भारत में पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का तमगा हासिल है. लेकिन कुछ संस्थानों ने इसे अपने हितों को साधने के लिए माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया और चौथे स्तंभ की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई. ऐसे वाक़ए भी हैं, जब पत्रकारिता के महानायक बनते स़ख्श कई बार महाअपराधी नायक की श्रेणी में बदल जाते हैं और उनका पूरा व्यक्तित्व भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े बेशर्म इन्सान के रूप में तब्दील हो जाता है. यह घटनाएं जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो जैसे जुमले को ग़लत साबित करती हैं और भारतीय पत्रकारिता के चेहरे पर स्याह निशान छो़ड जाती हैं…
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ये कहानी भारतीय पत्रकारिता के उस काले चेहरे की कहानी है, जिस चेहरे को स्वर्गीय रामनाथ गोयनका शायद स्वर्ग में बैठकर कभी प़ढना नहीं चाहेंगे या कभी जानना नहीं चाहेंगे. देश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि अगर आज श्री रामनाथ गोयनका ज़िंदा होते, तो या तो अपने संपादक को बर्ख़ास्त कर देते और अगर नहीं कर पाते तो बंबई के एक्सप्रेस टावर के पेंट हाउस से नीचे छलांग लगाकर अपनी जान दे देते. स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका ने जिस आदर्श को छुआ था, वो आदर्श प्रो-पीपुल जर्नलिज़्म का अद्भुत उदाहरण था. रामनाथ गोयनका ने अपने अख़बार के ज़रिये भारतीय पत्रकारिता की ऐसी ऊंचाइयां छुई थीं, जिनका लोग हमेशा उदाहरण देते थे. उन्होंने कभी हथियारों के दलालों, पूंजीपतियों, सत्ताधीशों के पक्ष की पत्रकारिता नहीं होने दी. इसीलिए उनके समय के संपादकों के नाम भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के जगमगाते हुए पन्ने हैं.
लेकिन आज क्या हो रहा है. विवेक गोयनका रामनाथ गोयनका के उत्तराधिकारी हैं. विवेक गोयनका अपने अंग्रेज़ी अख़बार में पत्रकारिता के आदर्शों की धज्जियां उ़डते हुए देखकर अगर चुप हैं, तो इसका मतलब है कि विवेक गोयनका में रामनाथ गोयनका का अंशमात्र भी, सम्मान के लिए ल़डने की ताकत का अंश नहीं बचा है. ये पत्रकारिता जर्नलिज़्म ऑफ़ करेज नहीं है, जर्नलिज़्म ऑफ़ करप्शन है, जर्नलिज़्म ऑफ़ दलाली है, जर्नलिज़्म ऑफ़ टीनेशनलिज़्म है.
ये स़ख्त शब्द हमें इसलिए कहने प़ड रहे हैं, क्योंकि एक समय पत्रकारिता के महानायक के पद पर बैठा हुआ श़ख्स अगर अपराध-नायक बनने की तरफ़ ब़ढने लगे और सत्ता में बैठे अपने दोस्तों के ज़रिये पैसे कमाने लगे और अख़बार का इस्तेमाल देशद्रोही ताक़तों को मदद पहुंचाने के लिए करने लगे, तो लिखना ज़रूरी हो जाता है. ये कहानी भारतीय पत्रकारिता के दूसरे अख़बारों के संकोच की कहानी भी है, कम हिम्मत की कहानी भी है और हमारे आज के राजनीतिक दौर में किस तरह देशप्रेम, देशभक्ति एक तरफ़ रख दी जाती है और किस तरह देशद्रोह को आदर्श मान लिया जाता है, उसकी कहानी भी है.
