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योजना आयोग ने 27 और 33 रुपये से अधिक ख़र्च करने वाले लोगों को अति निर्धन की श्रेणी से बाहर रखा है. देश के अकर्मण्य नेता भी 5 और 12 रुपये में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में भर पेट खाना मिलने की बात कह रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि 2014 के चुनाव से पूर्व यूपीए सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड सुधारना चाहती है और इसी चक्कर में मूल तथ्यों को छिपाते हुए वह भ्रमित रिपोर्ट के द्वारा ग़रीबों के साथ नया खेल खेल रही है…

कमरतोड़ महंगाई से आम जनता त्रस्त है और लगभग पूरे भारत का यही हाल है. ऐसी स्थिति में यह कहना कि आप 5 रुपये में दिल्ली या 12 रुपये में मुंबई जैसे शहर में पेट भर खाना खा सकते हैं, तो निश्‍चित रूप से यह गरीबों के साथ भद्दा मज़ाक लगेगा. रशीद मसूद और राजबब्बर, दोनों ही कांग्रेस पार्टी से संबंध रखते हैं. ज़ाहिर है, अगर दोनों को योजना आयोग की रिपोर्ट को उचित बताने के लिए चापलूसी करनी पड़े, तो वे करेंगे. भले ही वह भोंडापन लगे. सवाल यह नहीं है कि मुंबई और दिल्ली में 5 और 12 रुपये में खाना मिलता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि योजना आयोग द्वारा भारत की ग़रीब जनता का इस तरह मज़ाक उड़ाना, यह इशारा करता है कि 2014 के चुनाव से पूर्व यूपीए सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड सुधारना चाहती है और इसी चक्कर में मूल तथ्यों को छिपाते हुए वह भ्रमित रिपोर्ट के द्वारा ग़रीबों के साथ नया खेल खेल रही है. अब सही क्या है और ग़लत क्या है, इससे पहले एक बार इस पर अवश्य नज़र डाल लें कि आख़िर योजना आयोग ने कहा क्या है?
आयोग के अनुसार, 2011-12 में ग़रीबी में उल्लेखनीय कमी आई है. हाल के आंकड़ों के अनुसार, देश में अब ग़रीबों की संख्या 27 करोड़ है. मतलब हर पांच में से एक शहरी ग़रीबी स्तर से नीचे जीवन-यापन करता है. इन आंकड़ों में आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में 27 रुपये और नगरों में 33 रुपये से अधिक ख़र्च करने वाले लोगों को अति निर्धन की श्रेणी में नहीं रखा है. आयोग ने ग़रीबी स्तर को मापने के लिए तेंदुलकर फॉर्मूले का प्रयोग किया है. हालांकि सरकार ने ग़रीबी स्तर के लिए जून 2012 में प्रधानमंत्री के वित्तीय सलाहकार समिति के चेयरमैन रंगराजन के नेतृत्व में एक विशेष समूह गठित किया था, लेकिन सरकार ने चुनाव को ध्यान में रखते हुए साल 2014 के मध्य तक पेश होने वाली इस रिपोर्ट का इंतज़ार करना उचित नहीं समझा और जल्दबाज़ी दिखाते हुए तेंदुलकर प्रक्रिया की बुनियाद पर नये आंकड़े देकर पूरे देश को चौंका दिया. ग़रीब तो ग़रीब, मध्यम वर्ग भी इन आंकड़ों को देखकर भौंचक्का रह गया. अजीब विडंबना तो यह है कि 27 और 33 रुपये, जिसमें इस दौर में एक फुटपाथ पर रहने वाला या रिक्शा चलाने वाला भी पेट नहीं भर सकता, उसे ग़रीबी सीमा से बाहर रखा गया है. 816 रुपये मासिक गांव में और एक हज़ार रुपये मासिक नगर में कमाने वाले कैसे ग़रीबी सीमा से ऊपर उठ गए, इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है. पिछले पांच सालों का अवलोकन करें, तो ग़रीबी तो दूर की बात है, मंहगाई में इतनी बढ़ोत्तरी हो चुकी है कि मध्यम वर्ग तो परेशान है ही, अमीर वर्ग भी अब परेशानी महसूस करने लगा है. पेट्रोल, डीज़ल के बढ़ते दामों ने तमाम पदार्थों के दाम बढ़ा दिए हैं. घर में रोटी तो मुश्किल हो ही गई है, साथ ही बच्चों की पढ़ाई और शादी-ब्याह के ख़र्च भी मध्यम और अमीर वर्ग के लिए मुश्किल हो गए हैं. जिनके पास अंधी कमाई है, जिनके पास काला धन है, राजनीतिज्ञों, ऊंचे पदों पर आसीन सरकारी नौकरीपेशों, भ्रष्टाचारी और बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों को छोड़ दिया जाए, तो साधारण वर्ग महंगाई से त्रस्त है. भारत की ग़रीब जनता का पैसा तो यूपीए सरकार ने घोटालों में लगा दिया. अरबों-खरबों के घोटाले ऐसे हुए कि इन घोटालों की रक़म की गिनती लिखना हम भूल जाएं.
