सरकार को जनता का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसे मुसीबतों से बचाने के लिए रणनीति एवं योजनाएं बनाना उसी की ज़िम्मेदारी है. संविधान का अक्षरश: पालन हो, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए. किसी भी सरकार या राजनीतिक दल को राजनीति देश एवं समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि जोड़ने, विकास, जनता को रोजी-रोटी मुहैय्या कराने के लिए करनी चाहिए. जनता के प्रति वह कितनी ईमानदार है, यह उसके फैसलों में झलकना भी चाहिए. लेकिन अफसोस!  आज स्थिति इसके ठीक विपरीत है. काम की बजाय जातीय आधार पर वोट बैंक मज़बूत करने के लिए दहशतगर्दों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, दुराचारियों एवं हत्यारों को छोड़ा जा रहा है और सत्याग्रहियों एवं पीड़ितों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं.

page-6उत्तर प्रदेश सरकार कितनी संवेदनशील है, इस बात का एहसास बीते दिनों गोरखपुर से आईं दो अलग-अलग खबरों ने स्वत: करा दिया. एक तऱफ अपना वोट बैंक मज़बूत करने के चक्कर में सपा सरकार ने बिना सोचे-समझे और ख़ुफ़िया एजेंसियों की रिपोर्ट दरकिनार करके गोररखपुर सीरियल ब्लास्ट के आरोपी तारिक काज़मी के खिलाफ मुक़दमा वापस लेने का फरमान जारी कर दिया, वहीं दूसरी ओर गोरखपुर ज़िला प्रशासन की बर्बरता के चलते स्थानीय कम्हरिया घाट पर पक्के पुल के लिए हो रहे जल सत्याग्रह के सातवें दिन जमकर लाठियां भांजी गईं. उक्त सत्याग्रही काफी समय से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे. सरकार और ज़िला प्रशासन पर आंदोलन का कोई असर न होता देखकर बीते 24 अप्रैल की सुबह चार सत्याग्रही जल-समाधि के लिए नदी में कूद पड़े. इससे घटनास्थल पर अफरातफरी मच गई. वहां मौजूद अन्य सत्याग्रहियों को तो किसी तरह बचा लिया गया, लेकिन प्रतिक्रिया स्वरूप गुस्साए ग्रामीणों ने अधिकारियों पर हमला बोल दिया. उन्होंने एडीएम, एसपी, एसडीएम एवं तहसीलदार को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा. अधिकारियों ने भागकर किसी तरह अपनी जान बचाई. उधर, अधिकारियों को पीटता देखकर पुलिस ने ग्रामीणों पर लाठीचार्ज कर दिया. जवाब में ग्रामीणों ने भी पथराव किया. लगभग एक घंटे तक प्रशासन और ग्रामीणों के बीच संघर्ष जैसी स्थिति बनी रही, जिसमें कई अधिकारी एवं क़रीब डेढ़ दर्जन ग्रामीण घायल हो गए, जिन्हें अस्पताल में दाखिल कराया गया.

राज्य की गूंगी-बहरी अखिलेश सरकार को जगाने के लिए केवल गोरखपुर में ही आंदोलन नहीं हो रहा है, बल्कि जल, ज़मीन, जंगल बचाने के लिए लोग जगह-जगह सड़क पर उतर चुके हैं. किसान संघर्ष समिति के सैकड़ों कार्यकर्ता आगरा से पद यात्रा करके समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को उनके वादे की याद दिला रहे हैं. किसान यह पदयात्रा अपनी वह कृषि भूमि बचाने के लिए कर रहे हैं, जिसका बसपा शासनकाल में जबरन अधिग्रहण कर लिया गया था.