ये कहानी शुरू होती है, जब जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष बने. जब जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष बने थे, उस समय भारतीय सेना में ख़रीदे जाने वाले हर हथियार के पीछे हथियारों के सौदागरों की भूमिका थी. हथियारों से संबंधित लॉबी साउथ ब्लॉक में टहलती रहती थी. देश के कुछ ब़डे नाम देश की सेना को सप्लाई होने वाले हर हथियार के ऊपर असर डालते थे. उनके पास रक्षा मंत्रालय से और भारत की सेना से जानकारियां पहुंच जाती थीं कि रक्षा बजट में हथियारों की ख़रीद का कितना प्रतिशत हिस्सा है और उसके हिसाब से वो योजना बनाने लगते थे. वो जानते थे कि युद्घ नहीं होने वाला है, इसलिए भारत की सेना को उन्होंने घटिया हथियारों की आपूर्ति की. भारतीय सेना हथियारों के दलालों के जाल में इस कदर जक़डी हुई थी कि चाहे वो टाट्रा ट्रक हों, चाहे वो राइफलें हों, चाहे वो तोपें हों या चाहे गोला-बारूद हो, हर जगह सब-स्टैंडर्ड सामान भारत की सेना में आ रहा था. जनरल वी के सिंह ने इस स्थिति के ख़िलाफ़ कमर कसी और उन्होंने ऐसे नियम बनाने शुरू किए, जिन नियमों की वजह से हथियारों के दलालों को अपना काम करना मुश्किल लगने लगा. जनरल वी के सिंह द्वारा उठाए गए क़दमों ने उन लोगों को असहज कर दिया, जो लोग भारत की सेना को बेचे जाने वाले हथियारों से फ़ायदा उठाते थे.

जनरल वीके सिंह द्बारा किया गया ट्वीट
शेखर गुप्ता की कंपनी का डाटा: वे और उनकी पत्नी नीलम जॉली ने 2002 में ग्रीनपाइन एग्रो प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी शुरू की. ग्रीनपाइन पति-पत्नी द्वारा शुरू की गई कंपनी है. उनकी कंपनी कॉमनवेल्थ खेलों में भी भागीदारी कर रही थी.
सालों तक इसका कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं हुआ. 2003 से 2009 तक सारे रिकॉर्ड रिटर्न ऑन कैपिटल के साथ 2010 में दर्ज किए गए और चालू वर्ष मई 2010 में दर्ज किया गया.
शेखर गुप्ता ने ईईएस (इंटरप्राइज एम्प्लॉय सिनर्जी) जमा करके अगस्त, 2010 में कंपनी बंद कर दी. इसके बाद सभी अकांउट में हेरफेर कर दिया गया. 2002 में उन्होंने एक लोन लिया. यह मात्र 12 लाख रुपये का था, जबकि इस दौरान उन्होंने दो एक़ड के तीन फार्म खरीदे. अगस्त, 2010 में उन्होंने कंपनी बंद कर दी. बैलेंस सीट दिखाती है कि 2004 में उन्होंने 45 लाख का अनसेक्योर लोन लिया, लेकिन बाद में फार्म हाउस के मामले में बैलेंस सीट्स को साफ कर दिया गया.
तमाम खोजी रिपोर्ट छापने वाले संपादक ने आठ साल बाद  18 जनवरी, 2010 को एक बैलेंस सीट फाइल की.दिल्ली में मालचा रोड पर 55 करो़ड का मकान (यह ज्यादा का भी हो सकता है) हो सकता है उन्हें यूपीए सरकार के लिए काम करने के लिए मिला हो. इसमें कोई शक नहीं है कि जो लोग कांग्रेस के निर्लज्ज भ्रष्टाचार के खिलाफ ल़ड रहे हैं, उन पर झूठे आरोप लगाने के लिए शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

 