भ्रष्टाचार, रुपये में गिरावट, खाद्य पदार्थों के मूल्यों में भारी बढ़ोत्तरी और साथ ही सरकार की ग़लत नीतियों ने भारत की आर्थिक स्थिति को बेहद ख़राब कर दिया है. ज़ाहिर है, इसका असर प्रत्यक्ष रूप से ग़रीब और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है. सरकार जिस प्रकार अपनी नाक़ामियां छिपाने का प्रयास कर रही है, इससे तो यही कहा जा सकता है कि यह सरकार ग़रीबों को सरकारी योजनाओं से वंचित करने का ष़डयंत्र कर रही है. इस बयान पर बहुत बहस हुई और अधिकतर की यही राय थी कि सरकार सिर्फ और स़िर्फ  तथ्यों को छिपाते हुए 2014 के चुनाव की तैयारी कर रही है.
ज़ाहिर है कि विपक्ष सरकार के विरुद्ध जाएगी, लेकिन कांग्रेस के अपने कुछ राजनीतिज्ञों के पास इसका जवाब नहीं था कि आख़िर किस बुनियाद पर यह आंकड़े दिए गए हैं. भाजपा नेता तो इसके लिए सरकार को खुला चैलेंज कर रहे हैं कि आख़िर कोई भी प्रतिदिन 34 रुपये पर कैसे ज़िंदा रह सकता है. भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं कि यह एक ष़डयंत्र है, ताकि ग़रीबों को ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वालों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की योजनाओं से वंचित किया जाए. भाजपा का सवाल है कि आख़िर कोई व्यक्ति 34 रुपये में कैसे पेट भर सकता है. इसका जवाब यही हो सकता है कि संसद की कैंटीन में 18 रुपये की थाली मिलती है, लेकिन क्या आम आदमी का यहां से गुज़र हो सकता है. आम आदमी तो संसद के क़रीब भी नहीं फटक सकता. यानी सबसे अधिक ग़रीब बेचारे नेता हैं. लाखों रुपये महीना कमाने वाले ये नेता हर प्रकार की सुविधाओं का आनंद उठा रहे हैं. ऐसे में आम आदमी के दुख-दर्द का इन भ्रष्ट नेताओं को कैसे पता होगा. दूसरी तरफ़ ग़रीब आदमी मूल सुविधाओं से भी वंचित है. इसके लिए बिजली, पानी, अनाज, दालें, सब्ज़ियां और शिक्षा सब कुछ इतना मंहगा है कि इसकी कमर ही टूट  गई है.
अगर हम 20 मार्च, 2012 की रिपोर्ट पर गौर करें, तो इसके अनुसार 2004 से 2012 के बीच पांच करोड़ लोगों को ग़रीबी रेखा से बाहर निकालने की बात उचित नहीं ठहराई जा सकती है. 2011 में भी सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर हलफ़नामे में कहा था कि 32 रुपये प्रतिदिन कमाई की क्षमता रखने वालों को अति निर्धन की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता.