पुलिस ने न स़िर्फ आंदोलनकारी ग्रामीणों को पीटा, बल्कि उनका सारा सामान भी ज़ब्त कर लिया. प्रशासन ने आसपास के इलाक़े में धारा 144 लगा दी, ताकि लोग एकत्र न हो पाएं. ग़ौरतलब है कि जल सत्याग्रहियों ने प्रशासन को 24 अप्रैल तक की मोहलत दी थी और मांग न माने जाने पर 11 बजे जल-समाधि लेने का ऐलान किया था. इसीलिए किसी भी हालात से निपटने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला मौक़ेपर पहुंच गया था. उस समय जल सत्याग्रही पूजन कर रहे थे. प्रशासन ने उन्हें समझाने का प्रयास भी किया, लेकिन वे पुल निर्माण को मंजूरी संबंधी नाबार्ड के आदेश की प्रति देखना चाह रहे थे. अधिकारी काफी देर तक कहते और समझाते रहे कि आदेश की प्रति आ रही है, लेकिन 11.30 बजे अचानक प्रशासन अपनी बात से मुकर गया और उसने कहा कि 22 अप्रैल को बैठक नहीं हो पाई. यह जवाब सुनकर चार आंदोलनकारियों ने नदी में छलांग लगा दी. दरअसल, इस सत्याग्रह को हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है, कहीं कैंडिल मार्च निकाले जा रहे हैं, तो कहीं प्रदर्शन हो रहे हैं. राज्य की गूंगी-बहरी अखिलेश सरकार को जगाने के लिए केवल गोरखपुर में ही आंदोलन नहीं हो रहा है, बल्कि जल, ज़मीन, जंगल बचाने के लिए लोग जगह-जगह सड़क पर उतर चुके हैं. किसान संघर्ष समिति के सैकड़ों कार्यकर्ता आगरा से पद यात्रा करके समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को उनके वादे की याद दिला रहे हैं. किसान यह पदयात्रा अपनी वह कृषि भूमि बचाने के लिए कर रहे हैं, जिसका बसपा शासनकाल में जबरन अधिग्रहण कर लिया गया था. किसान सड़क बनाने (यमुना एक्सप्रेस-वे) के लिए अपनी ज़मीन देने को तैयार थे, लेकिन वे यह जानकर नाराज़ हो गए कि उनकी ज़मीन पर टाउनशिप बनाई जाएगी, जिसका फायदा एक उद्योगपति को होगा. उस समय मुलायम सिंह यादव ने इन किसानों से वादा किया था कि सपा के सत्ता में आने पर उन्हें इंसा़फ दिलाया जाएगा, लेकिन जब सपा सत्ता में आई, तो उक्त उद्योगपति उसका चहेता बन बैठा, जिससे किसानों की हताशा और बढ़ गई. इसी तरह बुंदेलखंड में भी जल बचाओ-ज़मीन बचाओ सत्याग्रह जालौन में बेतवा नदी पर शुरू होने जा रहा है. इसके अलावा, गंगा एवं घाघरा नदी पर भी जल सत्याग्रह की तैयारियां चल रही हैं, ताकि इन नदियों की बदहाली के बारे में जनता में जागरूकता पैदा हो सके. जालौन में जल सत्याग्रह के संयोजक शेखर दीक्षित कहते हैं कि बुंदेलखंड में ताल-तालाबों एवं नदियों की हालत बहुत ख़राब है. ऐसे में यहां के हालात विदर्भ के बाद सबसे बड़े जल संकट जैसे बन रहे हैं.

लगता है कि अखिलेश सरकार ने शायद यह मान लिया है कि उसे जनता के हितों के लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, स़िर्फ वह आतंकवाद पर लचर हो जाए, तो उसकी जीत पक्की हो जाएगी. इसी सोच के चलते उस पर न्यायपालिका की फटकार का भी कोई असर नहीं हो रहा है. ख़ु़फ़िया एजेंसियों की रिपोर्ट दरकिनार करके गोरखपुर सीरियल ब्लॉस्ट के आरोपी तारिक काजमी के खिलाफ दर्ज मुक़दमा वापस लेने का ़फैसला इसका जीता-जागता उदाहरण है. ग़ौरतलब है कि मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तहत मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इशारे पर न्याय विभाग तारिक काजमी के खिलाफ दर्ज मुक़दमा वापस लेने की कार्रवाई आगे बढ़ा रहा है. इस संबंध में जब सचिव-गृह से पूछा गया कि आखिर मुक़दमा वापस लेने का आधार क्या है? तो वह बोले कि जिलाधिकारी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर मुक़दमा वापस लिया जा रहा है. हालांकि उक्त अधिकारियों की रिपोर्ट के संबंध में सवाल पूछे जाने पर वह चुप्पी साध गए.