ये रिपोर्ट, जो हम आपके सामने रख रहे हैं, ये रिपोर्ट न तो जनरल वी के सिंह ने हमें बताई और न ये रिपोर्ट सेना के देशभक्त अफसरों द्वारा लीक की गई. ये रिपोर्ट हमारी छानबीन का नतीजा है, जो हम भारत के पाठकों के सामने इस आशा से रख रहे हैं कि अगर भारत की जनता इस बात को जान जाएगी, तो कम से कम हम अपने उस कर्तव्य का पालन कर पाएंगे, जो एक पत्रकार को करना चाहिए. जनरल वी के सिंह से पहले जितने जनरल हुए, उन्होंने सेना के जवानों में या भारत की पूरी सेना में हौसला भरने का काम पूरे तौर पर नहीं किया. एक बार तो सेना में ये स्थिति आ गई थी कि मनोवैज्ञानिक रूप से सिपाही और अफसर आपस में ही ल़डने लगे थे. आठ महीने से ज़्यादा चीन बॉर्डर के ऊपर भारत की सेना बिना किसी लक्ष्य के बैठा दी गई थी. हमारी जानकारी के हिसाब से जब जनरल वी के सिंह भारत के सेनाधयक्ष बने, तो उनके सामने हथियारों के दलालों को रक्षा मंत्रालय में घुसने से रोकना एक काम था, वहीं दूसरा काम भारत की सीमाओं को भारत के प़डोसियों से सुरक्षित रखना था. भारत में तीन तरफ़ की सीमाओं से घुसने के रास्ते बने हुए थे. आतंकवादी पाकिस्तान की तरफ़ से, नेपाल की तरफ़ से और बांग्लादेश की तरफ़ से हिंदुस्तान में घुसते थे. कभी कुछ पक़डे जाते थे, कुछ मारे जाते थे, लेकिन ज़्यादातर घुस आते थे. जनरल वी के सिंह के सामने शायद ये ब़डा प्रश्‍न था कि हमारी सेना के ऊपर हमले न हों और हमारी सीमाएं चाक-चौबंद, सिपाहियों की निगरानी में हों. मुंबई हमले के बाद ऐसे किसी खतरे से निपटने के लिए रणनीति की जरूरत महसूस हुई और जनरल वी के सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सलाह और रक्षा मंत्री के आदेश पर भारतीय सेना में एक जांबाज़ यूनिट बनाई, जिसका नाम टेक्निकल सर्विसेज डिवीज़न रखा. टीएसडी इस डिवीज़न का शॉर्ट नाम है, जिस तरह रिसर्च एंड एनालिसिस विंग का शॉर्ट नाम रॉ है. रिसर्च एंड एनालिसिस विंग हमारे देश की ऐसी ख़ुफ़िया एजेंसी है, जो विदशों में काम करती है और विदेशी जानकारी भारत सरकार को देती है. विदेशों में भारत के हितों को लेकर जासूसी करना जिस तरह भारत का अधिकार है, उसी तरह से दूसरे देशों का अपने देश के लिए जासूसी करना उनका अधिकार है. उनके जासूस हमारे देश समेत कई देशों में बिखरे पड़े हैं और हमारे जासूस भी प़डोसी देशों सहित कई देशों में बिखरे पड़े हैं. जासूस पक़डे भी जाते हैं, जासूस ख़बरें भी भेजते हैं, उन ख़बरों में जो देश की सुरक्षा से जुडी ख़बरें होती हैं, उन ख़बरों के ऊपर अमल होता है और बाक़ी ख़बरें रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती हैं. जनरल वीके सिंह ने टीएसडी को इसी तर्ज पर बनाया. सेना की मजबूरी होती है कि वो तभी आगे ब़ढ पाती है जब उसे आदेश मिलता है. लेकिन टीएसडी इस तर्ज पर बनाई गई कि हमारी सीमाएं भी सुरक्षित रहें और हमारी सेना भी सुरक्षित रहें. टीएसडी का टास्क, पाकिस्तान का बॉर्डर, नेपाल का बॉर्डर, बांग्लादेश का बॉर्डर और इन बॉर्डर पर हमारे जवान, न प़डोसी देशों के सेना के सीधे निशाने पर आएं और न इन देशों से होकर हमारे देश में घुसने वाले आतंकवादियों के निशाने पर आएं, ये इस डिवीज़न का टास्क था. इस डिवीज़न को यह आदेश नहीं था कि वो दूसरे देश में घुसकर कोई ऐक्शन ले. इस डिवीज़न की ज़िम्मेदारी थी कि वो हमारी सीमावर्ती हिस्से के आसपास अगर कोई गतिविधियां हो रहीं हैं तो उन गतिविधियों को रोकने में अपने जान की बाज़ी लगा दें, ताकि सेना तब तक चौबंद होकर, अगर उसे आदेश मिलता है तो अपने टास्क की पूर्ति करे.