इस समय सरकार ने सिविल सोसाइटी और राजनीतिक पार्टियों के दबाव के बाद यह आश्‍वासन दिया था कि ग़रीबों को चिन्हित करके सच्चाई को सामने लाने की पूरी कोशिश की जाएगी, लेकिन आज सरकार फिर वही राग अलाप रही है. मनरेगा जैसी रोज़गार योजना में अगर हर महीने कोई व्यक्ति दस दिन का भी रोज़गार प्राप्त कर ले, तो ग़रीबी रेखा से बाहर निकल जाएगा. मूर्खता की बात यह है कि 2 साल पहले यह पैमाना 26 व 32 और दो साल बाद 27 और 34 रुपये हो गई. केवल एक या दो रुपये की बढ़ोत्तरी पर कोई ग़रीबी रेखा से बाहर कैसे निकल सकता है. क्या किसी को यह नहीं मालूम है कि 2 सालों में महंगाई कहां से कहां पहुंच गई है. दो साल पहले इसी फ़ॉर्मूले को लेकर सरकार को जिल्लत उठानी पड़ी थी. अब पुन: सरकार केवल एक रुपये के अंतर से वही बात क्यों कह रही है. एक ब़डा सवाल यह भी है कि ये नीतियां बनाने वाले अर्थशास्त्री क्या इस सवाल का जवाब दे सकते हैं कि गांव में रहने वाला 5 लोगों का परिवार हर दिन 135 रुपये और हर महीने 4080 रुपये में कैसे गुज़ारा करेगा और शहरों में रहने वाला 5 लोगों का परिवार 5 हज़ार रुपये महीना पर गुज़ारा कर लेगा, तो यह निश्‍चित ही आंख बंद कर किया जाने वाला सर्वे है और स्वयं मनमोहन सिंह की साख इसे लेकर दांव पर लगी है. बड़ा सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री स्वयं एक अर्थशास्त्री होकर ऐसे आंकड़े कैसे दे सकते हैं?
इस रिपोर्ट में ग़रीबों की संख्या में सबसे अधिक कमी बिहार और उड़ीसा में आई है, जबकि ग़रीबी की दृष्टि से सबसे अधिक ख़राब स्थिति छत्तीसगढ़, झारखंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और बिहार में है. गोवा में केवल 5 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं. इसके अलावा केरल, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और पांडिचेरी में ग़रीबों की संख्या 10 प्रतिशत से कम हुई है. इन सभी राज्यों से तुलना की जाए, तो यूपी, बिहार, बंगाल में ग़रीबी तेज़ी से बढ़ी है. दिल्ली जैसे शहर में तो 33 रुपये में पेट भरना असंभव है, लेकिन इन राज्यों में एक फुटपाथ पर सोने वाला साधारण मज़दूर या कोई भीख मांगने वाला फ़क़ीर भी 33 रुपये में पेट नहीं भर सकता.
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि 2011-12 में गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार की स्थिति बहुत ख़राब थी. वाइज़न ने कहा था कि मुसलमानों में ग़रीबी और पिछड़ेपन की दर सबसे अधिक है. विशेष रूप से असम, उत्तर प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल और गुजरात के गांव, वाइज़न के अनुसार, सामूहिक रूप से मज़दूर वर्ग के लोग अधिक संख्या में ग़रीबी रेखा से नीचे हैं. 50 प्रतिशत खेती में लगे हुए मज़दूर और 40 प्रतिशत दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले मज़दूर इस श्रेणी में आते हैं. आज जब योजना आयोग अपनी 2 साल पुरानी रिपोर्ट पेश कर रहा है, तो वाइज़न की इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि नि:संदेह भारत के ख़ात्मे के लिए काफी काम किया है, लेकिन गांव-देहातों में मज़दूरों और किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय है और उन्हें दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं.