सबसे चिंताजनक पहलू तो यह है कि ख़ुफिया एजेंसियों ने उक्त सीरियल ब्लॉस्ट में शामिल आतंकियों के खिलाफ दर्ज मुक़दमे वापस लेने को देशहित के लिए खतरा क़रार दिया है. दरअसल, समाजवादी पार्टी के वादे के अनुसार, प्रदेश में सपा सरकार बनने के साथ ही तथाकथित निर्दोष मुसलमानों को रिहा करने की मांग जोर पकड़ती जा रही है. ग़ौरतलब है कि काज़मी पर वर्ष 2007 में गोरखपुर के गोलघर एवं गणेश चौराहे पर हुए सीरियल ब्लास्ट का आरोप है, जिनमें छह लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. इस मामले में तारिक समेत कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था. तुष्टिकरण में लगी सपा सरकार का एक और चेहरा यहां दिखाना आवश्यक है. कुंडा में जांबाज सीओ जियाउल हक की शहादत पर जिस तरह की सियासत सपा सरकार ने की, वह भी काफी शर्मनाक थी. हद तो यह हुई कि अनुकंपा के आधार पर हक के परिवार के दो-दो लोगों को नौकरी दे दी गई. जब हाईकोर्ट ने अनुकंपा के आधार पर हुई उक्त नियुक्तियों के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा, तो अखिलेश सरकार के प्रमुख सचिव-चयन व नियुक्तियां ने हलफनामा दाखिल करके बताया कि अनुकंपा नियुक्ति नियमावली 1975 में मृतक कर्मचारी के आश्रितों में एक को नौकरी देने की व्यवस्था है, लेकिन जियाउल हक मामले में उनके परिवार के दो सदस्यों को नौकरी देने की अनुशंसा गृह विभाग द्वारा की गई थी. राज्य सरकार की मंजूरी के बाद हक के परिवार के दो सदस्यों को नौकरी देने की बात प्रमुख सचिव-चयन व नियुक्ति ने बताई. अब अदालत ने प्रमुख सचिव-गृह से हलफनामा मांगा है. ऐसी है हमारी सरकार! हालांकि सच तो यह है कि कई मामलों में अनुकंपा के आधार पर परिवार के एक भी सदस्य को नौकरी नहीं मिल पाती है.

पुल निर्माण –  जनता के साथ धोखा

गोरखपुर में सरयू नदी पर कम्हरिया घाट पर जो पुल बनना है, उसका निर्माण कार्य शुरू होने में देरी की वजह केंद्र और प्रदेश सरकार के बीच की राजनीति है. क्षेत्रीय सांसद भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी कहते हैं कि मुख्यमंत्री द्वारा बार-बार घोषणा करने के बाद भी कोई ठोस क़दम न उठाया जाना जनता के साथ धोखा है. वह कहते हैं कि यह स्थिति तब है, जबकि पुल निर्माण के लिए राज्य सरकार को मात्र 15 प्रतिशत धनराशि की व्यवस्था करनी है, बाक़ी 85 प्रतिशत पैसा केंद्र सरकार ख़र्च करेगी.

विधायक संत प्रसाद भी नाराज़ हैं. उनकी नाराज़गी इस बात को लेकर है कि शासन-प्रशासन इस मसले पर गूंगा-बहरा बना बैठा है. वहीं जिलाधिकारी रवि कुमार कहते हैं कि पुल निर्माण के  लिए पैसा नाबार्ड से जारी होना है और नाबार्ड की टीम ने सर्वे भी कर लिया है, लेकिन पैसा मिलने में देरी हो रही है. इसलिए प्रशासन इसमें कुछ नहीं कर सकता.

सिंचाई विभाग के प्रमुख अभियंता अशोक कुमार का कहना है कि अभी नाबार्ड ने एस्टीमेट  ही तैयार नहीं किया है, इसलिए पुल निर्माण की लागत का पता नहीं लग सका. उधर, सत्याग्रही पुल निर्माण के लिए ठोस क़दम उठाए जाने की मांग तो कर ही रहे हैं, इसके अलावा, वे यह भी चाहते हैं कि आंदोलन के दौरान लोगों के खिलाफ जो मुक़दमे दर्ज किए गए थे, उन्हें वापस लिया जाए. सत्याग्रहियों की एक मांग यह है कि एक आंदोलनकारी की मां की सदमे के चलते मौत हो गई थी, उसके परिवार को उचित मुआवज़ा भी दिया जाए. वहीं सर्वहितकारी समिति के नेता एन के सिंह कहते हैं कि सत्याग्रहियों पर लाठीजार्च करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए.

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