टीएसडी की गतिविधियों से भारत में घुसपैठ कम हुई. जब टीएसडी की गतिविधियों की वजह से पाकिस्तान और चीन परेशान होने लगे, तो उन्होंने भारत में अपने एजेंटों से टीएसडी के बारे में जानकारी हासिल की. जनरल वीके सिंह ने टीएसडी को इस अंदाज में बनाया था कि टीएसडी के बारे में कोई जानकारी पाकिस्तान और चीन को नहीं मिल पा रही थी. टीएसडी है ये तो पता चल रहा था, लेकिन टीएसडी के कार्य करने की शैली, टीएसडी में कौन अफसर और जवान हैं, उनके टारगेट्स क्या-क्या क्या हैं. उनको ऑर्डर कौन देता है. उनके पास हथियार क्या-क्या हैं. इसको लेकर के पाकिस्तान और चीन में बहुत बडा भ्रम था. चूंकि उन्हें कोई जानकरी नहीं मिल पा रही थी, इसलिए उनके स्थानीय एजेंट उन दोनों सरकारों को डरा रहे थे. उन्होंने टीएसडी को एक हौवा बनाकर अपनी सरकारों को इसलिए बताया क्योंकि उनके पास सचमुच कोई ख़बर थी ही नहीं. पर उन्हें कोई न कोई ख़बर तो भेजनी ही थी.
टीएसडी पाकिस्तान और चीन के लिए एक डरावना हौवा बन गया और दोनों सरकारों को और दोनों सेनाओं को जब कुछ पता नहीं चला, तो इस बीच हथियारों के दलालों ने जनरल विजय कुमार सिंह की तस्वीर बर्बाद करने की सारी कोशिशें शुरू कर दीं. इन कोशिशों में जनरल वीके सिंह की उम्र का विवाद देश में उछाला गया. जनरल वीके सिंह की उम्र के विवाद की भी यह विडंबना है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय जनरल वीके सिंह के हाईस्कूल के सर्टीफिकेट में लिखी हुई उम्र प्रामाणिक नहीं मानता, लेकिन रेप केस में सबसे ज़्यादा रोल निभाने वाले एक अपराधी के बालिग या नाबालिग होने के विषय में हाईस्कूल के जन्म प्रमाणपत्र को सही मानता है. शायद भारत के सुप्रीम कोर्ट को ही ऐसा अंतर्विरोध शोभा देता है. जनता में इस फैसले की थू-थू भी हुई, पर हथियारों के सौदागरों ने, जिनमें सेना के कुछ ब़डे अफसर भी शामिल थे,  कुछ राजनीतिक नेताओं का साथ लेकर एक अख़बार के ज़रिये इस मुद्दे पर जनरल वीके सिंह के ख़िलाफ़ अभियान चला दिया.
इस बीच जनरल वीके सिंह रिटायर हो गए, लेकिन जनरल वीके सिंह ने जो क़दम उठाए थे, उन क़दमों से सेना के भीतर हथियारों के दलालों का काम, जहां एक तरफ़ मुश्किल हुआ, वहीं अभी भी टीएसडी को लेकर पाकिस्तान और चीन के मन में भयानक डर बैठा हुआ था. वे किसी भी तरह से टीएसडी की जानकारी चाहते थे और टीएसडी को डिफंक्ट करना चाहते थे. रामनाथ गोयनका के इस अख़बार ने इस काम में हथियारों के दलालों की और पाकिस्तान तथा चीन की ज़बरदस्त मदद की. इस अखबार ने इस तरह की ख़बर अपने पहले पन्ने पर, पहली हेडिंग केसाथ छापी कि जनरल वीके सिंह इस देश में लोकतंत्र को ख़त्म कर सेना का शासन स्थापित करना चाहते थे. और जिसके लिए उन्होंने सेना की दो टुक़िडयों को दिल्ली की तरफ़ कूच करने का आदेश दे दिया था.