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री विद्वान अमर्त्य सेन कुछ महीने पहले दिल्ली के आईआईटी हॉल में आयोजित एक प्रोग्राम में आए थे. इसमें उन्होंने भारत सरकार के ग़रीबों में सब्सिडी आवंटित करने की योजना पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पैसे देने की यह योजना ग़रीबों को अनाज उपलब्ध नहीं कराती. भ्रष्टाचार से बचने के लिए ग़रीबों के नक़द सब्सिडी की यह योजना और भी ख़तरनाक है, क्योंकि कौन ग़रीब है कौन नहीं, यह साबित करने में ही बहुत भ्रष्टाचार है. जो लोग इन ग़रीबों को चिन्हित करेंगे, वह कितने ईमानदार हैं, इस पर भी सवाल उठाया जा सकता है. योजना आयोग के अनुसार, 2011-12 में गावों में कुल आबादी का 25.7 प्रतिशत ग़रीब थे और शहरों में 13.7 प्रतिशत. आयोग ऐसा मानता है कि हर साल 2 प्रतिशत से अधिक की दर से ग़रीबी कम हो रही है. नये आंकड़ों में 2004-2005 से 2011-12 के सात सालों में ग़रीबी घटने की दर 3 गुना कम हो गई है.
यह आंकड़े केवल सरकार की चाल हैं. सरकार को रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट का इंतज़ार करना चाहिए था. अगर विशेषज्ञों की मानें, तो ग़रीबी रेखा का ग्राफ़ कुछ इस प्रकार बनता है, जिसे दिखाया नहीं गया है.
आंकड़े वर्तमान में ग़रीबी रेखा की जो भी तस्वीर पेश कर रहे हों, लेकिन अगर हम दिल्ली और सभी राज्यों की समीक्षा करें, तो आज भी हमें ग्रामीण जीवन बहुत ही पिछड़ी नज़र आती है. पांच रुपये, 27 रुपये या कम से कम 100 रुपये में भी एक दिन का ख़र्च नहीं निकल सकता और शहरों में तो यह और भी अधिक है. यहां आटा-दाल का भाव देख कर भी यह साबित किया जा सकता है कि भारत की स्थिति अब भी अत्यंत ख़राब है. महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी पिछले 10 सालों में और अधिक बढ़ी है, घटी नहीं है. हुआ यह है कि ग़रीब और ग़रीब और अमीर और अमीर होता गया.
वृंदा करात के बयान से हम इस पूरी चर्चा का अंत कर सकते हैं कि ग़रीबी के आंकड़े ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के लिए हैं, न कि उनसे हमदर्दी जताने के लिए. सवाल यह उठता है कि क्या राजबब्बर या रशीद मसूद जैसे लोग ग़रीबों के हमदर्द हो सकते हैं? हमारे हिसाब से तो संसद की कैंटीन को ग़रीबों के लिए खोल देना चाहिए. ऐसी सरकार भला कैसे ग़रीबों की हमदर्द हो सकती है और कैसे ग़रीबी के स्तर को माप सकती है, यह गंभीर सवाल है.
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री विद्वान अमर्त्य सेन कुछ महीने पहले दिल्ली के आईआईटी हॉल में आयोजित एक प्रोग्राम में आए थे. इसमें उन्होंने भारत सरकार के ग़रीबों में सब्सिडी आवंटित करने की योजना पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पैसे देने की यह योजना ग़रीबों को अनाज उपलब्ध नहीं कराती. भ्रष्टाचार से बचने के लिए ग़रीबों के नक़द सब्सिडी की यह योजना और भी ख़तरनाक है, क्योंकि कौन ग़रीब है कौन नहीं, यह साबित करने में ही बहुत भ्रष्टाचार है. जो लोग इन ग़रीबों को चिन्हित करेंगे, वह कितने ईमानदार हैं, इस पर भी सवाल उठाया जा सकता है.

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  1. गरीब अमीर का फैसला एसी रूमों में बैठ कर नहीं किया जा सकता । नेताओं को चाहिए घर से बहार निकल कर देखे पता चल जाएगा ।

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