upकेंद्रीय बजट के संसद में पेश होने के कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश के बरेली में रैली थी. रैली का नाम दिया गया था किसान कल्याण रैली. यूपी में 2017 में विधानसभा चुनाव होने वाला है. लिहाजा, प्रधानमंत्री की बड़ी-बड़ी बातें सुन कर किसानों को लगा कि इस बार के बजट में तो यूपी की बल्ले-बल्ले जरूर होगी. रैली में किसान सबसे अधिक संख्या में मौजूद थे. मोदी ने किसानों के हित की बातें भी खूब कीं, लेकिन बजट के बाद किसानों को समझ में आया कि वो सारी बातें बेमानी थीं, जमीनी सच्चाई कुछ और ही निकली.

यूपी की बल्ले-बल्ले के बजाय छल्ले-छल्ले हो गई. बरेली के किसान कहते हैं कि मोदी सबके चेहरे पर सूरमा पोत गए और बाजार में जो झुमका गिरा था उसे भी झपट कर दिल्ली ले गए. लोग कहते हैं कि इस बजट से किसान और मध्य वर्ग का कलेजा छलनी हो गया है.

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का हजारों करोड़ रुपया चीनी मिलों के पास बकाया है, लेकिन बजट में उसकी भरपाई का कोई प्रावधान नहीं रखा गया. चीनी मिल मालिकों को केंद्र और राज्य सरकार दोनों तरफ से राहत और रियायतें मिलती जा रही हैं, लेकिन गन्ना किसानों को उनके बकाये का भुगतान हो उसके लिए कोई ठोस बंदोबस्त नहीं किया जा रहा है. दोनों सरकारें आंकड़ों में सफेद झूठ परोस रही हैं. मोदी ने बरेली की रैली में किसानों को श्रम का देवता बताया और कहा कि उनकी चिंता किसानों को पैसा पहुंचाना ही नहीं है बल्कि उन्हें हर तरह से सशक्त करना है.

प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य पर एक बुजुर्ग किसान ने पूछा कि किसान श्रम के देवता हैं तो सरकार राक्षस पूंजीपतियों की ही पूजा क्यों करती है? किसानों का बकाया दिलवाने के लिए मिल मालिकों पर कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं करती? किसान अगर श्रम देवता हैं तो प्राकृतिक आपदा से मरने वाले श्रम देवताओं को 60-70 रुपये का चेक देकर किस तरह की राहत दी जाती है और श्रम देवताओं का किस तरह ख्याल रखा जाता है? श्रम देवताओं के लिए यह सम्मान है या अपमान? क्या इसी तरह किसानों की आय दोगुनी की जाएगी? किसानों के इन सवालों का जवाब न केंद्र सरकार के पास है और न राज्य सरकार के पास. केंद्रीय बजट में फसल बीमा का प्रावधान किए जाने पर तकरीबन सारे किसानों का कहना था कि यह प्रावधान बीमा कंपनियों के फायदे के लिए किया गया है न कि किसानों के लिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसान कल्याण रैली के बाद आए केंद्रीय बजट को ध्यान से देखें तो केंद्र का बजट राज्य को नुकसान पहुंचाने वाला बजट दिखाई पड़ेगा. आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बजट से यूपी को फायदा नहीं बल्कि नुकसान होगा. 2016-17 के बजट में 2015-16 का बजट पुनरीक्षित किया गया है, जिससे चालू वित्त वर्ष में केंद्रीय करों में प्रदेश की हिस्सेदारी 3340 करोड़ रुपये कम हो गई है. उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों जो प्रदेश का बजट पेश किया था, केंद्रीय बजट उस पर भी असर डालेगा.

विशेषज्ञ कहते हैं कि केंद्र ने 2015-16 के बजट में केंद्रीय करों से प्रदेश की हिस्सेदारी 94,313 करोड़ रुपये तय की थी, लेकिन 2016-17 के बजट के साथ केंद्र ने 2015-16 का बजट पुनरीक्षित कर दिया है. इससे यूपी की हिस्सेदारी 94,313 करोड़ रुपये से घटकर 90,973 करोड़ रुपये रह गई है. इसके अलावा केंद्र ने 2016-17 में यूपी का आवंटन 1,02,650 करोड़ करने की बात कही है जो 2015-16 के मूल बजट से मात्र 1.84 फीसदी ज्यादा है. राज्य सरकार केंद्र के मूल आवंटन से 10-11 प्रतिशत की वृद्धि मान कर ही अपना अगला बजट बनाती है. लिहाजा, अब केंद्र से आवंटन में कमी हो जाने से प्रदेश के बजट अनुमानों पर असर पड़ना तय है.