जनरल वीके सिंह इस ख़बर के छपने के समय सेना अध्यक्ष थे. और ये वार बहुत ख़तरनाक वार था. इस वार की असली कहानी यह है कि रामनाथ गोयनका जी के अख़बार के संपादक ढाई घंटे से ज़्यादा जनरल विजय कुमार सिंह के सरकारी आवास आर्मी हाउस में रहे, उनके साथ उन्होंने दोपहर का खाना खाया. एक-एक सवाल उन्होंने पूछा और सवाल पूछने के लिए उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार किया. उन्होंने कहा, कि उनका भारतीय सेना से काफ़ी पुराना रिश्ता है, अगर मैं भूल नहीं रहा हूं तो ये कहा कि उनके भाई भी सेना में हैं. अपने रिश्तेदारों के नाम गिनाए. किस कोर, किस डिवीज़न में हैं, इसके नाम गिनाए. कुछ कहानियां बताईं कि किस तरी़के से उनके साथ सेना की स्मृतियां जु़डी हुई हैं. और इसके बाद उन्होंने इन ट्रूप्स के दिल्ली कूच करने की हकीक़त पूछी. जनरल वीके सिंह ने उन्हें एक-एक चीज़ बताई कि किस तरह की यह रूटीन एक्सरसाइज़ है और दिल्ली के आसपास कुछ टुक़िडयां इसलिए रहती हैं, ताकि अगर दिल्ली में कहीं कुछ हो जाए, जैसे बंबई में 26-11 को हुआ था, तो सेना की टुकडियां इतनी दूर पर रहें कि वो दो घंटे के भीतर दिल्ली पहुंच सकें. और टाइम-टू-टाइम ये एक्सरसाइज होती रहती है कि अगर दिल्ली में कुछ होता है तो राजधानी को बचाने के लिए सेना कितनी तेज़ी से स्ट्राइक कर सकती है. और ये हर मौसम में होता है. चाहे गर्मी हो, बरसात हो, धुंध हो. उस बार की एक्सरसाइज धुंध में हुई थी. लेकिन दूसरे दिन, एक दिन छो़डकर उसके अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस के महान संपादक शेखर गुप्ता ने अपने एक रिपोर्टर के नाम से स्टोरी छापी कि भारत की सेना जनरल वीके सिंह के आदेश पर सत्ता पर कब्ज़ा करना चाहती है. रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के अख़बार में त़ख्तापलट की कोशिश के बारे में जब रिपोर्ट छपी तो उसका सबसे काला अध्याय ये था कि इसके संपादक ने ये नहीं बताया कि वो कुछ घंटे पहले भारत के सेनाध्यक्ष के साथ दोपहर का खाना खाकर आया है और उसने ये सारे सवाल भारत के सेनाध्यक्ष से पूछे और सेनाध्यक्ष ने न केवल उनका खंडन किया, बल्कि विस्तार से बताया कि ये सारी चीज़ें क्यों होती हैं. अगर संपादक, जिसे ये सारी जानकारी संबंधित व्यक्ति से मिली थी, तो उस रिपोर्ट में ये लिख सकता था कि हमारा ये मानना है कि त़ख्तापलट की कोशिश हुई, लेकिन भारत के सेनाध्यक्ष ने इससे सिरे से इन्कार किया और आर्मी की कंपनियों के मूवमेंट के भी कारण बताए. ये न लिखना इस अख़बार की पत्रकारिता के सिद्घांतों को तिलांजलि देना है और ये जर्नलिज़्म ऑफ कावर्डनेस, जर्नलिज़्म ऑफ झूठ, जर्नलिज़्म ऑफ करप्शन, जर्नलिज़्म ऑफ एंटीनेशनलिज़्म कहलाता है या कहा जा सकता है.
इस रिपोर्ट को सरकार ने हास्यास्पद क़रार दिया. विपक्ष ने हास्यास्पद क़रार दिया. सेना के रिटायर्ड जनरलों ने हास्यास्पद क़रार दिया. लेकिन ये अख़बार इतना बेशर्म हो गया कि उसने इस रिपोर्ट पर माफ़ी तक नहीं मांगी. एक सबूत अख़बार के पास नहीं और अख़बार ने हिंदुस्तान के लोकतंत्र को समाप्त करने की सेना की साज़िश की ख़बर भारत में फैला दी. हर तरफ़ इस रिपोर्ट को लेकर थू-थू हुई. लेकिन ये अख़बार अपनी इस रिपोर्ट पर क़ायम रहा. मज़े की चीज़ ये है कि इस अख़बार ने भारत के राजनीतिक तंत्र के उन लोगों के नाम नहीं छापे, जिन्होंने उसकी इतनी ब़डी रिपोर्ट छपने के बाद क्यों सेना के उन अफसरों के ऊपर और जनरल वीके सिंह के ऊपर कार्रवाई नहीं की, जिन्होंने अख़बार के अनुसार दिल्ली की सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी? क्या इस त़ख्तापलट की योजना में ख़ुद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री शामिल थे? अपने ही ख़िलाफ़ वो कुछ करना चाहते थे? या वो इतने ग़ैर-ज़िम्मेदार प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे, जिन्होंने इतनी ब़डी रिपोर्ट के छपने के बाद कुछ नहीं किया?
