कश्मीरी झेल रहे हैं विभाजन का दंश

जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक भारत के सभी प्रधानमंत्री आपसी विवादों को हल कर पाकिस्तान से अच्छे संबंध चाहते हैं. कश्मीर मसले पर दोनों ही देश आमने-सामने हैं. दोनों ही देश समझते हैं कि विभाजन गलत था और कश्मीरी उस गलती की सजा भुगत रहे हैं. यह मसला अभी जारी रहेगा.

सीमाओं पर देश दूसरी तरफ से पैदा की गई मुश्किलों से दो-चार हो रहा है, तो देश के आंतरिक हिस्से सांप्रदायिक दंगों की चपेट में हैं. अभी तक हल न हो सकने वाले इन सभी मसलों का दंश विभाजन और आजादी के दौर से ही हम झेल रहे हैं. और स्वतंत्रता की 66वीं वर्षगांठ तक यह समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं.

लगता है भारत के लिए दो समस्याएं चिरस्थाई हो गई हैं. पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर. दोनों आपस में एक दूसरे से गुंथी हुई हैं. दूसरी समस्या को हल किए बिना पहली समस्या से निपटा नहीं जा सकता और दोनों ही समस्याएं तभी हल की जा सकती हैं, जब तक विभाजन से पैदा हुई मुश्किलें हल न हो जाएं और इन मुश्किलों को एक-दूसरे पर हमला करके कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता. हां, बातचीत से इस मसले को हल किया जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से इस ओर कभी कोशिश ही नहीं की गई. हमें यह समझना होगा कि केवल बातचीत ही वह जरिया है, जो इन मुश्किलों को हल कर सकता है, लेकिन हो रहा है इसके विपरीत और दोनों ही देशों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर इसे जीवित कर रखा है. इसकी परिणति यह है कि दोनों ही देश भय और आतंक के साये में जी रहे हैं.

मेरा एक दार्शनिक दोस्त है, जो भारतीय मूल का है. उसके नाम का मैं खुलासा नहीं करना चाहता. उसने मुझे सुझाव देते हुए कहा कि भारत को चाहिए कि वह कश्मीर पाकिस्तान को सौंप दे. उसका तर्क था कि पाकिस्तान के भीतर जो एकजुटता और एकमत है, वह केवल इस बात को लेकर है कि कश्मीर को भारत से हासिल ही करना है और अगर भारत पाकिस्तान को कश्मीर दे दे, तो उसके भीतर की यह एकजुटता खत्म हो जाएगी. हालांकि मैं इस मत का पक्षधर नहीं हूं. हो सकता है कि ऐसा हो, लेकिन अगर आजाद कश्मीर को लेकर पाकिस्तान भी ऐसी ही सोच रखता हो, तो क्या होगा? भारत इस मसले को कैसे संभालेगा.

तब क्या भला इतनी बड़ी सेना को लगाने की जरूरत वहां होगी. नहीं. मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं को बंद करने की जरूरत होगी. नहीं, लेकिन यह भी तो हो सकता है कि दोनों आजाद कश्मीर मिलकर एक हो जाएं और एक अलग राष्ट्र बनाने की मांग करने लगें. तब तो भारत एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उस पर कब्जा करने की कोशिश करेगा.

जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह, भारत के सभी प्रधानमंत्रियों ने अपने भाषणों में यह कहा कि वे पाकिस्तान से अच्छे संबंध बनाना चाहते हैं तथा सभी विवादों को हल करना चाहते हैं. हो सकता है कि जो आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री बनें, वे भी इसी राग में शामिल हो जाएं. तीन प्रधानमंत्रियों लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से युद्ध लड़ा और जीते. यद्यपि इन तीनों ही युद्धों के बाद पाकिस्तान को यह सबक नहीं सिखाया जा सका कि वह इस गलती को न दोहराए. इसलिए यह तो तय है कि युद्ध इन दोनों देशों के बीच की समस्या का हल नहीं हो सकता.

हालांकि हमें यह रास्ता भी नहीं मिल पाया है कि जम्मू-कश्मीर पर शांतिपूर्वक शासन कैसे किया जाए. हालांकि इसमें बड़ा दोष पाकिस्तान का भी है. पाकिस्तान आजाद कश्मीर के लिए लड़ रहा है. जो उन्हें मिला है, वे इस बात में संतोष कर सकते हैं. हम अगर कश्मीर को अपने देश का अंग मानते हैं, तो हमें उन्हें तवज्जो भी देनी होगी. क्या देश के अन्य हिस्सों में भी उतनी ही सेना है. नहीं. तो क्या देश के अन्य हिस्से देश का अंग नहीं हैं. हमें कश्मीर तक रेल सेवा बहाल करने में 66 साल लग गए, जबकि चीन ने बलिस्तिस्तान से अरब सागर के किनारे तक रेल लिंक बना लिया, जबकि वह उनकी सीमा में भी नहीं आता. कश्मीर के किसी युवा को भारतीय क्रिकेट टीम से जुड़ने में 66 साल लग गए. अब तक हमें यह भी नहीं पता था कि वे क्रिकेट भी खेलते हैं. किसी भी कश्मीरी को आईपीएल में कोई फ्रेंचाइजी नहीं मिली है.

अगर वहां पर बेरोजगारी है, तो किसी युवा को क्या फर्क पड़ता है. इसके लिए कई सारी कमेटियां गठित की गईं, लेकिन उन कमेटियों ने क्या संस्तुतियां दीं, इस बारे में आज तक किसी को कोई जानकारी नहीं. कश्मीरी तब तक वीजा नहीं हासिल कर सकते, जब तक वे यह स्पष्ट न कर दें कि उनका संबंध किसी आतंकवादी संगठन से नहीं है. हालांकि यह स्पष्ट करना थोड़ा कठिन है, क्योंकि अगर किसी का संबंध आतंकवादी संगठन से है ही नहीं, तो फिर वहां सेना क्या कर रही है.

भारत कश्मीर के लिए उतना ही प्रतिबद्ध है, जितना कि पाकिस्तान. दोनों ही देश घाटी पर कब्जा करना चाहते हैं बिना यह समझे हुए कि वहां की जनता क्या चाहती है. जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो लेजिस्लेटर से केवल पंजाब और बंगाल के संदर्भ में सलाह ली गई. प्रिंसली स्टेट का मामला अलग था. कश्मीर के मसले पर दोनों ही देश आमने-सामने हैं.

भारत कश्मीर के लिए उतना ही प्रतिबद्ध है, जितना कि पाकिस्तान. दोनों ही देश घाटी पर कब्जा करना चाहते हैं बिना यह समझे हुए कि वहां की जनता क्या चाहती है. जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो लेजिस्लेटर से केवल पंजाब और बंगाल के संदर्भ में सलाह ली गई. प्रिंसली स्टेट का मामला अलग था. कश्मीर के मसले पर दोनों ही देश आमने-सामने हैं. दोनों ही देश समझते हैं कि विभाजन गलत था और कश्मीरी उस गलती की सजा भुगत रहे हैं. यह मसला अभी जारी रहेगा.

 

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