ऐसे में केंद्र द्वारा पुनरीक्षित बजट के आधार पर राज्य सरकार को भी अपने वर्ष 2016-17 के बजट में अपेक्षित फेरबदल करना पड़ सकता है.बजटीय प्रावधानों के मुताबिक दलहनी फसलों के बीजों पर ज्यादा अनुदान मिलने से इसका रकबा बढ़ाने में मदद मिल सकती है. अभी इन बीजों पर केंद्र सरकार 2500 रुपये प्रति क्विंटल और राज्य सरकार 800 रुपये प्रति क्विंटल अनुदान देती है. लेकिन उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत यह है कि गन्ना की तरह दलहनी फसलों का भी रकबा लगातार कम होता जा रहा है. सबसे ज्यादा दलहनी फसलें बुंदेलखंड में बोई जाती हैं.

लेकिन सूखे के कारण वहां के 50 फीसदी रकबे में बोआई ही नहीं हुई्‌. मौसम और बीमारी की मार के कारण पश्र्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध क्षेत्र में भी किसान दलहनी फसलों की खेती में रुचि नहीं ले रहे हैं. किसानों का कहना है कि फसलें खराब हो जाने पर सरकार से उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता. मुआवजे के नाम पर किसानों के साथ मजाक किया जाता है. जिन किसानों की फसलें बीमाकृत हैं, उन्हें भी फसल बर्बाद होने पर कोई भुगतान नहीं मिलता. सब बीमा कंपनियों की चोंचलेबाजी है और उनमें सरकार की मिलीभगत है. 2014 में 2.33 करोड़ किसानों में से 7.36 लाख का ही खरीफ फसल का बीमा हुआ था, लेकिन उसका लाभ केवल 3.23 लाख किसानों को ही मिला. बीमा होने के बावजूद सवा चार लाख किसानों को फसलों की बर्बादी का मुआवजा बीमा कंपनियों से नहीं मिला. इसके लिए न सरकार ने कोई कार्रवाई की और न प्रशासन तंत्र ने किसानों की कोई सुध ली.

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि बजट से किसानों को घोर निराशा हाथ लगी है. पूर्व के वर्षों की तरह इस बार भी आंकड़ों की बाजीगरी की गई. इस बजट में किसान के नाम पर बीमा कम्पनियों और दूसरे उद्योगों को लाभ देने का प्रयास किया गया है. इससे किसानों की आत्महत्याएं रुकने के बजाय इसमें इजाफा होने का ही अंदेशा है. टिकैत ने कहा कि 2014-15 में कृषि क्षेत्र को 32 हजार करोड़ का आवंटन किया गया था. भाजपा सरकार ने 2015-16 में इसे घटाकर 25 हजार करोड़ कर दिया. फिर 2016-17 में इसे 36 हजार करोड़ रुपये कर दिया और उसका ढिंढोरा पीट रही है.

लेकिन असलियत में चार हजार करोड़ रुपये ही तो बढ़ाए. कृषि क्षेत्र को महज चार हजार करोड़ दिए जाने से क्या अच्छे दिन आ सकते हैं? किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष शेखर दीक्षित ने भी कहा कि बजट आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा कुछ भी नहीं है. यह बजट कॉरपोरेट हाउसों को ध्यान में रख कर बनाया गया है. बजट में महंगाई रोकने का कोई उपाय नहीं किया गया है. पिछले तीन वर्षों में किसानों की फसलें दैवीय आपदा के कारण तबाह हो रही हैं. लेकिन उन्हें राहत देने का कोई प्रावधान बजट में नहीं है.

बजट में मनरेगा के तहत सिंचाई के लिए पांच लाख कुओं का निर्माण कराने का प्रावधान किया गया है, जबकि कुओं से सिंचाई की पद्धति 18वीं सदी की है जिसे वर्तमान सरकार 21वीं सदी में लागू कराना चाहती है. भूजल लगातार नीचे जा रहा है, ऐसे में कुओं में पानी कहां से आएगा, इसकी किसी को चिंता नहीं. यह धन के अपव्यय के अतिरिक्त और कुछ नहीं है. दीक्षित ने कहा कि प्रदेश के किसानों को नए बजट से बहुत उम्मीदें थी लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी.

राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष मुन्ना सिंह चौहान और रालोद के वरिष्ठ नेता अनिल दुबे ने कहा कि केंद्रीय बजट का बोझ किसानों और मध्य वर्ग की कमर तोड़ कर रख देगा. महंगाई में बेतहाशा वृद्धि होगी. फसलों की लागत वापस होने तक पर आफत रहेगी. किसान मरेगा और नए-नए करों का भार सर्विस क्लास और मध्यम श्रेणी के लोगों का जीवन दुभर कर देगा. रालोद नेताओं ने कहा कि केंद्रीय बजट केवल पूंजी घरानों के फायदे के लिए है.

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