दरअसल, आज़ाद हिंदुस्तान की ये सबसे घटिया और सनसनीख़ेज रिपोर्ट थी. सनसनीख़ेज इस मामले में, क्योंकि ये पूरी तौर पर हथियारों के दलालों और इस अख़बार के विदेशी संपर्कों के इशारे पर लिखी हुई भारत की सेना को बेइज़्ज़त करने वाली रिपोर्ट थी.
इसके बाद, इस अख़बार ने टीएसडी का सवाल उठाया. मूर्खता भरी रिपोर्ट विवेक गोयनका का अख़बार ही छाप सकता है, जिसने लिखा कि जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार को उखा़डने के लिए एक करो़ड 19 लाख की रिश्‍वत जम्मू-कश्मीर के एक मंत्री को दी गई. भारत के एक मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने साहसिक काम किया और उन्होंने कहा, ऐसा कोई काम नहीं हुआ है, न कोई राज्य सरकार को उखा़डने की कोशिश हुई है और यह रिपोर्ट ठीक वैसी ही हास्यास्पद और बेसलेस है, जैसी भारत की सत्ता पर सेना के कब्ज़ा करने की रिपोर्ट थी और ये दोनों रिपोर्ट एक ही अख़बार ने छापी. आख़िर ये रिपोर्ट रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के अख़बार में ही क्यों छप रही हैं? इसलिए छप रही हैं, क्योंकि इस अख़बार के संपादक और इस अख़बार के पत्रकारों के रिश्ते हथियारों के दलालों से हैं. इनके रिश्ते चीन और पाकिस्तान की उन ताक़तों से हैं, जो टीएसडी से भयभीत थे. इन्होंने दबाव डालकर टीएसडी को बंद करने का ़फैसला करवाया. टीएसडी के बंद होने के फैसले ने ही इन्हें संतुष्ट नहीं किया. ये टीएसडी में कौन-कौन अफसर और जवान शामिल थे, उनके नाम जानना चाहते थे और ये अख़बार देशद्रोही गतिविधियों का ऐसा हिस्सा बन गया कि वह हमारे जवान और अफसरों की जान का दुश्मन बन गया. वो इन सारी चीज़ों के ख़ुलासे की मांग करने लगा, ताकि अफसरों की और टीएसडी में शामिल सभी लोगों की कार्यप्रणाली भी सामने आए, उनके नाम भी सामने आएं ताकि आसानी के साथ पाकिस्तान और चीन के जासूस उनकी हत्या कर दें. विवेक गोयनका के इस अख़बार ने देशद्रोही पत्रकारिता की ये सर्वोच्च मिसाल कायम की. भारत सरकार के मंत्रियों में भी, हथियारों के दलालों से और उन दलालों के ज़रिये चीन और पाकिस्तान से रिश्ता रखने वाले कुछ मंत्रियों का एक ग्रुप है, जो ग्रुप टीएसडी को लेकर और जनरल वीके सिंह द्बारा बनाए गए नियमों को समाप्त करवाना चाहता है. ये अख़बार, अख़बार के संपादक इस गिरोह के कोर कमेटी का हिस्सा दिखाई दे रहे हैं.
