगे, यह कहना मुश्किल है क्योंकि उनके बड़े बेटे अजय प्रताप भाजपा में हैं और पिछला विधानसभा चुनाव कमल निशान पर लड़ चुके हैं. छोटे बेटे का झुकाव जदयू की तरफ है, ऐसे में नरेंद्र सिंह के लिए कोई फैसला लेना बहुत ही मुश्किल होगा. फिलहाल नरेंद्र सिंह वेट एंड वाच की स्थिति में हैं.

श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी के बयानों से शरद यादव खेमा काफी उत्साहित है. शरद यादव चाहते हैं कि नीतीश कुमार से नाराज सभी नेताओं को एकजुट किया जाय और फिर इसके बाद लालू प्रसाद से चुनावी तालमेल की बात आगे बढ़ाई जाए. लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है इसलिए नीतीश और भाजपा से खफा और ऐसे नेता जिनको एनडीए से टिकट मिलने की संभावना खत्म हो गई हो, उन्हें शरद खेमे से सहारा मिल सकता है. शरद यादव लगातार बिहार घूम रहे हैं और अपने लोगों को एकजुट कर रहे हैं. फिलहाल दलित उत्थान को लेकर श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी ने जो लड़ाई छेड़ी है वह आगे जाएगी यह तय है. लेकिन इसका राजनीतिक फलाफल जानने के लिए अभी थोड़ा इंतजार करना होगा.प

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