कुछ आंकड़े गौर करने लायक हैं. जनरल वी के सिंह के कार्यकाल के दौरान ही मुंबई का 26/11 का मशहूर कांड हुआ, जिसमें ताज होटल में आतंकियों ने एक बड़ी आतंकी घटना को अंजाम दिया था. इस समय की एक घटना और बताते हैं. कोलकाता से कुछ सिमकार्ड खरीद गए. कोलकाता के मिलिट्री इंटेलीजेंस को पता चला कि कुछ लोगों ने सिमकार्ड ख़रीदे हैं और हिंदुस्तान में कहीं पर कोई वारदात होने वाली है, जिनमें इन सिमकार्डों का इस्तेमाल होने वाला है. वो जानकारी सर्वोच्च स्तर पर भारत के तत्कालीन इंटेलीजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को दी गई. इन दोनों ने इस जानकारी का इस्तेमाल नहीं किया, जबकि इन सिमकार्डों के नंबर तक सेना ने मुहैया करा दिए थे. जब 26/11 घटित हो गया और फोन के ऊपर बातचीत इंटरसेप्ट हुई तो ये वही नंबर थे, जो सेना ने डायरेक्टर ऑफ इंटेलीजेंस ब्यूरो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को मुहैया कराए थे. और जो उस समय सबसे बड़ी चूक हुई, जिसके ऊपर भारतीय सेना को आज तक अफ़सोस है कि भारत के पास इतने जैमर हैं, लेकिन उन 24 घंटों के दौरान जब ताज होटल में आतंकवादी घटना को अंजाम दे रहे थे, कम्युनिकेशन जाम नहीं किया गया. अगर कम्युनिकेशन जाम हो जाता तो पाकिस्तान से आतंकवादियों को निर्देश नहीं मिल पाते, क्योंकि वे सेटेलाइट फोन नहीं थे. सेटेलाइट फोन भी जाम किए जा सकते हैं, लेकिन उसे जाम करने में थोड़ा व़क्त लगता है. लेकिन अपने हिंदुस्तान के टॉवर से जाने वाले इंडियन सिमकार्ड से होने वाली बातचीत फौरन जाम की जा सकती है. यह जाम क्यों नहीं किया गया, अभी तक ये रहस्य बना हुआ है. अगर जाम कर दिया गया होता तो मुठभे़ड इतनी देर तक चलती ही नहीं.
जनरल वी के सिंह जब तक भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष रहे, देश में आईएसआई की गतिविधियां नियंत्रित रहीं, क्योंकि आईएसआई को भारत की सेना के टीएसडी डिवीज़न से डर था. जनरल वी के सिंह के समय हमारी सीमाओं पर शांति रही. चाहे पाकिस्तान के सैनिक हों या चीन के, उन्होंने कोई हरकत करने की कोशिश नहीं की. क्योंकि उन्हें जनरल वी के सिंह से भी डर था और जनरल वी के सिंह द्वारा बनाए गए दस्तों से भी डर था. इसीलिए जैसे ही वी के सिंह हटे, हमारी सीमा पर युद्धविराम तोड़ने की कोशिश हुई. आतंकवादी भेजे जाने लगे और हमारे जवानों की सिरकटी लाशें देश में आने लगीं. चीन की सीमा पर चीन टहलता हुआ लद्दाख और अरुणाचल में घूमने लगा. हमारी सेना की तरफ से कार्रवाई नहीं हुई. कार्रवाई हो भी नहीं सकती, जब तक राजनीतिक फैसला न लिया जाए. लेकिन चीन को कोई डर ही नहीं था, उन्हें यह भी पता कि अब भारतीय सेना स्ट्राइक नहीं करेगी, क्योंकि टीएसडी डिवीज़न जो सेना के ऑफिसियल स्ट्राइक करने से पहले अपनी सेना की तरफ़ बढ़ने वाले क़दमों को रोकने के लिए ढाल का काम करती थी, वह अब है ही नहीं. जो काम चीन और पाकिस्तान ख़ुद नहीं करवा सके, उन्होंने भारत के पत्रकारिता के आदर्श रहे रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के इस अख़बार के द्वारा करवा दिया. कहा तो यह भी जा रहा है कि इस अख़बार के संपादक सहित अन्य लोगों का उठना बैठना उस समय के गृहमंत्री के साथ काफ़ी ज्यादा था और इन सारी चीज़ों के पीछे तत्कालीन गृहमंत्री के इशारे, हथियारों के दलालों के सीधे हस्तक्षेप और पाकिस्तान और चीन के हितों में काम करने वाले हिंदुस्तान के लोगों का हाथ था.
झूठ किस तरी़के से फैलाया जा सकता है. टीएसडी के ऊपर आरोप लगा दिया कि वह हिंदुस्तान के रक्षा मंत्री तक की बातें भी सुन रही है. उसने इंटरसेप्ट रिकॉर्ड करने वाले इंस्ट्रूमेंट ख़रीदे हैं. उसने जम्मू-कश्मीर की सरकार को गिराने के लिए पैसा दिया है. पहले भारत सरकार को गिराने के लिए सेना की टुकड़ियों का मूवमेंट और अब गप्प कि जम्मू-कश्मीर की सरकार को गिराने के लिए एक करोड़ 19 लाख. न संपादक को कोई शर्म और न रिपोर्टर को शर्म कि जिसे पढ़ते ही पाठक अख़बार के ऊपर थूक दे और देखने से ही जो रिपोर्ट सुपरफिशियल लगे, ये भारतीय पत्रकारिता को शर्मसार करने वाली घटना है. और टीएसडी पर छपी इस अख़बार की रिपोर्ट के समर्थन में तत्काल भारत सरकार के कुछ मंत्री खड़े हो गए. उन्हें यह शर्म नहीं आई कि वे अपनी ही सेना के उस डिवीज़न का विरोध कर रहे हैं, जो डिवीज़न देश की रक्षा के लिए काम करती है. उन्हें यह भी शर्म नहीं आई कि वे अपने जांबाज़ अफसरों का अपमान कर रहे हैं जो देश में कहीं भी कुछ करने की शपथ लिए, जान देने का जज़्बा लिए सेना में शामिल होते हैं. हथियारों के दलालों, चीन और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों और भारत के किसी ज़माने में पत्रकारिता में सिरमौर रहे अख़बार के गठजो़ड की यह नापाक कहानी है, जिस कहानी ने भारत की पत्रकारिता को शर्मसार कर दिया है. लगभग सारे पत्रकार इस रिपोर्ट को ग़लत मानते हैं, लेकिन वो अपने में यह हिम्मत नहीं जुटा पा रहे कि इस अख़बार की गलत रिपोर्टिंग की शैली का वे मुखर विरोध करें. लगभग हर बड़े पत्रकार ने मुझसे यह कहा कि यह हमें शर्मसार कर देने वाली स्थिति लगती है, लेकिन वे इसलिए नहीं बोलते क्योंकि आख़िर वे भी एक पत्रकार हैं. यह भारतीय पत्रकारिता की कायरता का दूसरा चेहरा है.

यह रिपोर्ट भारतीय सेना के जवानों को मारने के षडयंत्र का हिस्सा है. इसलिए श्री रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के अख़बार की इस रिपोर्ट का हम जमकर विरोध करते हैं और इसे भारतीय पत्रकारिता की सबसे काली रिपोर्ट के रूप में देखते हैं. पत्रकारिता का महानायक बनता हुए एक स़ख्श कैसे महाअपराधी नायक की श्रेणी में बदल जाता है और कैसे उसका पूरा व्यक्तित्व भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े बेशर्म इन्सान के रूप में तब्दील हो जाता है, इस अख़बार को पढ़कर देखा जा सकता है.

अफ़सोस की बात तो यह है कि यह रिपोर्ट सेना के भ्रष्टाचार को लेकर नहीं है. इस अख़बार ने यह रिपोर्ट सेना के अंदरूनी घटनाओं को लेकर नहीं छापी है, यह व्यक्तित्वों के टकराव की कहानी नहीं है. यह रिपोर्ट भारतीय सेना के जांबाज़ अफसरों और सिपाहियों की भारत के रक्षाहितों के लिए की जाने वाली कार्वाइयों का खुलासा है. यह रिपोर्ट भारतीय सेना के अफसरों व जवानों को मारने के षडयंत्र का हिस्सा है. इसलिए श्री रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के अख़बार की इस रिपोर्ट का हम जमकर विरोध करते हैं और इसे भारतीय पत्रकारिता की सबसे काली रिपोर्ट के रूप में देखते हैं. पत्रकारिता का महानायक बनता हुए एक स़ख्श कैसे महाअपराधी नायक की श्रेणी में बदल जाता है और कैसे उसका पूरा व्यक्तित्व भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े बेशर्म इन्सान के रूप में तब्दील हो जाता है, इसे देखना हो तो रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के नेतृत्व में चलने वाले अंग्रेज़ी अख़बार को पढ़कर देखा जा सकता है. यह अख़बार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ रिपोर्ट नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचारियों के समर्थन में रिपोर्ट करता है, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने वाले को यह अख़बार कन्फ्यूज्ड आदमी बताता है और भ्रष्टाचार करने वाले लोगों को नायक बनाता है, इस अख़बार में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ रिपोर्ट तलाशनी हो, तो आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन जो लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं या आवाज़ उठा रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ यह अख़बार पहलवानी करता दिखाई दे रहा है. यह भारत की पत्रकारिता का सबसे गंदा चेहरा है.
 

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